कहानी- मेट्रो (Short Story- Metro)

 

Meenu-Tripathi

       मीनू त्रिपाठी
“कल ही बॉस ने मीटिंग ली थी कि वोनिश्का ने शुभी को देखा मेट्रो के छूटने का अफ़सोस अभी भी उसके चेहरे पर दिखाई दे रहा था. निश्का ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, “अब छोड़ न, होता है ऐसा कभी-कभी.” लेट आने को बहुत सीरियसली लेंगे और आज ही हम लेट हो गए. खड़ूस बॉस तो हमारी जान ही ले लेंगे.”
Ka-Metro-(Meenu-Tripathi)

“शुभी, थोड़ा जल्दी कर, नौ बजेवाली मेट्रो ट्रेन मिस हो गई, तो मुश्किल हो जाएगी.”
“बस निश्का, दो मिनट रुक जा. आज देर से क्या उठे सब अस्त-व्यस्त हो गया. अब से तुझे अलार्म सेट करने नहीं दूंगी. सुबह की जगह शाम को बजता है. पी.जी. वाली आंटी चाय के लिए जगाती नहीं, तो पता नहीं क्या होता, तब मिस्टर देसाई के फोन से उठते हम.”
“अब तू ब़ड़बड़ाना बंद कर और सुबह-सुबह बॉस का नाम लेने की ज़रूरत नहीं है. पूरा दिन ख़राब निकलेगा. ताला ढूंढ़ कहां रखा है, जो जहां है उसे वहीं छोड़ दे.” टेबल के नीचे झांकते हुए निश्का बोल रही थी कि कुर्सी पर पड़ा हुआ ताला उसे दिख गया. कुछ ही देर में भागते-दौड़ते ऑटो को रोकने की कवायद शुरू हो गई थी. ऑटोवाले भी चेहरे की बेचैनी से भांप लेते हैं कि सामनेवाला कितना ज़रूरतमंद है. निश्का ऑटोवाले से उलझी ही थी कि शुभी ने कह दिया, “छोड़ यार! अब चल इसी से. आज तो ये लूटेंगे ही.” भुनभुनाते हुए वो दोनों ऑटो में जा बैठी थीं. बेचैनी से घड़ी देखते वे मेट्रो स्टेशन तक पहुंचीं. गेट पर पहुंचकर शुभी ने पर्स में हाथ डाला, तो याद आया एंट्री कार्ड तो घर पर दूसरे पर्स में रह गया.
“इसे कहते हैं कंगाली में आटा गीला.” निश्का बड़बड़ाने लगी. टिकट ख़रीदने के लिए दोनों भागीं. प्लेटफॉर्म पर खड़ी उनकी मेट्रो सामने से मुंह चिढ़ाती हुई गुज़र गई. शुभी लगभग रुआंसी थी. निश्का ने तसल्ली दी, “अगली मेट्रो का इंतज़ार करते हैं. दरबार स्कायर से ऑटो
ले लेंगे.” दूसरी मेट्रो भी आ गई थी, पर रास्ता टेढ़ा था पहुंचने का, अंदर भीड़ में भी लग रहा था कि वे अकेली खड़ी हैं और आज का दिन स़िर्फ उन्हें छकाने आया था. कुछ देर वो दोनों यूं ही खड़ी रहीं मानो आज की जंग के लिए ख़ुद को तैयार कर रही हों, तभी स्टेशन आने की एनाउसमेंट की ओर ध्यान गया. भीड़ छंट गई थी. निश्का ने शुभी को देखा मेट्रो के छूटने का अफ़सोस अभी भी उसके चेहरे पर दिखाई दे रहा था. निश्का ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, “अब छोड़ न, होता है ऐसा कभी-कभी.”
“कल ही बॉस ने मीटिंग ली थी कि वो लेट आने को बहुत सीरियसली लेंगे और आज ही हम लेट हो गए. खड़ूस बॉस तो हमारी जान ही ले लेंगे.” सामने बैठे एक लड़के ने उनकी ओर ध्यान से देखा, फिर हाथ में पकड़ी क़िताब को पढ़ने की कोशिश करने लगा.
