कहानी- शराफ़त अली (Short Story- Sharafat Ali)

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“क्या राय है आपकी? अब तो रिचा को भी देख लिया है आपने.”
“उसे अभी कहां देखा? मैं तो आपको देख रहा था…”
“जी…” मुझे पसीना आने लगा था. हाथ ठंडे हो गए थे, गला सूखने लगा था.
“सोच रहा था कि काश! 30 साल पहले भी ऐसा स्वतंत्र व पॉज़ीटिव माहौल होता. आप बिल्कुल नहीं बदली हैं, वैसी ही संकोची व ख़ूबसूरत हैं. बाइ द वे, आपकी वो टॉम बॉय सहेली कहां हैं आजकल, जो हमेशा सुरक्षा कवच की तरह आपके साथ रहती थीं?”

 

अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए ‘इंडिया बाज़ार’ एक ऐसी जगह है, जहां पहुंचकर अपने देश की ख़ुशबू ताज़ा हो जाती है. थोड़ी देर के लिए भूल ही जाते हैं कि हम अपने देश से बहुत दूर एक विदेशी धरती पर खड़े हैं. दो साल पहले ऐसा ही एक स्टोर हमारे टाउन में भी खुल गया है. स्टोर मालिक सरदारजी अमृतसर के हैं, इसलिए ‘नमस्ते जी’, ‘बड़े दिन बाद आए’ जैसे अपनत्व भरे शब्द भी सुनाई दे जाते हैं. हम भारतीय रोज़ की सब्ज़ी-फल व देशी सामान के लिए यहीं आते हैं. उस दिन सामान लेकर पेमेंट के लिए काउंटर पर आई, तो वहां एक नया चेहरा नज़र आया. मैं कुछ कहती या पूछती, उसके पहले ही सरदारजी ने परिचय दे डाला.

“मेरे दोस्त का बेटा है जी. पेट्रोलियम इंजीनियरिंग की है, यहीं की यूनिवर्सिटी से. नौकरी ज्वॉइन करने में समय है, तो जी, मेरी मदद को चला आया. आप तो जानते ही हो, समर में स्टाफ की कितनी दिक़्क़त हो जाती है. छुट्टियों में हर बंदा इंडिया जाना चाहता है. परिवार से मिलना ज़रूरी भी है जी, नहीं तो अपना कल्चर ही भूल जाएंगे और जी यह तो आपके इलाहाबाद से ही है.”
“अच्छा!” मैं उससे बात करने के लिए एकदम उत्सुक हो गई. इलाहाबाद में कहां रहते हो? यहां कब से हो? जॉब कहां मिला? कुछ ही पलों में जाने कितने ही सवाल-जवाब हो गए. जानकारी के साथ फोन नंबर का आदान-प्रदान भी हो गया और बड़ी आत्मीयता तथा इसरार के साथ मैंने उसे घर आने का न्योता भी दे डाला.
मुझे एक अनजानी-सी ख़ुशी महसूस हो रही थी. बड़ी आतुरता से मैं अपनी बेटी रिचा के आने का इंतज़ार करने लगी. इस विदेशी धरती पर मन का उल्लास किससे शेयर करूं. काउंटर पर खड़े उस चेहरे में कहीं कुछ जाना-पहचाना-सा आभास था. उसके साथ ही याद आ गई थी, अपनी दबंग सखी मधुला की. ढेरों काम बिखरे पड़े थे, लेकिन मन किसी भी काम में नहीं लग रहा था. कैफ़ी आज़मी साहब की पंक्तियां बार-बार याद आने लगीं ‘जब भी कोई गांव से आता है, मेरा बचपन लौट आता है… घड़ी पर नज़र डाली, तो सुबह के 11.30 बजे थे. इंडिया में रात के क़रीब नौ बजे होंगे. क्यों न मधुला को फोन कर लूं? अभी सोई थोड़े ही होगी. मन की दुविधा व तर्क-वितर्क को त्याग फोन मिला ही लिया.
“मधुला, सोई तो नहीं थी?”
