कहानी- अग्निपरीक्षा (Short Story- Agnipariksha) | Hindi Short Story

Reeta Kumari
        रीता कुमारी

Ka-Agnipariksha (Rita Kumari)

मैं सब सुन रही थी, सह रही थी, भीषण अग्नि में झुलस रही थी, जिसका ज़रा भी एहसास तुम्हारे भइया को नहीं था. वह तलाक़ लेने की प्रक्रिया पूरी कर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बचा रहे थे. सच पूछो तो यह और कुछ नहीं, बल्कि सदियों से चला आ रहा उनका पुरुषोचित दंभ मात्र था. पत्नी चाहे कितने संताप से गुज़र रही हो, उसका सहारा बनने के बदले उसे अपने ही घर से निर्वासित कर ख़ुद मर्यादा पुरुषोत्तम बन जाते हैं.

केरल के विशाल समुद्र तट कोवलम के सामने बैठी मैं दूर-दूर तक फैले हरे नारियल के पेड़ों के झुंड और समुद्र में उठती लहरों को देखने में पूरी तरह मशगूल थी. तभी मेरी नज़र वहां से थोड़ी दूर पर बैठी महिला पर पड़ी, जिसे देखते ही मैं बुरी तरह चौंक पड़ी. उम्र चाहे जितनी सिलवटें डाल दे, पर कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान समय के साथ ज़रा भी नहीं बदलती. वह सुनंदा भाभी ही थीं, मैं हज़ारों में पहचान सकती थी. उन्हें आवाज़ देकर चौंकाने के लिए उठी ही थी कि दूसरा करारा झटका लगा. क़रीब 17-18 साल का एक लड़का दौड़ता हुआ आया और उनसे झुककर कुछ बातें की और वापस मेरे बगल से दौड़ता हुआ चला गया. मैं अवाक् उसे देख रही थी. वह
हू-ब-हू आलोक भैया का प्रतिरूप था. वही नैन-नक्श, वही कद-काठी, वही चाल जैसे किसी ने समय की गति को पीछे घुमा दिया हो. ऐसा लगा जैसे विधाता ने सुनंदा भाभी की सच्चाई का प्रमाण ख़ुद प्रस्तुत कर दिया हो.
अब मेरे लिए अपने आपको रोकना मुश्किल था. अचानक मैं सुनंदा भाभी के सामने जा खड़ी हुई. मुझे देखकर वह भी कम अचंभित
नहीं हुईं.
“नैना तुम! तुम यहां कैसे?”
भावावेश में भाभी ने मेरा हाथ कसकर थामा और मुझे अपने पास बिठा लिया. कभी-कभी शब्दों से ज़्यादा स्पर्श की भाषा मुखर हो उठती है. स्पर्श के सहारे ही भाभी का अकथनीय दर्द मेरे अंदर प्रवाहित हो रहा था. थोड़ी देर हम यूं ही बैठे रहे, फिर मैंने ही पहल की.
“भाभी, कभी किसी ने सोचा था, आप यूं अकेली इस अनजान शहर में मिलेंगी. ईश्‍वर ने क्या कुछ नहीं दिया था आपको, पर आदमी क्या सोचता है और क्या हो जाता है? ज़िंदगी ने एक करवट क्या ली, पलभर में आपका हंसता-खेलता जीवन बिखर गया.”
“तुम यहां कैसे आ गई?” वह बात को बदलते हुए बोली थीं.
“मेरे पति विष्णु त्रिवेंद्रम में स्पेस सेंटर में वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत हैं, इसलिए क़रीब तीन सालों से मैं त्रिवेंद्रम में ही रह रही हूं. आज यहां आई, तो आपसे मुलाक़ात हो गई.”
आगे की बात मैं चाहकर भी उन्हें बता नहीं पाई. कैसे बताती कि आज सुबह-सुबह ही भइया का फोन आया था कि वह कॉलेज के विद्यार्थियों के साथ एजुकेशनल टूर पर यहां आ रहे हैं. कोवलम बीच पर ही होटल में रुके हुए हैं. उनके पास ज़्यादा समय नहीं था, इसलिए मैं ही उनसे मिलने चली आई थी. होटल में गई, तो पूरी टीम कहीं बाहर निकल गई थी. उनके लिए एक संदेश होटल में छोड़कर मैं यहां आ बैठी थी.
“आप… आप आजकल कहां हैं और क्या कर रही हैं?”
“मैं भी यहीं त्रिवेंद्रम में ही रहती हूं और यहीं के एक स्कूल में पढ़ाती हूं.”