“कोई बात नहीं, हम कान में रुई डालकर जाएंगे उनके पास…” निश्का ने शुभी को हंसाने का प्रयास किया, पर उसके होंठों पर मुस्कान की एक रेखा तक न आई.
“तू बॉस को फोन करके बोल न, आज हमारी मेट्रो छूट गई है, हम देर से आएंगे.” जवाब में निश्का ने अपना फोन शुभी की ओर बढ़ाया, तो उसने झुंझलाकर कहा, “फोन तो मेरे पास भी है. तू कर न बॉस को फोन यानी बिल्ली के गले में घंटी भी मैं ही बांधू.” निश्का शुभी को बोलते हुए नंबर मिलाने लगी.
“हैलो मिस्टर देसाई. दरअसल आज हमारी मेट्रो छूट गई. सर, आज देर हो जाएगी.” निश्का ने जल्दी से मुद्दे की बात कही. “थोड़ी क्या ज़्यादा देर से आइए आप लोग… भई चाहे तो न भी आएं. ऑफिस तो आपकी जागीर है.”
“नहीं मिस्टर देसाई, ऐसा नहीं है, हम सच में आज प्रॉब्लम में हैं.”
“आप लोगों के ऐसे बहानों से मैं भी प्रॉब्लम में आ जाता हूं.” अंतिम वाक्य तेज़धारी तलवार जैसे थे.
“बड़ा खड़ूस आदमी है ये देसाई… ऐसा बॉस भगवान किसी को न दे.” निश्का के मुंह से वाक्य इतनी ज़ोर से निकले थे कि आस-पास के लोग उनकी तरफ़ देखने लगे. उस लड़के ने एक बार फिर सिर क़िताब से उठाया और हंसकर बोला, “बॉस सभी के ऐसे ही खड़ूस होते हैं.” उसकी बात पर निश्का और शुभी पहले तो चौंकीं, फिर खिसियाकर मुस्कुरा दीं. उस मुस्कुराहट के पीछे अपनी शर्मिंदगी छिपाने की कोशिश थी. वो लड़का बोल रहा था, “मेरी मानिए, तो आज अपना ऑफिस जाने का प्रोग्राम छोड़कर शहर में लगे फूड फेस्टिवल चलिए.” इससे पहले कि निश्का और शुभी उसे यूं दख़लअंदाज़ी के लिए टोकतीं, उसने अपना परिचय एक शेफ के रूप में दिया. उसके आत्मविश्वास के साथ बात करने का तरीक़ा इतना प्रभावी था कि आस-पास के लोग भी ध्यानपूर्वक उसकी बात सुनने लगे. कुछ तो वहां पहुंचने का मन भी बनाने लगे, तो कुछ कहने लगे कि इस फूड फेस्टिवल ने बड़ी लोकप्रियता अर्जित की है. कुछ अख़बारों में भी इसके बारे में छपा था.
शुभी और निश्का बेचारगी से सुन रही थीं. रोज़ ऑफिस और घर आकर दूसरे दिन की तैयारी करना. कितने ही दिन हो गए वे दोनों कहीं बाहर घूमने-फिरने नहीं गए. अपने छोटे-से रूम और ऑफिस के अलावा बाहर की दुनिया की सुध लिए अरसा बीत गया था.
उन दोनों के चेहरों को ध्यान से देखते हुए वो लड़का फिर बोला, “आज आपकी मेट्रो इसीलिए छूटी है, ताकि आप मेरे स्टॉल पर चलकर फूड एंजॉय करें.” शुभी को उसकी बातों में बड़ा मज़ा आया. उन दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा. उस लड़के की बातों का असर था या उम्र का, वे दोनों फूड फेस्टिवल में चलने को तैयार हो गईं.
उतरते व़क्त शुभी ने कहा, “कोई हमारी बेव़कूफ़ी सुनेगा, तो हंसेगा. अभी भी सोच ले निश्का. हमारा खड़ूस बॉस…” शुभी ने चेताया.
“अरे छोड़ न, डांट तो पड़ने ही वाली है, थो़ड़ा ज़्यादा खा लेंगे.”
