मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया तो क्या हुआ, रिश्ते सिर्फ़ खून के ही तो नहीं होते, कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जो खून के रिश्तों से भी अधिक प्रिय होते हैं. ऐसा ही है मेरा तुम्हारा रिश्ता है. इस बात से तुम इन्कार नहीं कर सकती. कभी-कभी अपनों का अधिकारपूर्वक रूठना अच्छा लगता है, लेकिन अब तुम्हें रूठे बहुत दिन हो गए, हो सके तो कुछ दिनों के लिए यहां आ जाओ, तुमसे मिलने का बहुत मन कर रहा है.
कभी-कभी जीवन में कितनी अजीब सी परिस्थितियां आ जाती हैं, जब दो व्यक्तियों में सालों से चली आ रही आपसी समझ सिर्फ़ एक छोटी सी बात से ही पल भर में समाप्त हो जाती है.
जब अत्यंत आत्मीय रिश्ते में दरार पड़ने लगती है, तो ऐसा लगता है मानों अपने शरीर का कोई हिस्सा निकालकर बाहर फेंक दिया गया हो और वह हिस्सा चीत्कार कर कह रहा हो, 'मुझे वापस बुला लो, मैं तुम्हारा ही अंग हूं.'
जीवन के कुछ यथार्थ वाकई कड़वे होते हैं, परंतु कभी-कभी ग़लतफ़हमियां भी जाने-अनजाने कड़वाहट को जन्म दे देती हैं.
हां, ग़लतफ़हमी का ही तो शिकार बनी थी रोशनी, ट्रेन की खिड़की पर सिर टिका कर वह किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी.
शाम ढलने के साथ थोड़ी-थोड़ी ठंड हो चली थी. रोशनी ने खड़े होकर ऊपर की बर्थ पर सो रही शैली को अच्छे से चादर ओढ़ा दी.
शैली अपने दादा-दादी से मिलने जा रही है. कितना शौक है उसे दादा-दादी के पास जाने का. और स्वयं उसे..? उसने सीट पर बैठकर आंखें मूंद लीं, विचारों के जाल ने फिर से उसे जकड़ लिया.
शैली की दादी यानी उसकी सासू मां जिन्हें वह 'मां' कहकर ही सम्बोधित करती है.... मां उसकी आंखों के आगे उनका चेहरा घूम गया.
छह साल पहले जब वह घर से विदा हो रही थी, उस वक़्त उसकी मम्मी ने अपनी सालों की शिक्षा का सार सिर्फ़ चन्द शब्दों में ही कह दिया था.
"जा बेटी, अपने घर सुखी रह, बेटी के दो जन्म होते हैं, समझ लेना पिछले जन्म में मैं तेरी मां थी, आज तेरा नया जन्म होने वाला है. आज से तेरी नई मां, तेरी सासू मां और तेरे पिताजी तेरे ससुर जी हैं. अगर तुझे ये बात समझ में आ गई, तो तू जीवन में हमेशा सुखी रहेगी."
मां के हाथ का स्पर्श और पापा का वात्सल्यमय, रुंधा हुआ कंठ आज भी उसे ऐसे याद है, मानो कल की ही बात है.
दिल्ली वापस आकर आदित्य काम पर जाने लगे और रोशनी अपने नए घर को सजाने-संवारने में जुट गई.
उस दिन उसे अपनी मम्मी की बहुत याद आ रही थी. कलम उठाकर उसने ख़त लिखना शुरू किया-
आदरणीय मम्मी... फिर उसे लगा, उसे ये ख़त मां को लिखना चाहिए और फिर उसने एक प्यार भरा खत मां को लिख डाला.
कुछ ही दिनों में उसे वैसा ही प्यार भरा जवाब मिला. मां की ओर से और यहां से शुरुआत हुई स्नेह के एक अनोखे बंधन की. मां ने रोशनी के हर ख़त का जवाब दिया.
नए घर में कदम रखते ही उसने अपना नया जन्म ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार किया. पति के रूप में आदित्य को पाकर उसका जीवन मानो चरितार्थ हो गया.