फिर उठते हुए बोलीं, “नैना, तुम कहीं जाना मत, मुझे ढेर सारी बातें करनी हैं, मैं पंद्रह-बीस मिनट में लौटकर यहीं आती हूं.” इतना बोल अपने जीवन में एक बार फिर आनेवाले झंझावातों से बेख़बर वह एक तरफ़ तेज़ी से बढ़ गई थीं और मैं वहीं बैठी नियति के खेल को समझने की कोशिश कर रही थी.
जिस पीड़ा को समय ने भुला दिया था, वह आज फिर से दंश दे रही थी. अरसे बाद मेरा चंचल मन एक बार फिर पटना के उस हवेलीनुमा मकान में जा पहुंचा था, जहां कभी हमारा संयुक्त परिवार रहता था. और उस संयुक्त परिवार में भाभी बहू बनकर आई थीं. उस बड़े-से संयुक्त परिवार में रहनेवाले हर सदस्य की उनसे कुछ विशेष अपेक्षाएं थीं. ख़ासतौर से उनके देवरों-ननदों की, जिन्हें जानने-समझने में भाभी को ज़्यादा देर नहीं लगी थी और देखते ही देखते अपने पारदर्शी, निर्मल और हंसमुख स्वभाव के कारण वह सभी की प्रिय बन गई थीं. वह अक्सर ही गंभीर बातों को भी हंसी में उड़ा कितने ही संभावित क्लेश को टाल देती थीं.
आलोक भइया तो उन पर जान छिड़कते थे. घर में जब तक रहते, उनके आस-पास ही मंडराते रहते. उनसे बातें करने का अवसर ढूंढ़ते रहते. भइया-भाभी का यही प्यार मां को रास नहीं आता. जिस पुत्र पर उनका एकछत्र अधिकार था, उसका बंटवारा उन्हें व्यथित करता. अपने ईर्ष्यालु स्वभाव के कारण छोटी-छोटी बातों पर भी भाभी को अपने व्यंग्यबाण से घायल करती रहतीं. भाभी एक सरकारी स्कूल में इंग्लिश पढ़ाती थीं. उनकी यह आर्थिक स्वतंत्रता भी मां को नहीं सुहाती थी.
मां के साथ उनके चाहे जैसे संबंध रहे हों, पर मुझसे उनका संबंध अंतरंग सहेलियों जैसा था. भाभी मां का काफ़ी सम्मान करती थीं, इसलिए कभी भी उनकी बातों का बुरा नहीं मानती थीं, पर वहीं दूसरे के साथ हो रहे किसी भी तरह के अत्याचार को ज़्यादा देर बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं.
इन सब बातों के बावजूद हमारे भिन्न-भिन्न मति-गतिवाले उस बड़े से परिवार को उन्होंने पूरी तरह बांध रखा था. पर एक दिन उनके सुखी घरौंदे को भी किसी की काली नज़र लग गई. दुर्भाग्य के एक भूकंपी झटके ने उनके घरौंदे को ऐसा धराशायी किया कि उसका तिनका-तिनका बिखर गया. कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी आसानी से संभालनेवाली भाभी भी यहां टूट गईं.
उस दिन चिल्ड्रेंस डे था. भाभी के स्कूल में बच्चों को साथ लेकर शिक्षक और शिक्षिकाएं पिकनिक के लिए बोधगया गए हुए थे. लौटते समय अंधेरा हो गया था. अचानक रास्ते में पांच बसों में से एक बस को उग्रवादियों ने अपने कब्ज़े में ले लिया और उसे लेकर जंगल में चले गए. बदक़िस्मती से उसमें सुनंदा भाभी भी थीं. दो दिनों तक सरकार से उग्रवादियों की बातें होती रहीं. वे बंधकों को छोड़ने के बदले अपने कुछ साथियों को छुड़वाना चाहते थे. अपनी मांगें पूरी नहीं होने पर बच्चों और शिक्षिकाओं को लेकर तरह-तरह की धमकियां दे
रहे थे.
भूखे-प्यासे बच्चे बेहद घबराए हुए थे. उन बच्चों के साथ उग्रवादियों का अमानवीय व्यवहार सुनंदा भाभी ज़्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं कर सकीं और बच्चों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करने लगीं, जिससे क्रोधित उग्रवादियों ने उन्हें मारा-पीटा और अलग एक झोपड़े में कैद कर दिया.
दो दिनों के अथक परिश्रम के बाद जब पुलिस ने सभी बंधकों को छुड़ा लिया, तो भाभी को अलग ़कैद करने की बात को मीडिया ने इतना ज़्यादा उछाला कि उनका साहस उनका कलंक बन गया. दो दिनों के मानसिक और शारीरिक कष्ट झेलकर जब वह घर लौटीं, तो उन्हें अपेक्षा थी कि घर के लोग उनका शानदार स्वागत करेंगे, पर यहां तो घर के अपने ही लोग उन्हें सिर से पैर तक घूर रहे थे.