“अब आप ज़्यादा सोच-विचार में न पड़ें और अब मैं भी अजनबी नहीं हूं. इतने सारे लोगों के सामने अपने साथ चलने को कहा है, तो मुझसे कोई ख़तरा भी नहीं है.”
“अरे नहीं, वो बात नहीं, पर ख़ुद पर हंसी आ रही है. स्कूल की याद आ गई जब क्लास बंक करके हम…”
“ओह! तो ये आप लोगों की पुरानी आदत है. तभी तो कहूं कि आप लोग इतनी जल्दी कैसे तैयार हो गईं.”
“प्लीज़, अब आप हमारे बॉस की तरह बात मत करिए.” शुभी ने कहा, तो वो हंस दिया. रास्ते में आर्यमन ने अपना परिचय दिया और बताने लगा कि उसने फूड फेस्टिवल में कुछ ऐसी इंडियन डिशेज़ को इंट्रोड्यूस किया है, जिनका स्वाद लोग भूल चुके थे. “पारंपरिक व्यंजन को घर-घर, गांव-गांव जाकर मैंने निकाला है और एक नए रूप में प्रेज़ेंट किया है. आप लोग ज़रूर खाइएगा. पता नहीं कौन-सा भूला-बिसरा स्वाद आपको यहां मिल जाए.”
उसकी बातों की तरह उसके स्टॉल में भी जादू भरा था, तभी वहां कितनी भीड़ थी. चायनीज़ कॉन्टिनेंटल पर वो स्टॉल भारी पड़ा था. इतनी भीड़ देखकर हैरान थीं वे दोनों. वो अपने स्टॉल पर रुक गया और निश्का व शुभी जी भरकर खाने के बाद छुट-पुट शॉपिंग में जुट गई थीं. बिना मतलब के इधर-उधर घूमकर मस्ती करना उन दोनों के जीवन में एक नया ज़ायका भर गया था. अब उन दोनों ने मूवी का प्लान भी बना लिया था. घास पर बैठे कॉफी पीते हुए निश्का ने कहा, “चलते समय आर्यमन के स्टॉल होते हुए जाएंगे. आज के दिन के लिए उसे थैंक्स कहना बनता है.” “वो तो ठीक है निश्का, पर ध्यान से, थोड़ा चिपकू क़िस्म का है. लेकिन जो भी है, आज यहां आने का पूरा श्रेय आर्यमन को जाता है.” शुभी उठते हुए बोली.
आर्यमन अपने स्टॉल में बैठा एक गुजराती दंपति से ज़ायके के बारे में उनकी राय ले रहा था. शुभी और निश्का को आते देख, वो काउंटर की ओर आ गया. हल्की-सी मुस्कान के साथ पूछा, “कैसा रहा आज का दिन?” तो निश्का बोल पड़ी, “उसी के लिए हम आपको थैंक्स कहने आए हैं. हमारी मेट्रो का छूटना, आपसे मिलना और फिर ऑफिस छोड़कर यहां आना सब कितना फिल्मी लग रहा है.”
आर्यमन अचानक संजीदा होकर कहने लगा, “रोज़ की भागदौड़ से ऐसे पल चुरा लेने से ज़िंदगी को थोड़ा ऑक्सिजन मिल जाता है.” कहते हुए वह भीतर गया और वापस आया, तो हाथ में एक डिब्बा था. निश्का को देते हुए बोला, “दोस्तों को कई बार दिया है, आज पहली बार किसी अजनबी को गिफ्ट दे रहा हूं.”
“यह मेरे लिए है या शुभी के लिए.” निश्का ने शरारत से पूछा, तो शुभी ने अपनी कोहनी चुभाकर निश्का को सतर्क किया. तब तक आर्यमन ने बोल दिया, “आप दोनों के लिए है.” रास्ते में शुभी निश्का को बड़बड़ा रही थी. “मना कर देना था. ज़रा-सी हमने लिफ्ट क्या दी, वो गिफ्ट पर उतर आया.” “अरे, अब इतना रिएक्ट मत कर. कुछ दिया ही है न… मांगा तो नहीं.. कुछ लोग बहुत भावुक होते हैं, जल्दी रिश्ते जोड़ लेते हैं.”
