"नहीं! लेन-देन की तो बात ही नहीं उठी, उन्होंने कहा कि आपके यहां का माहौल अलग है. लड़का भी कुछ ख़ास पढ़ा-लिखा नहीं है, डोनेशन वाले कॉलेज से एमबीए है, जबकि उनकी बेटी टॉपर रही है… और…"

बेटे समीर के फैक्ट्री जाते ही मैंने छोटी बहन को फोन किया, "नीलू, बहुत गड़बड़ हो गई है. तुम्हें वह लड़की याद है, पीले लहंगे वाली, जो पम्मी की शादी में आई थी? हां... हां वही... समीर को बहुत पसंद आ गई है.
कह रहा है शादी की बात चलाओ... किसी कॉलेज में पढ़ाते हैं उसके मम्मी-पापा... हां ऐसे ही हैं, हमारी तरह हाई क्लास नहीं हैं."
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"अब क्या करोगी दीदी?"
"तुम्हारे जीजाजी ने कुछ सोचा है. तुम आज रिश्ता लेकर उनके घर जाओ. हमारे बारे में बताओ कि हम लोग क्या हैं! थोड़ा लेन-देन का इशारा भी कर देना... ऐसे डरा दो कि वह ख़ुद ही ना कर दें. समझ में तो आए मास्टर को, शादियों में बेटी सजाकर घुमाने से अमीर लड़के नहीं मिल जाते हैं."
एक-एक पल बड़ी मुश्किल से बीत रहा था. नीलू के आते ही हम दोनों उसे घेर कर बैठ गए.
"जीजाजी, उन्होंने शादी के लिए मना कर दिया."
"थैंक गॉड!.. लेकिन हुआ क्या? लेन-देन के नाम पर हवा निकल गई होगी?" इन्होंने राहत की सांस ली.
"नहीं! लेन-देन की तो बात ही नहीं उठी. उन्होंने कहा कि आपके यहां का माहौल अलग है. लड़का भी कुछ ख़ास पढ़ा-लिखा नहीं है, डोनेशन वाले कॉलेज से एमबीए है, जबकि उनकी बेटी टॉपर रही है... और..."
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"नीलू... पूरी बात बताओ."मैं ग़ुस्से से कांप रही थी.
"और वह बोले कि लड़के की मां भी कम पढ़ी-लिखी है, ऐसे में क्या माहौल होगा घर का?.. कुल मिलाकर उन्हें रिश्ता जमा नहीं; बोले कि आप लोग संपन्न तो हैं, लेकिन हाई क्लास नहीं हैं."
- लकी राजीव

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