नहा-धोकर फ्रेश हुईं, तो घर में काम करनेवाली कमलाबाई उनका खाना कमरे में ही ले आई. वह आलोक भइया की प्रतीक्षा कर रही थीं. उनकी जान बच गई थी, इसकी ख़ुशी उनके चेहरे पर देखना चाह रही थीं.
आलोक भइया आए भी तो एक मायूस-सी मुस्कान चिपकाए. उनके चेहरे पर टिकी दो आंखों में पल रहा संदेह, अविश्‍वास स्पष्ट दिख रहा था. थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोले, “तुमको दो दिनों तक उन लोगों ने सबसे अलग एक झोपड़े में बंदी बनाकर रखा, क्या तुम मेरे सिर की क़सम खाकर कह सकती हो कि उन लोगों ने तुम्हें छुआ तक नहीं.”
सुनंदा भाभी को ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके दिल को निकालकर कांटों पर फेंक दिया हो. पीड़ा के गहरे एहसास से उनका सर्वांग थरथरा उठा. पति के एक प्रश्‍न ने जैसे उन्हें चोटी से गिरा दिया. पैरों तले की ज़मीन खींच ली, वह निर्वाक् खड़ी पति को निहारती रह गईं. किसी तरह अपने को संभालते हुए बोलीं, “क्या हो गया है आपको? भले ही मुझे मारा-पीटा गया, भूखा रखा गया, पर वैसी कोई बात नहीं हुई, जैसी आप कह रहे हैं.”
इतना कुछ कहने पर भी पति की आंखों में शक कम नहीं हो रहा था. मनगढ़ंत क़िस्सों से माहौल गर्म था. पत्नी मौत के मुंह से निकलकर आई थी, उसकी मानसिक स्थिति का ख़्याल किए बिना पति उनकी अग्निपरीक्षा में जुटा था. तत्काल दोनों अपने-अपने खोल में सिमट गए थे. एक महीना गुज़रते-गुज़रते जब भाभी को पता चला कि वह मां बननेवाली हैं, तो आलोक भइया के साथ-साथ घर के लोगों के व्यंग्यबाण उनके मर्म पर नश्तर चुभोने लगे थे. ऐसी बातें तो हवा के संग रूई के फाहों-सी उड़ती पलभर में फैल जाती हैं. इन बातों को नमक-मिर्च लगाकर लोगों ने इतना दुष्प्रचार किया कि भाभी का सांस लेना दूभर हो गया.
अक्सर भाभी मेरे गले से लग फूट-फूटकर रो पड़ती थीं. भइया के निरर्थक संदेह ने उनके निर्दोष दामन पर दाग़ ही नहीं लगाया था, अजन्मे शिशु को भी कलंकित किया था. पति ने उनके स्वाभिमान को ही नहीं, उनके मान-सम्मान को भी ठेस पहुंचाई थी. जिस पति पर उन्हें गर्व था, जिससे उन्हें प्यार और संरक्षण की सबसे ज़्यादा उम्मीद थी, उसी ने उनके वजूद की धज्जियां उड़ा दी थीं.
मैं भी यह सोचकर हैरान थी कि अगर ऐसा-वैसा कुछ हो भी गया होता, तो इसमें भाभी का क्या दोष था? रिश्ते तो मन से जुड़ते हैं और विश्‍वास पर टिके होते हैं. जब उसी विश्वास में दरार पड़ जाए, तो उसे पहले की तरह जोड़ना नामुमकिन होता है. पति की अवहेलना देख उनका आहत नारीत्व तड़प उठा था. उस समय उन्होंने तलाक़ का कठिन निर्णय लिया था. आपसी समझौते से जल्द ही उन दोनों का तलाक़ हो गया था.
मातृ-पितृ विहीना सुनंदा भाभी का एकमात्र भाई भी दूर केरल में रहता था, जिसे अभी तक भाभी ने कुछ भी नहीं बताया था. तलाक़ के बाद नए आश्रय की तलाश में उन्होंने एक बार फिर मायके का रुख कर लिया था. घर के किसी सदस्य को कोई चिंता नहीं हुई कि वह कहां जाएंगी? जब घर से निकलीं, तब उनके हाथों में एक सूटकेस में कुछ जोड़ी कपड़े और दूसरे ज़रूरी सामान थे. गहने और ढेरों क़ीमती सामान, जो उनकी शख़्सियत का हिस्सा बन गए थे, उसे वहीं छोड़ दिया था उन्होंने.