मूवी देखकर घर की ओर आते ऐसा लगा मानो आज एक हसीन ख़्वाब देखा हो. ख़ुद के हिस्से में आए आज के दिन के लिए वे दोनों मेट्रो की शुक्रगुज़ार थीं. शुभी हंसकर बोली, “अब आज के बाद मेट्रो छूटने न पाए, वरना वो आर्यमन हमारी नौकरी छुड़वा देगा.”
“शुभ-शुभ बोल, कहीं ऐसा न हो तेरी बात सच ही हो जाए.” निश्का ने टोकते हुए कहा. रात को अचानक उस डिब्बे की याद आई. “निश्का, इसे खोलकर देखो, क्या है इसमें.” “ओफ्फो! पहले तो मैडम नाराज़ थीं. अब ख़ुद उतावली हो रही हैं.” निश्का ने चिढ़ाया. तब तक डिब्बा खुल चुका था. हैरान हुईं, जब दो खाखरे के पैकेट रखे देखे, साथ में एक चिट, जिसमें लिखा था, ‘ये खाखरे अपने बॉस को खिला दीजिएगा, हो सकता है कि आज की गुस्ताख़ी के लिए माफ़ी मिल जाए.’ “छोड़ो, आर्यमन के इस मज़ाक का क्या करना है. आज का दिन अच्छा बीता, बस काफ़ी है. इसे हम ऑफिस में खाएंगे.” दूसरे दिन मेट्रो समय पर पहुंच गई थी, तब चपरासी ने कहा, “बॉस ने बुलाया है. मिज़ाज कुछ बिगड़ा है उनका.” “सही कब रहता है.” निश्का ने कहा, तो शुभी ने उसे आंख दिखाई. बॉस के कमरे में क़दम रखा, तो एसी की ठंडक ने सिहरा दिया. “सर, मे आई कम इन.”
“अरे भई! आप लोगों ने तो मेरी बात को बड़ा सीरियसली ले लिया. मैंने तो यूं ही कहा था, पर आप लोग तो सच में ऑफिस नहीं आईं.” मिस्टर देसाई अपने चिर-परिचित अंदाज़ में व्यंग्यात्मक लहज़े में बात कर रहे थे.
था़ेडा सोचकर निश्का ने बात को संभालते हुए कहा, “सर, कल शुभी की तबीयत रास्ते में कुछ ख़राब हो गई थी..”
“तो आप इसे डॉक्टर के पास ले गईं.”
मिस्टर देसाई ने निश्का की बात पूरी की, तो वो हकबका गई.
“अरे कम से कम बहाना तो ढंग का बनाना सीख लीजिए. वही घिसा-पिटा मेट्रो छूट गई. अब आप लोग अपना इस्तीफ़ा मेज़ पर रखिए और शाम तक पेंडिग काम निपटाइए.” निश्का ने आवेश में कहा, “सर, इतनी-सी बात के लिए इस्तीफ़ा…?”
मिस्टर देसाई बोले, “इस्तीफ़ा नहीं तो खाखरे ही दे दो. क्या मेरा हिस्सा भी खाने का इरादा है?” उन दोनों का तो सिर चकरा गया और मिस्टर देसाई ठहाके मार के हंस रहे थे. किसी तरह हंसी रोककर बोले, “भई, कल मेट्रो छूटने के बाद फूड फेस्टिवल में आर्यमन ने जो खाखरे का डिब्बा दिया था, वही मांग रहा हूं. खाखरे कमज़ोरी हैं मेरी.” बुत बनी शुभी और निश्का से बोले, “लाई हो या घर भूल आई?”
“लाई हूं सर.”