“अरे नहीं, अभी तो डिनर भी नहीं हुआ. वकील साहब अपनी स्टडी में बैठे किसी केस की तैयारी में लगे हैं और मैं इंतज़ार में बोर हो रही हूं. बोल कैसे याद किया?”
“बस, कॉलेज के दिन याद आए, तो बात करने का मन हो आया.”
“अच्छा, तो बता कॉलेज के दिन किसने याद दिलाए?”
“पता है, आज ‘इंडिया बाज़ार’ स्टोर में एक लड़का मिला. इंजीनियर है. अपने इलाहाबाद का ही है, अरे तेरे ममफोर्डगंज से ही है. बड़ा भला-सा लगा. उसके पिता का नाम रोहित वर्मा है. यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. उसे देख शराफ़त अली की याद आ गई.” शराफ़त अली के नाम से हम दोनों ठहाका मारकर हंस पड़े. बातें करते-करते ढेर सारी नई-पुरानी यादें व बातें पुनःजीवित हो गई थीं.
फोन रखने के बाद भी मैं उस दुनिया से बाहर नहीं निकल पाई. कभी नीम के पेड़ पर पड़ा झूला, तो कभी यूनिवर्सिटी की सीढ़ियां. कभी कच्ची अमिया तोड़ना, तो कभी प्रोफेसर्स की बातें और उनका मज़ाक बनाना, सब साकार हो उठा था. कितनी ही सार्थक व निरर्थक बातों के तार जुड़ने लगे थे. कॉलेज के दिन याद आए और भला शराफ़त अली का ज़िक्र ना हो. शायद वो अनजान व्यक्ति कहीं न कहीं हमारी यादों का हिस्सा बन गया था.
प्रत्यक्ष रूप से शराफ़त अली से हमारा कोई लेना-देना नहीं था. ना कभी उससे हमारी बात हुई, ना कभी हाय-हेलो. नाम, गांव, पता-ठिकाना कुछ भी तो नहीं जानते थे, फिर भी जैसे जाना-पहचाना-सा लगने लगा था. बेचारा हमारे रिक्शे के पीछे-पीछे चुपचाप अपनी साइकिल पर साथ चला करता था, यूनिवर्सिटी जाते समय भी और लौटते समय भी. जाने कैसे उसे हमारी क्लासेज़ का पता होता था. अगर हमें रिक्शा तय करने में समय लगता, तो वह शांत भाव व धैर्य के साथ दूर खड़ा इंतज़ार करता, फिर साथ हो लेता. शुरू में तो मैं बहुत डर जाती थी. डर इस बात का भी था कि अगर मोहल्ले के किसी आदमी ने देख लिया कि कोई लड़का रोज़ मेरा पीछा करता है, तो मेरी तो छुट्टी ही हो जाएगी. पढ़ाई-लिखाई सब बंद, लेकिन मधुला काफ़ी हिम्मती थी. कहती, “छोड़ यार, बच्चू ने अगर ज़रा भी ऐसी-वैसी हरकत की, तो बस, उसके गाल और मेरी सैंडल. नानी याद दिला देंगे.”
फ़िलहाल, उसने कभी कोई ऐसी-वैसी हरकत नहीं की. बड़ा अजीब लड़का था. एक बार कुछ लड़कों ने हम पर कोई रिमार्क पास किया, तो महाशय ने तुरंत उन्हें आड़े हाथों लिया था, “शर्म नहीं आती, अपने ही कॉलेज की लड़कियों से छेड़छाड़ करते हुए? क्या यही तुम लोगों की शराफ़त है कि रास्ते चलती लड़कियों के साथ बदतमीज़ी करो.” बस, उसी दिन से मधुला ने उसका नामकरण कर दिया ‘शराफ़त अली’. कुछ महीनों बाद वह अचानक ही ग़ायब हो गया था और हमारी आंखें अनचाहे ही उसे ढूंढ़ने लगी थीं.