आलोक भइया भी उनके जाने के बाद सुखी नहीं रह पाए. भले ही पहले की तरह यूनिवर्सिटी जाने लगे थे, फिर भी पहले की तरह सामान्य नहीं रह पाते. यहां-वहां मणिहारा सांप-से व्याकुल भटकते रहते. एक निरर्थक शक ने तीन ज़िंदगियां तबाह कर दी थीं, जिसे वह समझकर भी नहीं समझ पा रहे थे.
तभी भाभी लौट आई थीं. साथ में खाने-पीने का कुछ सामान भी था. कुछ औपचारिक बातों के बाद मैं ख़ुद को रोक नहीं सकी थी.
“एक बात पूछूं भाभी? आप सब कुछ छोड़ यूं आसानी से हथियार डाल वहां से वापस चली आईं. आपको नहीं लगता कि अपने साथ हुए अन्याय का कसकर विरोध करना चाहिए था. शायद आपका घर टूटने से बच जाता? अपने लिए न सही, अपनी होनेवाली संतान के अधिकारों के लिए ही लड़ना चाहिए था?”
“यह तो नैना अपने को छलने जैसी बात हुई. तुम्हीं बताओ, क्या आलोकजी मेरी अग्निपरीक्षा लेकर भी मेरे बेटे नील को दिल से अपनाते? शायद कभी नहीं. जो व्यक्ति अपनी पत्नी की ढाल न बन सका, वह अपनी संतान की ढाल क्या बनता, जिसे वह सारे फ़साद की जड़ समझते थे. ऐसे कमज़ोर पिता की संतान को बाहर के लोगों से पहले घर के लोगों के ताने-उलाहने ही कुंठित कर देते. यह मैं कैसे बर्दाश्त कर पाती. औरत चाहे कितनी भी पाषाणी क्यों न हो, अपनी संतान के भविष्य से समझौता नहीं कर सकती.
दूसरी बात, कभी आलोकजी मुझसे प्यार करने का दावा करते थे, लेकिन ज़िंदगी के सबसे नाज़ुक मोड़ पर मुझे अकेला कर दिया. जिस समय मुझ पर दोषारोपण हो रहे थे, व्यंग्यबाण चलाया जा रहा था, उस समय मेरी ढाल बनने के बदले कायरों की तरह उन लोगों के खेमे में जा खड़े हुए, जहां लोग उनकी पत्नी का ही तमाशा बना रहे थे. उन्हें यह भी ख़्याल न रहा कि उनकी पत्नी भी एक इंसान है, उसकी भी कोई इज़्ज़त है, मान-मर्यादा है.
माना जीवन स़िर्फ पति-पत्नी तक ही सीमित नहीं रहता, पूरा परिवार और समाज उससे जुड़ा होता है और समाज के वचन हमेशा निर्मम और कठोर होते हैं, जिसे झेलना आसान नहीं होता. अगर दोनों के बीच सच्चा प्यार और विश्‍वास हो, तो दुनिया में कोई ऐसी शक्ति नहीं, जो पति या पत्नी को तोड़ दे.
निर्दोष होते हुए भी मुझ पर झूठे लांछन लगाए जा रहे थे. मैं सब सुन रही थी, सह रही थी, भीषण अग्नि में झुलस रही थी, जिसका ज़रा भी एहसास तुम्हारे भइया को नहीं था. वह तलाक़ लेने की प्रक्रिया पूरी कर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बचा रहे थे. सच पूछो तो यह और कुछ नहीं, बल्कि सदियों से चला आ रहा उनका पुरुषोचित दंभ मात्र था. पत्नी चाहे कितने संताप से गुज़र रही हो, उसका सहारा बनने के बदले उसे अपने ही घर से निर्वासित कर ख़ुद मर्यादा पुरुषोत्तम बन जाते हैं.”
“काश! भइया एक बार अपने बेटे को देख लेते.” अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया था.
उस गंभीर माहौल में भी भाभी हंस पड़ी थीं, “तुम क्या चाहती हो नैना, मैं बेगुनाही के प्रमाणपत्र के रूप में अपने बेटे नील को लेकर आलोकजी के पास जाऊं और अपने अभिशप्त अतीत को पुनर्जीवित कर नील को भी उसी दर्द से गुज़ारूं, जिससे कभी मैं गुज़री थी. तब मैं क्या ख़ुद अपनी नज़रों में नहीं गिर जाऊंगी.” तभी भइया की आवाज़ ने हम दोनों को चौंका दिया था, जो शायद मेरा संदेश पा मुझे ढूंढ़ते हुए यहां तक आ गए थे और पास ही खड़े हमारी बातें सुन रहे थे.