“तो जाओ, लेकर आओ…”
निश्का उल्टे पांव लौट गई और उतनी ही तेज़ी से वापस आई. पसीने से तरबतर निश्का के हाथ से डिब्बा लेते ही मिस्टर देसाई ने पानी का ग्लास पकड़ाया, तभी फोन घनघना उठा. फोन पर मिस्टर देसाई बोल रहे थे, “हां भई, तुम्हारा भेजा डिब्बा मिल गया है, पर ज़रा समय निकालकर घर पर दर्शन दे जाओ. तुम्हारी मां भी खाना अच्छा बनाती है. कहीं वहीं से जयपुर जाने का इरादा तो नहीं है. इतनी भी क्या व्यस्तता… हां, वो दोनों यहीं हैं, बेचारी चक्कर में हैं… ऐ लो भई बात करो.” निश्का ने रिसीवर कान में लगाया, तो आर्यमन की ज़ोरदार हंसी सुनाई दी, “सॉरी निश्का, दरअसल आपके बॉस मेरे पापा हैं. कल आप दोनों के हाथ में देसाई ग्रुप का बैग देखकर सोच ही रहा था कि पूछूं, पर फोन की बातचीत ने मेरे शरारती दिमाग़ को कुछ और करने पर मजबूर कर दिया.” शुभी अब अंदाज़ा लगा चुकी थी. वो निश्का से फोन लेते हुए बोली, “आर्यमनजी आपने हमारे बारे में बॉस को…”
“खड़ूस बॉसवाली बात नहीं बताई है.” आर्यमन ने शुभी की बात बीच में ही काटकर बोला, तो शुभी ने जल्दी से रिसीवर पर हाथ रख दिया. “एक बात तो सीख ली हमने कि मोबाइल पर अक्सर बिना आस-पास की चिंता किए जो बोल जाते हैं, वो कोई गुल भी खिला सकता है.”
“मुझे उम्मीद है कि इस क़िस्से को आप लोग ताउम्र याद रखेंगी.” शुभी हंस पड़ी थी. निश्का बॉस को सफ़ाई दे रही थी, “अरे, कल हमारी मेट्रो छूटी, तो हमने दूसरा रास्ता निकाल लिया था कि कैसे ऑफिस पहुंचना है. हमने फोन भी किया था, पर आप नाराज़ थे. आपको लगा हम बहाना बना रहे हैं तो…”
“आपने शुभी को सच में बीमार कर दिया.” निश्का और शुभी ने शर्मिंदा होते हुए अपनी नज़रें नीची कर लीं. फिर ख़ुद पर हंस पड़ीं. मिस्टर देसाई बोल रहे थे, “मेरा कारोबार, ये बड़ा-सा ऑफिस सब कुछ मैंने अपनी मेहनत के बलबूते पर बनाया है. अक्सर लोग बहाना बनाते हैं और मैं भी लोगों के ज़रूरी कारणों को बहाने समझकर उनके साथ ज़्यादती कर देता हूं, पर अनुशासन के लिए ऐसा करना पड़ता है. बस, अपने बेटे आर्यमन को अनुशासन में नहीं रख पाया. मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ वह इस कारोबार को छोड़कर होटल इंडस्ट्री से जा जुड़ा है. मनमौजी है, पर काम के प्रति सजग और वफ़ादार…”
“सर, उन्होंने कैसे बताया हमारे बारे में?”
“अरे, बड़े डांटनेवाले अंदाज़ में बोला था कि आप अपने कर्मचारियों के प्रति ज़रा भी संवेदनशील नहीं हो. इतना क्यों सख़्त व्यवहार करते हो कि… ख़ैर छोड़ो… तुम दोनों के चेहरों की ताज़गी बता रही है कि तुम्हारा कल का दिन बहुत अच्छा गया. एक टॉनिक-सा काम
कर गया.”
“सच सर, कल जैसा दिन बहुत दिनों के बाद आया था. और आज का दिन वो भी सर…” निश्का मिस्टर देसाई की बात का जवाब देते हुए मुस्कुरा पड़ी. तभी शुभी ने चहकते हुए कहा, “सर, कल का पेंडिग काम हम आज पूरा कर लेंगे. ज़रूरत होगी, तो ओवर टाइम भी
कर लेंगे.”
“कोई ज़रूरत नहीं है ओवर टाइम की. ऑफिस से समय पर घर जाना, वरना कल भी मेट्रो छूट जाएगी.” मिस्टर देसाई की बात पर वे दोनों ज़ोर से हंस पड़ीं. बॉस के कमरे से निकलते हुए शुभी और निश्का की नज़रें मिलीं, तो कहने लगीं, “बॉस इतने भी खड़ूस नहीं होते हैं, कम से कम मिस्टर देसाई तो बिल्कुल नहीं…”

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