आज भी मुझे याद है, शराफ़त अली रिक्शे के पीछे चलते-चलते गाना गाता था, आवाज़ अच्छी थी उसकी. बढ़िया व सलीकेदार कपड़े भी पहनता था. किसी संभ्रांत घराने का लगता था. कभी मेरी नज़र मिल जाती थी, तो बड़ी अदा से माथे के बाल झटककर पीछे कर लेता था. कभी-कभी हम दोनों सहेलियां उसके बारे में काफ़ी अटकलें लगाती रहती थीं, पर कभी कोई सुराग हाथ नहीं लगा. मधुला कहती थी, “राधिका, वो सच में तेरे पीछे ही आता है, जिस दिन मैं अकेली होती हूं न, फर्राटे से साइकिल भगाता है. सच! मेरा कोई ऐसा दीवाना होता, तो मैं भी अपना दिल चांदी की तश्तरी में सजाकर पेश कर देती. तू तो बड़ी रूखी है.”
हम दोनों पक्की सहेलियां थीं, लेकिन हमारे घरों का माहौल काफ़ी भिन्न था. मधुला के पिता आर्मी में थे और मेरे पापा पुलिस में. हम भाई-बहन बहुत ही कठोर अनुशासन में पले-बढ़े थे. उचित-अनुचित, सही-ग़लत व मान-मर्यादा का पहरा हमारे मन को बांधे रखता था, जबकि मधुला पर अधिक प्रतिबंध नहीं थे. वो जब चाहे, जहां चाहे, साइकिल उठा निकल लेती थी. लड़कों से भी बड़ी सहजता के साथ बातें कर लेती थी, लेकिन मैं अनुशासन के तले कुछ ज़्यादा ही संकोची हो गई थी. परिस्थितियों के अंतर के कारण हमारे विचारों में भी अंतर था. फिर भी हम दोनों दो शरीर एक जान माने जाते थे. हर बात शेयर करते और हमेशा एक-दूसरे को प्रोटेक्ट भी करते थे. कॉलेज भी साथ जाते और यथासंभव साथ ही रहते थे. पर अगर कभी मैं अकेली पड़ जाती और अगल-बगल से कोई लड़का गुज़रता, तो हालत ख़राब हो जाती थी. कभी हनुमान चालीसा, तो कभी गायत्री मंत्र. जब भी सन् साठ-पैंसठ के माहौल की ये बातें मुंबई में पली-बढ़ी और अब यूएसए में पढ़नेवाली अपनी बेटी रिचा व उसकी सहेलियों को सुनाती हूं, तो वे हंस-हंसकर लोट-पोट होने लगती हैं.
बीसों काम बिखरे पड़े थे, पर मन तो घूम-घूमकर अतीत के गलियारों से गुज़र रहा था. मधुला से आज भी पहले जैसा ही संपर्क जुड़ा हुआ है. उससे बात करना हमेशा ही मन को फ्रेश कर देता है और आज तो उसका सुझाव कुछ नए सपने सजा गया. “लड़का अच्छा लगा है, तो रिचा के लिए सोच न. अगर हो सके, तो दोनों को मिलवा दे.” टेलीफोन भी क्या कमाल का यंत्र है, ऐसा बेतार का तार कि सात समंदर पार की दूरी पलभर में पाट दे और अब तो सुविधा भी ऐसी कि ना ऑपरेटर चाहिए, ना ज़्यादा ख़र्च की चिंता. रात-दिन का फ़र्क़ देख, जब चाहे अपनों का साथ महसूस कर लो. यंग जनरेशन को संभवतः फेसबुक या स्काइप ज़्यादा सुविधाजनक लगते हैं, लेकिन फुर्सत में लेटकर गपियाने का जो मज़ा फोन पर है, वह कहीं और कहां? 50-60 वर्ष पुरानी या भूली-बिसरी यादों में से बहुत कुछ सरक चुका है, लेकिन कुछ यादें या बातें जागती आंखों में कभी भी चलचित्र-सी उतर आती हैं और उम्र के सारे पैमाने भुलाकर उसी पड़ाव पर पहुंचा देती हैं, जिसे हम बिसराकर भी बिसरा नहीं पाते हैं. कभी-कभी मैं सोचती हूं, ऐसी मधुर स्मृतियों की साकार व सजीव होती भावनाओं और संवेदनाओं का संसार फेसबुक से चिपके लोग क्या कभी समझ पाएंगे?
