पहला अफेयर: काला खट्टा (Pahla Affair: Kaala Khatta)

पहला अफेयर: काला खट्टा (Pahla Affair: Kaala Khatta) रेस्टोरेंट की सीट पर बैठते ही उसने हमेशा की तरह कहा, “एक काला खट्टा.” हैरानी तब हुई…

पहला अफेयर: काला खट्टा (Pahla Affair: Kaala Khatta)

रेस्टोरेंट की सीट पर बैठते ही उसने हमेशा की तरह कहा, “एक काला खट्टा.” हैरानी तब हुई जब पीछे से भी कुछ जानी-पहचानी आवाज़ ने कहा, “एक काला खट्टा.” कुछ ख़ास बात नहीं थी, लेकिन उसे उत्सुकता हो आई. उसका ऑर्डर टेबल पर सज गया था, लेकिन वो उस आवाज़ को देखने का लोभ न छोड़ सकी और हाथ धोने के बहाने उठ खड़ी हुई. जब वो पास से गुज़री, तो एक ताना मिश्रित नारी स्वर उसे सुनाई दिया, “पता नहीं, तुम कब बाज़ आओगे ऐसी बचकानी चीज़ें खाने से…” और वो चाट खाने में व्यस्त हो गई. उसका पति धीरे-धीरे काला खट्टा चूस रहा था.

बेशक उम्र के निशान साफ़ नज़र आ रहे थे, लेकिन वो सोमेश ही था. उसके बचपन का स्कूल के समय का साथी. एक ही स्कूल और पास-पास घर. दोनों इकट्ठे ही खाते-पीते. ख़ासकर काला खट्टा एक ही स्टिक से चूसते. सोमेश को आज एक अरसे बाद इस तरह अचानक देखकर बीती बातों में दिल खोने लगा. बचपन का वो ज़माना फिर याद आने लगा, जहां दोनों एक साथ स्कूल
आते-जाते, एक ही साथ खेलते. बचपन की नादानियां, खट्टी-मीठी नोक-झोंक दोनों को कब एक-दूसरे के क़रीब ले आई, इसका एहसास ही नहीं हो पाया.

बचपन के छूमंतर होते ही जवानी में क़दम रखते ही लड़कियों पर हज़ारों तरह के पहरे लगना कोई नई बात नहीं है. भले ही ज़माना कितना ही मॉडर्न हो जाए, बहुत आगे पहुंच जाए, लेकिन समाज व परिवार की लक्ष्मण रेखा पार करना सबके बूते की बात नहीं होती. अब बात-बात पर उसे टोका जाने लगा था कि वो बच्ची नहीं है, जवान हो चुकी है. सोमेश के साथ इस तरह आना-जाना या समय बिताना ठीक नहीं. समाज और परिवार के लोग क्या कहेंगे? लेकिन उसके मन में प्यार की कोंपल फूट चुकी थी और सोमेश की आंखों की भाषा भी वो समझती थी. उसके मन में छिपे प्यार को और सोमेश की आंखों में साफ़ नज़र आते इक़रार को दोनों ही बख़ूबी समझते थे.

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अब बचपन की वो बेफ़िक्री नहीं थी, एक अजीब-सी झिझक और हया दोनों के बीच पसर गई थी. एक-दूसरे को देखकर धड़कनें तेज़ हो जाना, चोरी-चोरी एक-दूसरे को छुप-छुपकर निहारना और जब आंखों से आंखें टकरा जाएं, तो अजीब-सी सिहरन और मदहोशी का एहसास होना… ये सब प्यार की ही तो निशानियां थीं… पहले प्यार की ख़ुशबू, एक अलग-सा जादू… दोनों को ही इस अनोखे एहसास ने छू लिया था.

चाहत तो दोनों की ही थी कि एक-दूसरे के हो जाएं हमेशा के लिए. एक पवित्र बंधन में बंध जाएं और खुलकर सबको कह सकें कि हां, हमें मुहब्बत है… और हम अपनी मुहब्बत को रिश्ते का नाम देना चाहते हैं, लेकिन दरिया गहरा था और वो सोहनी नहीं थी, जो कच्चे घड़े से दरिया पार कर लेती. पहला प्यार एक कसक बनकर रह गया.

पीछे वाली सीट खाली हो चुकी थी और उसकी प्लेट का काला खट्टा भी बह गया था, उसकी आंखों के आंसुओं की तरह…

– विमला गुगलानी

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