रोशनी के सास-ससुर जयपुर में रहते थे. आदित्य की नौकरी दिल्ली शहर में थी इसलिए शादी के एक हफ़्ते बाद ही वे दोनों दिल्ली वापस आ गए थे.
हां, वह एक हफ़्ता ससुराल में बहुत अच्छा लगा था रोशनी को, नई मां व पिताजी के पास. पल-पल वह अपनी मम्मी के कहे शब्दों को सहेजती, बटोरती रही और सचमुच उन सात दिनों में उसे लगा, हां अब यही हैं उसके मां और पिताजी. उसने निश्चय कर लिया कि वह अपनी नई मां से उतना ही प्यार करेगी, जितना वह अपनी मम्मी से करती थी. पिताजी से उतना ही लाड़ जितना वह पापा से करती थी. परंतु क्या उसे वह प्यार मिल पाएगा? इसी ऊहापोह में ही वह हफ़्ता बीत गया था.
हर बार दोनों की आत्मीयता बढ़ती गई. रोशनी को मानो सब कुछ मिल गया.
धीरे-धीरे समय सरकता रहा. इस बीच आदित्य और रोशनी जयपुर भी गए. कुछ दिनों तक साथ रहकर रोशनी को मां का स्वभाव बहुत अच्छा लगा, स्नेह व ममता का भंडार, बिल्कुल वैसा ही जैसा उसने चाहा था. मां ने उसे घर में हंसने-बोलने और कोई भी बात कहने की पूरी-पूरी स्वतंत्रता दी, उतनी ही जितनी इस घर में आदित्य की बहन रचना को मिली हुई थी. उन्होंने रोशनी को कभी भी यह एहसास नहीं होने दिया कि वे सास हैं और रोशनी बहू.
फिर आया वह समय, जो हर स्त्री के जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण समय होता है. जब रोशनी के पैर भारी हुए.
मां व मम्मी दोनों ने ही रोशनी को अपने पास बुलाना चाहा, लेकिन रोशनी मां के पास चली गई थी.
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फिर उसकी बेटी शैली हुई. शैली नाम मां ने ही रखा था, उसे भी बहुत पसंद आया था. मां ने ख़ुद जी जान से रोशनी की सेवा की, तब उसे मां व मम्मी का चेहरा बहुत कुछ मिलता-जुलता लगा था.
पिताजी ने भी अपनी ओर से कोई कसर। नहीं छोड़ी थी. अपनी ओर से वे स्वयं उसे पौष्टिक पकवान बनाकर खिलाते रहते थे. सूजी की खीर व धुली मूंग की दाल उसे आज भी याद है.
मां रिश्तेदारों के बीच रोशनी की प्रशंसा के पुल बांधते नहीं थकती थीं.
"रोशनी बहुत समझदार है. ये तो मेरी दूसरी बेटी है. बिल्कुल रचना जैसी अज़ीज़ है मुझे, भगवान करें सबको ऐसी ही बहू मिले."
शैली को लेकर रोशनी एक महीने के बाद वापस चली गई. दिल्ली आकर भी पत्रों का सिलसिला चलता रहा और कभी-कभी फोन पर भी बात होती रहती.
आदित्य की बहन रचना ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली थी, अतः उसके लिए उपयुक्त वर तलाश कर उसका विवाह निश्चित कर दिया है.
अगले दिन से कुछ ऐसा ही हुआ. मां की सभी बातों को वह सिर झुकाकर मानती चली गई. अब रिश्तेदारों के मुंह बंद हो चुके थे. परंतु रोशनी के अंदर जैसे सब कुछ टूट कर बिखर चुका था.
रोशनी शादी से एक महीने पहले ही दिल्ली से पहुंच गई, ताकि छोटे-मोटे कामों में मां की मदद कर सके.
धीरे-धीरे सभी रिश्तेदार आने लगे. शादी के दो दिन पहले तक सभी रिश्तेदार आ चुके थे.
घर का वातावरण अत्यंत ही ख़ुशगवार हो गया था. रोशनी सारा दिन काम में जुटी रहती, ताकि किसी को भी किसी प्रकार की तकलीफ़ न हो व शिकायत का मौक़ा न मिले.