“मॉम किस दुनिया में हो? तुम्हें बेल भी नहीं सुनाई दी?” रिचा ताला खोलकर अंदर आ चुकी थी. मतलब दो बज गए. 11.30 से 2 बजे तक मैं ऐसे ही बैठी रही क्या? मैं झटके से उठ खड़ी हुई.
“अरे! किसी दुनिया में नहीं थी. बस, तेरी मधुला मौसी से बात की थी, तो वही नई-पुरानी बातों को सोच रही थी?”
“क्या कह रही थीं मौसी?”
“कुछ ख़ास नहीं, तेरे लिए किसी लड़के का ज़िक्र कर रही थी.”
“हे भगवान! कितने अजीब हो तुम लोग! बात भी करती हो, तो मेरे लिए लड़का खोजती हो. अरे! कभी तो मेरे करियर की चिंता कर लिया करो. ख़ैर, कुछ मज़ेदार बात हो तो बताओ, वरना मुझे ज़ोर की भूख लगी है.”
“बात तो बहुत इंट्रेस्टिंग है, पर पहले चलकर खाना खा ले और वादा कर कि ग़ुस्सा नहीं करेगी.” कुछ देर बाद पूरी बात सुनकर रिचा बोली, “मां इस तरह किसी अनजान व्यक्ति को घर बुला लेना ठीक है क्या? हम दोनों अकेले रहते हैं. बुलाना ही था, तो पापा के लौटने के बाद बुला लेतीं. 2 महीने बाद तो पापा आ ही रहे हैं.”
विदेश में रहते हुए भी रिचा पूरी तरह से भारतीय है. शायद इसलिए कि बचपन के 15 वर्ष उसने अपने देश में अपनों के साथ जीए हैं और अपने रिश्तों व संस्कारों से पूरी तरह जुड़ी है. जो भारतीय बच्चे यहीं जन्मे व यहां के माहौल में बड़े हुए हैं, वे थोड़े अलग हैं. सभी भारतीय परिवार अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति से जुड़ा रखना चाहते हैं, जिन परिवारों में पैरेंट्स अपनी मातृभाषा में बातचीत करते हैं, वो बच्चे भाषा समझते तो हैं, लेकिन बोलते नहीं हैं. शायद यही वजह है कि वो पूरी तरह अपने देश, संस्कार या संस्कृति से जुड़ नहीं पाते हैं. भाषा इन सबको संजोए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
रिचा की बात ठीक ही है. मैंने ही जल्दबाज़ी कर ली. किसी अनजान व्यक्ति को बुलाना ही क्यों? पर क्या करती, मेरा इलाहाबाद प्रेम ही ऐसा है.
“चल, अब तो ग़लती हो ही गई है. वो आए, तो ठीक से बात करना.”
“ठीक है, लेकिन अगर तुम सोच रही हो कि मैं उसे भैया-वैया कहूंगी, तो थिंक अगेन. मेरे लिए सब ऐरे-गैरे भाई-बंधु नहीं हैं. तुम्हारी तरह पूरे मोहल्ले को मैं अपना रिश्तेदार नहीं मान सकती.”
“हां-हां, जैसा चाहो, जो चाहो, कहना. बस, उससे ठीक से बात करना.”
रविवार को निश्‍चित समय पर सिद्धार्थ वर्मा आया. ऐसा लगा, जैसे कोई पुरानी जान-पहचान हो. चाल-ढाल, नैन-नक्श और तहज़ीब का मिला-जुला सुदर्शन व्यक्तित्व मन को आकर्षित कर गया और बीच-बीच में झलकता इलाहाबादी लहज़ा तो मेरे मन को और भी भला लग रहा था. हर व़क़्त बेटी के लिए पढ़ा-लिखा सुयोग्य वर ढूंढ़ती आंखों में एक चमक-सी लहरा गई. मधुला का सुझाव ध्यान आ गया और मेरा मन रिचा के ब्याह का सपना संजोने लगा.