“तुम्हें अब सफ़ाई देने की कोई ज़रूरत नहीं है. सच कहूं सुनंदा तो अपने किए पर मैं ख़ुद बहुत शर्मिंदा हूं. तुम्हारे साथ हुई नाइंसाफ़ी के लिए हमेशा मेरी अंतरात्मा मुझे धिक्कारती रही. आज बरसों बाद तुम मुझे मिल गई, यह संयोग नहीं हो सकता. अवश्य ही ईश्‍वर हम दोनों को मिलवाना चाहता है.” पास बैठते हुए भइया ने बड़ी आत्मीयता से भाभी का हाथ थाम लिया था, पर भाभी ने ऐसे चौंककर अपना हाथ झटके से खींच लिया था मानो उनके हाथ ने अंगारे को छू लिया हो. हमेशा से मृदुभाषी रहीं भाभी बड़े ही सख़्त लफ़्ज़ों में बोली थीं, “नहीं मिस्टर आलोक, अब यह कभी संभव नहीं हो सकता. जिस तरह आपने मुझे ज़लीलकर निकाला था और मुझे तलाक़ लेने पर मजबूर किया था, उस अपमान के कारण मैं बरसों अंगारों पर लोटती रही, पर आपने मेरी खोज-ख़बर तक लेने की कोशिश नहीं की. फिर भी कितने दिनों तक मैं यही सोचती रही कि जब आपको अपनी भूल का एहसास होगा, आप मेरी खोज-ख़बर लेने ज़रूर आएंगे, पर अपने पुरुष होने के अहंकार में डूबे आपने कभी पलटकर भी मुझे नहीं देखा. शक के बिना पर आपने इतना कुछ कर दिया, अगर मेरे साथ सचमुच कोई दुर्घटना हो ही जाती, तब तो आप मेरे लिए स़िर्फ एक ही विकल्प छोड़ते, वह भी आत्महत्या का, क्योंकि आप जैसे पुरुषों के लिए औरत हमेशा पराया घटक होती है.
पूरी तरह टूटी-हारी, दुर्भाग्य के ऐसे कठिन समय में जब मैं मायके पहुंची, तब मेरे भैया और भाभी ने मुझे खुले दिल से अपनाया ही नहीं, जीने का हौसला भी दिया. उन्होंने ही मुझे समझाया, इंसान होने का मुझे भी बराबर का हक़ है. मैंने भी धीरे-धीरे जीना सीख लिया. आपका मोह त्याग जीवन में आगे बढ़ गई, क्योंकि अपनी पूरी ज़िंदगी यूं ही तन्हाई में नहीं गुज़ार सकती थी, वह भी उस आदमी के लिए जिसने स़िर्फ शक के बिना पर मेरा परित्याग किया था. आज अठारह साल गुज़रने के बाद मेरे जीवन में आपके लिए कोई स्थान नहीं है. नील तब पांच वर्ष का था, जब मैंने भइया के एक मलयाली दोस्त कृष्णमूर्ति से शादी कर ली थी. वो एक सरल सुलझे हुए इंसान हैं. मेरे अतीत से पूरी तरह वाक़िफ़ होते हुए भी, मुझसे और नील दोनों से बेहद प्यार करते हैं. वहां बालू पर बैठे मेरे पति और दोनों बच्चे नील और सौम्या मेरा इंतज़ार कर रहे हैं, अब वही मेरी दुनिया है, जहां मैं बहुत ख़ुश हूं.” वह झटके से उठकर वहां से चली गई थीं.
उनके क़दमों में पहले से कहीं ज़्यादा दृढ़ता और आत्मविश्‍वास नज़र आ रहा था. दुख, तिरस्कार और उपेक्षा से भइया का चेहरा काला पड़ गया था. वह जड़वत बैठे नील को निहार रहे थे. इतने करारे झटके के बाद मैं भइया को अकेला कैसे छोड़ सकती थी. वहीं बैठी भइया की बांह थामे मैं उनका दुख कम करने की कोशिश कर रही थी. जैसे-जैसे भाभी दूर जा रही थीं, वैसे-वैसे भइया टूट रहे थे. मैं तब भी कुछ नहीं कर पाई थी, जब भाभी ने घर छोड़ा और आज भी बेबस बैठी सब देख रही थी. अक्सर ज़िंदगी को हम नहीं, ज़िंदगी ही हमें अपने अनुसार चलाती है, यह सत्य हमारे सामने था.

 

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