उस दिन मां बुआ, ताई, चाची, मौसी व अन्य कुछ रिश्तेदारों के बीच बैठी बातें कर रही थीं. तभी उन्होंने रोशनी को पुकारा. रोशनी जब वहां पहुंची तो मां बोलीं, "रोशनी, खाना बन गया क्या?"
"नहीं, बस बनाने ही जा रही हूं." रोशनी ने कहा.
"ऐसा करो, आलू मटर की सब्ज़ी व मूंग की दाल बना लो." मां ने कुछ सोचते हुए कहा. रोशनी अधिकार से बोली "नहीं मां, ये चीज़ें रात को बनाएंगे, अभी चने बना रही हूं."
"अच्छा चल, जैसी तेरी मर्ज़ी." मां ने आश्वस्त होकर कहा.

रोशनी रसोई की ओर जाने के लिए मुड़ी ही थी कि उसके कानों में किसी रिश्तेदार की आवाज़ पड़ी, "कैसी बहू है लाजो तेरी, बढ़ा जवाब देती है."
तभी दूसरी आवाज़ आई, "कितनी मुंहफट है, हमने तो कभी अपनी सास को पलटकर जवाब नहीं दिया."
तीसरी आवाज़ थी, "लाजी बहुत दब के रहती है अपनी बहू से, वरना डांट ना देती."
"क्या ज़माना आ गया है... आजकल की न्यू जनरेशन... हमारी मजाल थी हम कभी मुंह खोलें अपनी सास के सामने. उन्होंने जो कह दिया, सो कह दिया और ज़रा रोशनी को तो देखो..."
अपमान की अनुभूति से रोशनी की आंखें भीग गईं. उसने कसकर उन्हें भींच लिया. मां का प्रत्युत्तर सुनने के लिए वह बेचैन थी, परंतु उसे मां का कोई जवाब नहीं सुनाई दिया. क्यों..? मां ने कुछ बोला क्यों नहीं?.. क्या वह वास्तव में ऐसी ही थी जैसे वे सब उसके बारे में सोच रही थीं?
"धीरे बोली, वो सुन रही होगी." किसी समझदार पुरुष की आवाज़ थी.
"सुन रही है तो सुन ले..." ये आवाज़ किसी महिला की ही थी.
"ये तो सच है कि ये नई पीढ़ी ना तो बड़ों का आदर-सत्कार करना जानती है, ना ही इनके हृदय में किसी के लिए प्रेम व त्याग की भावना है.
रोशनी रसोई में रो रही थी. मां का कोई जवाब नहीं सुनाई दिया उसे. इसका मतलब है, मां भी ऐसा ही सोचती है तभी शायद किसी रिश्तेदार को वे प्रत्युत्तर नहीं दे पाईं, न ही उनके व्यंग्य-बाणों का खंडन किया.
रोशनी सोचने लगी, क्या अपनी मम्मी के साथ भी वह ऐसे ही बात नहीं करती थी...
क्या एक बहू का सास के साथ अधिकारपूर्वक बात करना उनका अपमान करना है. यही स्वतंत्रता तो चाहती है हर बहू अपनी सास के साथ. जब एक बेटी अपनी मां के साथ तर्क-वितर्क कर सकती है तो क्या सास के साथ किसी बात पर तर्क करना बहस करना है?.. क्या किसी बात पर विचारों का मेल न होना और उसे कह देना सास की शान में गुस्ताख़ी है?.. नहीं मन में आदर, प्यार व श्रद्धा होते हुए भी वैचारिक विभिन्नता हो सकती है. इसे बुरे स्वरूप में क्यों लिया जाता है?
उसका मन किया कि वह बाहर जा कर ज़ोर से चिल्लाकर कहे, "मेरी सास मेरी मां है. जब आप लोग हमारे आपसी सम्बंधों की गहराई को नहीं समझते, तो क्यूं ऐसी बातें कर रहे हैं. बहू बेटी होती है, यह बात आप लोगों के लिए सिर्फ़ किंवदंती होगी, परंतु मेरी सास ने यह बात सच करके दिखलाई है. में उनसे लड़ती-झगड़ती भी हूं, बिल्कुल वैसे ही जैसे अपनी मम्मी से लड़ती थी, क्योंकि मेरी सास ने यह अधिकार मुझे दिया है."