“मैं चाय बनाती हूं और कुछ खाने के लिए भी लाती हूं.” कहकर उठने लगी, तो रिचा बोली, “मां, तुम बैठो. मैं बनाकर लाती हूं.”
“अरे, नहीं-नहीं, तुम लोग हमउम्र हो, बैठकर बातें करो. बस, मैं अभी आई.”
चाय-नाश्ता लेकर आई, तो देखा दोनों मेरी उपस्थिति से बेख़बर यूएसए के अपने-अपने अनुभव व व्यथा-कथा में डूबे हैं. मन को सुकून मिला. चलो, रिचा को भी कोई अपना-सा दोस्त मिल गया. कुछ ही दिनों में परिचय प्रगाढ़ होता-सा लगा. दोनों को ही एक-दूसरे के साथ समय बितानाअच्छा लगने लगा था. कभी मुझे लगता, जैसे घर बैठे ही दामाद मिल गया. पर कभी मन कहता कि जब तक सिद्धार्थ की ओर से कोई संकेत न मिले, ऐसी बात सोचना भी मूर्खता है. ऐसे होनहार लड़कों के लिए रिश्तों की क्या कमी? मां-बाप भी आस लगाए होंगे. नौकरी मिलते ही शादी करने की सोच रहे होंगे. फिर भी प्रस्ताव की आशा लिए मेरा मन उन दोनों की मित्रता को पनपते देख सुकून पाता रहा.
लड़का शरी़फ खानदान से है. सारा परिवार पढ़ा-लिखा है. पिता यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स डिपार्टमेंट के हेड हैं. इस समय पति विजय का ना रहना मुझे बहुत खल रहा था. फोन पर ऐसी बातें थोड़े ही की जा सकती हैं. कभी-कभी उन दोनों की आंखें कुछ कहती-सी लगतीं, तो कभी लगता मात्र सीधी-सच्ची दोस्ती है. कभी-कभी मन में कुछ खटकता भी था कि कहीं सिद्धार्थ के लिए ये दोस्ती केवल टाइमपास न हो. फिर लगता, नहीं टाइमपास नहीं है. दोस्ती के अलावा भी कुछ तो ख़ास है इनमें. वैसे भी आज की जनरेशन की दोस्ती की परिभाषा का दायरा भी भिन्न है. आशाओं और आशंकाओं के बीच दिन गुज़रते गए और एक दिन सिद्धार्थ ने सूचना दी, “पापा, किसी कॉन्फ्रेंस के लिए यहां आ रहे हैं. आपसे और रिचा से मिलना चाहते हैं.”
मन में जैसे वीणा के तार झनझना उठे. सिद्धार्थ की मां नहीं हैं, यह मुझे पता था. यह भी जान चुकी थी कि बेटे की ज़िंदगी के हर छोटे-बड़े फैसले में पिता की सहर्ष सहमति अनिवार्य है और यह भी कि बेटे की हर ख़ुशी पिता के लिए सर्वोपरि है. रिश्ता जुड़ने व बेटी के सुखद भविष्य की कल्पना में उसके विक्षोभ की संवेदना का आभास पहली बार मन को स्पर्श कर गया. क्या वाक़ई मेरी लाडली-दुलारी बिटिया पराई होने जा रही है?
निश्‍चित दिन के लिए रिचा को तैयार कर लिया था. रिचा बार-बार कह रही थी, “पापा के लौटने पर सब कुछ तय करती, तो अच्छा होता.” रिचा के चेहरे को हथेलियों से ऊपर उठाकर, पलभर उसकी आंखों में झांकते हुए मैंने धीरे से पूछा “और अगर पापा ना कर देंगे तो?” रिचा के चेहरे पर छलकी आशंका और निराशा ने सब कुछ कह डाला. अब तो यह संबंध होना ही है. मैंने फोन पर विजय को आदि से अंत तक सब बता दिया. उनकी प्रतिक्रिया बस इतनी ही थी, “देख लो, थोड़ी समझदारी से सब हैंडल करना.”