परंतु... वह ऐसा नहीं कर पाई, क्योंकि जब मां ने स्वयं ही उसका साथ नहीं दिया, तो वह क्या मुंह लेकर बाहर जाती. उसने चुपचाप वही खाना बना दिया जो मां ने कहा था.
रोशनी बहुत उदास हो गई थी. उसे मां से शिकायत थी. उसे लगा जैसे वह बेकार ही उन पर अपना अधिकार जताती रहती है, अब नहीं करेगी वह ऐसा. अगर मां भी यही चाहती है कि मैं उनकी हर बात पर हां में हां मिलाऊं, तो ठीक है अब ऐसा ही होगा.
अगले दिन से कुछ ऐसा ही हुआ, मां की सभी बातों को यह सिर झुकाकर मानती चली गई. अब रिश्तेदारों के मुंह बंद हो चुके थे, परंतु रोशनी के अंदर जैसे सब कुछ टूटकर बिखर चुका था.
मां शादी के कामों में इतनी व्यस्त व तनावग्रस्त थी कि वे रोशनी की ओर ध्यान ही नहीं दे पाई और ये बात उसके संदेह को विश्वास में बदलने में कारगर सिद्ध हुई. उसे विश्वास हो गया कि मां उससे ऐसे ही व्यबहार की अपेक्षा रखती है.
शादी ख़ुशी-ख़ुशी सम्पन्न हो गई और फिर रोशनी दिल्ली आ गई, साथ में ले आई मन पर एक भारी बोझ, जैसे उसकी ख़ुशियों का घरौंदा अचानक ही टूट गया हो.
दिल्ली आकर उसने मां को एक पत्र भी नहीं डाला, न ही फोन किया. कुछ दिनों बाद मां का फोन आया था और उन्होंने पूछा था "रोशनी नाराज़ हो क्या?"
"नहीं तो." उसने हंस कर कहा था, परंतु रिसीवर नीचे रखने के बाद वह फूट-फूट कर रो पड़ी थी.
नाराज़ ही तो थी वह मां से. क्यों वे रिश्तेदारों का मुंह बंद नहीं कर पाई थीं, अब वह कभी एक बेटी की तरह उनसे बात नहीं करेगी, एक बहू की तरह सिर्फ़ सिर झुकाकर उनके आदेश का पालन करेगी. जब उसकी भावनाओं को कोई नहीं समझता है तो क्यों वह मां-बेटी जैसे सम्बंधों के स्वप्न देख रही है?
इसी तरह दिन बीतते गए. रोशनी कभी-कभी मां को याद करके उदास हो जाती. आदित्य जब उसकी उदासी का कारण पूछता, तो वह टाल जाती, परंतु एक दिन जब उससे नहीं रहा गया, तो वह आदित्य के कंधे से लगकर फूट-फूट कर रो पड़ी.
आदित्य ने हैरानी से पूछा, "अरे क्या हुआ? बताओ तो सही. ऐसा कौन-सा दुख है तुम्हें, जो इतने दिनों से तुम मुझसे भी नहीं कह पा रही हो?"
रोशनी ने अपनी मन की गांठ आदित्य के सामने खोल दी. पूरी बात सुनकर आदित्य रोशनी से सहानुभूति दिखाने की बजाय ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा. रोशनी मूर्खो के समान अवाक होकर उसका मुंह देखती रह गई. जो बात उसके लिए इतनी अहम् व गम्भीर थी, आदित्य उस बात को इतना हल्का समझकर उसका मज़ाक उड़ा रहा है.
"आप हंस क्यों रहे हैं?" रोशनी ने हैरान होकर पूछा.
आदित्य उसकी ओर देखकर बोला, "इसलिए कि तुम पागल हो."
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"मैं पागल हूं... क्यों, मैंने ऐसा क्या कहा?"
"रोशनी, तुम्हें बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी हो गई है मां के बारे में. जिस दिन और जिन रिश्तेदारों की बात तुम कर रही हो, उस दिन मैं भी वहीं पर था. जैसे ही तुम अंदर गई थीं, उसी वक़्त रचना के ससुराल से कुछ लोग हमारे घर आ गए थे इसलिए मुझे व मां को दूसरे कमरे में जाना पड़ा था. मां ने या मैंने वे सब बातें सुनी ही नहीं थी. हां बाद में रचना से ये सब पता लगा था तो मां ने उन रिश्तेदारों से काफ़ी देर तक जवाब-तलब किया था. मां ने उन्हें स्पष्ट शब्दों में समझा दिया था कि आइन्दा वे तुम्हारे बारे में एक शब्द भी नहीं सुनना चाहेंगी, और तुम... तुम एक ग़लतफ़हमी पालकर उसे दिल से लगाकर बैठ गई हो. पागल नहीं कहूं तुम्हें, तो क्या कहूं?"
रोशनी आश्चर्यमिश्रित हर्ष से बोली, "तो क्या मां उस समय वहां पर नहीं थीं?"
"बिल्कुल नहीं, अगर वे वहां पर होतीं तो किसी का मुंह न खुलता, मेरी बात पर यक़ीन न हो तो रचना से पूछ लेना." आदित्य बोला.
"और मैं इतने दिनों से मां को ही ग़लत समझ रही थी. ओह! कितनी बड़ी ग़लतफ़हमी हो गई मुझे उनके बारे में..." रोशनी की पश्चाताप हो रहा था.
उसी दिन रोशनी को मां का एक पत्र
मिला-
प्रिय बेटी रोशनी,
आशीर्वाद!
आज पूरे चार महीने दो दिन हो गए, तुम्हारा कोई ख़त नहीं आया. पहले तो तुम ऐसी न थी. मेरा जवाब पहुंचने से पहले ही तुम्हारा ख़त मुझे मिल जाया करता था, ये सोचकर बहुत अच्छा लगता था कि तुम्हें मेरे ख़तों का कितनी बेताबी से इन्तज़ार रहता है. बहुत अच्छा लगता था कि तुम मेरा इतना ध्यान रखती हो और इससे भी ज़्यादा यह कि तुम अपनी ज़िंदगी में वाक़ई मेरी ज़रूरत महसूस करती हो.
लेकिन इतने दिनों से तुमने कुछ लिखा क्यों नहीं? मुझे ऐसा लगता है कि तुम मुझसे रूठी हुई को. ज़रूर अनजाने में तुम्हें मेरी कोई बात बुरी लग गई होगी, वरना जान-बूझकर तो मैं तुम्हें कभी कोई दुख नहीं पहुंचा सकती.
मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया तो क्या हुआ, रिश्ते सिर्फ़ खून के ही तो नहीं होते, कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जो खून के रिश्तों से भी अधिक प्रिय होते हैं. ऐसा ही है मेरा तुम्हारा रिश्ता है. इस बात से तुम इन्कार नहीं कर सकती. कभी-कभी अपनों का अधिकारपूर्वक रूठना अच्छा लगता है, लेकिन अब तुम्हें रूठे बहुत दिन हो गए, हो सके तो कुछ दिनों के लिए यहां आ जाओ, तुमसे मिलने का बहुत मन कर रहा है.
आशीर्वाद सहित
तुम्हारी मां...
रोशनी की आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले. उसने भी तो अनजाने में मां को दुख पहुंचाया था. अब वह उनसे मिलने ज़रूर जाएगी.
"कल का टिकट निकलवा लूं जयपुर का?" आदित्य ने शरारत से पूछा.
"हां, मैं अटैची तैयार करती हूं."
रोशनी ने खिलखिलाकर कहा.
साड़ी का पल्लू खोंसती हुई वह अपनी अटैची में सामान जमाने के लिए उठ खड़ी हुई.
हवा के एक तेज झोंके से रोशनी के विचारों का सिलसिला थम गया, वह मुस्कुरा दी. हवा का थपेडा उसे बहुत अच्छा लगा, क्योंकि उसमें मां और उसके रिश्ते की सुगंध जो थी.
- शिखा मिड्ढा

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