शाम 5.30 बजे मिलने का कार्यक्रम तय हुआ है. मैं और रिचा धड़कते दिल से वर्मा साहब का इंतज़ार करने लगे. सिद्धार्थ सीधा अपने ऑफ़िस से आनेवाला था, ठीक पौने छह बजे घंटी बजी. इंतज़ार के ये 15 मिनट 15 सालों-से लगे. दरवाज़ा खोलने पर सामने खड़े आगंतुक को देख मैं चौंक-सी गई और लगा वो भी दुविधा में पड़ गए हैं, फिर उन्होंने पता निकालकर चेक किया कि सही जगह ही आए हैं न.
मैं बरसों पहले के शराफ़त अली और आज के वर्मा साहब में उलझने लगी थी. मेरी दुविधा की उपेक्षा करते हुए रिचा ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया. जानती थी, जाने के बाद मेरी बेटी मुझे लंबा लेक्चर पिलाएगी. “आपको हो क्या जाता है? कभी रास्ते चलते आदमी को घर बुला लेती हो और कभी घर आए मेहमान को दरवाज़े पर खड़ा रखती हो. आई रियली डोन्ट अंडरस्टैंड योर बिहेवियर मॉम.”
सबके बैठने के बाद भी दो मिनट तक चुप्पी छाई रही. इतने में सिद्धार्थ भी आ गया. मैंने स्थिति को सहज रूप देने का पूरा प्रयास किया. फिर वर्माजी की भी किसी बात से ऐसा नहीं लगा कि वो मुझे जानते हैं. इस अप्रत्याशित भाव को मन का भ्रम समझ मैं औपचारिक बातचीत में मशगूल हो गई. अचानक सिद्धार्थ बोला, “आंटी, अगर आपकी और पापा की इजाज़त हो, तो हम दोनों फिल्म देख आएं. हम दोस्तों का प्रोग्राम काफ़ी पहले से तय था.”
मैं कुछ कहती उसके पहले ही वर्मा साहब बोल उठे, “हां-हां, जाओ, हो आओ.” और उन दोनों के निकलते ही बोले.
“अब मैं भी चलूंगा.”
“अरे, नहीं-नहीं, आप अभी कैसे जा सकते हैं? अभी तो आपने कुछ खाया-पिया भी नहीं है. पहली बार हमारे घर आए हैं. मैं ऐसे नहीं जाने दूंगी.”
“सच! ठीक है, जैसी आपकी मर्ज़ी.”
मैं रसोई में गई झट से खाने-पीने की सामग्री ट्रे में सजाकर ले आई. चाय पीते-पीते मैंने ही मौन तोड़ा, “आप देख ही रहे हैं. दोनों एक-दूसरे को काफ़ी पसंद करते हैं.”
“जी.”
“क्या राय है आपकी? अब तो रिचा को भी देख लिया है आपने.”
“उसे अभी कहां देखा? मैं तो आपको देख रहा था…”
“जी…” मुझे पसीना आने लगा था. हाथ ठंडे हो गए थे, गला सूखने लगा था.
“सोच रहा था कि काश! 30 साल पहले भी ऐसा स्वतंत्र व पॉज़ीटिव माहौल होता. आप बिल्कुल नहीं बदली हैं, वैसी ही संकोची व ख़ूबसूरत हैं. बाइ द वे, आपकी वो टॉम बॉय सहेली कहां हैं आजकल, जो हमेशा सुरक्षा कवच की तरह आपके साथ रहती थीं?”
मैं नहीं जानती मैंने क्या और कितना सुना. हां, बरसों बाद मेरी आंखें शुतुरमुर्ग की तरह ज़मीन खोजने लगी थीं. मैं मधुला को बताने के लिए उतावली हो उठी थी कि शराफ़त अली उतने भी शरीफ़ नहीं हैं, जितना हम उन्हें समझते थे.

Prasoon Bhargav
        प्रसून भार्गव

 

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