कहानी- बदलते समीकरण 3 (Story Series- Badalte Samikaran 3)

स्त्री को देह के दायरे में बांधकर परिभाषित मत करो. देह से परे भी उसका अपना एक अस्तित्व है, अस्मिता है. देह पर अत्याचार हो सकता है, पर अस्मिता पर नहीं. देह मैली हो सकती है, पर चरित्र नहीं… स्त्री की सोच सार्वभौमिक है, उसे किसी दायरे में बांधकर रखना उसका अपमान करना है. यही सोच आज स्त्री को हर आततायी, अनाचारी से प्रतिशोध लेने को प्रेरित कर रही है… आख़िर क्यों न ले प्रतिशोध? क्या स्त्री ही सदा अग्निपरीक्षा देती रहेगी. ममा आज की स्त्री कमज़ोर नहीं है.

अब उसने सिविल सर्विसेस की तैयारी प्रारंभ कर दी. प्रथम बार में ही उसका नाम सफल केंडीडेट की सूची में था और उसने इंडियन पुलिस सर्विसेज़ में जाना चुना.

आख़िर हमारी बच्ची ने अपनी मंज़िल पा ली थी. उसकी ख़ुशी में ही हमारी ख़ुशी थी.

फ़ोन की अनवरत बजती घंटी ने उसकी तंद्रा को भंग कर दिया. फ़ोन उठाया, उधर दिव्या की आवाज़ थी, “ममा, आपने फ़ोन किया था.”

“हां, तुम्हारे यहां स्थानांतरण की ख़बर सुनकर मैंने इस ख़बर की पुष्टि करनी चाही थी.”

“कुछ फॉर्मेल्टी पूरी करनी होंगी. बस उसके बाद पहुंच जाऊंगी. काफ़ी दिनों बाद साथ रहने को मिलेगा.”

हम सब उसके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे. आख़िर वह दिन भी आ गया, जब दिव्या को आना था. हमारे अतिरिक्त, पुलिस स्टाफ भी उसके स्वागत की तैयारी में एयर पोर्ट पर पहुंचा हुआ था. बड़ी मुश्किल से हम उससे मिल पाए. तुरंत ही उसे ड्यूटी ज्वॉइन करनी थी.

अब तो मैं भी चाहने लगी थी कि दिव्या घर बसा कर सेटल हो जाए. जब भी उससे शादी की बात करती, वह कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देती या कहती मेरा काम ही ऐसा है जहां घर-गृहस्थी के लिए व़क़्त ही कहां है?”

दिन बीतते गए. पुलिस की नौकरी थी, अत: हर दूसरे-तीसरे वर्ष ही स्थानांतरण होता रहता था. विनय रिटायर हो गए थे. उनके प्रति चिंता ने मुझे उनके साथ ही रहने को मजबूर कर दिया था. विवाह के प्रति उसकी सोच में कोई परिवर्तन नहीं आया था. दिन-प्रतिदिन उसका व्यवहार रूखा होता जा रहा था. मैं सोचती शायद काम के प्रति अतिसंलग्नता ने उसे रूखा एवं संवेदनहीन बना दिया है.

उसकी व्यस्त दिनचर्या के साथ हम एडजस्ट हो रहे थे कि एक दिन पेपर पढ़ते हुए एक समाचार पर नज़र ठहर गई. लॉ कॉलेज की एक लड़की का उसके कॉलेज के ही कुछ लड़कों ने अपहरण करके बलात्कार किया. एक्सीडेंट का केस बनाने के उद्देश्य से अर्द्धमूर्छितावस्था में उसने मरने के लिए सड़क पर फेंक दिया, पर वह बच गई थी. दिव्या खन्ना इस केस की छानबीन कर रही हैं. वह दिन दूर नहीं है जब अपराधियों को उनके किए की सज़ा ज़रूर मिलेगी. पीड़िता निवा श्रीवास्तव ने पूर्ण सहयोग का वचन दिया है.

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यूं तो दहेज-हत्या, अपहरण एवं बलात्कार की घटनाएं रोज़ ही छपती रहती हैं, पर जिस बात ने उनका ध्यान आकर्षित किया, वह थी कि उस लड़की को न्याय दिलवाने में दिव्या महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. बुदबुदा उठी थी वह. बेकार में झंझट में पड़ रही है लड़की. न घर की रहेगी, न घाट की. कौन उसका हाथ थामेगा? सबसे ज़्यादा दुख तो उसे इस बात का था कि भुक्त भोगी दिव्या उसको न्याय दिलवाने के नाम पर उसकी छीछालेदर करवाएगी.

शाम को दिव्या घर आई. उसे चाय देते हुए अपने मन के द्वन्द्व को छिपा नहीं पाई तथा अपने मन का संशय उसके सामने रख ही दिया. सुनकर तिलमिला उठी थी वह, बोली, “ममा, हमारी ऐसी ही सोच अपराधियों को अपराध करने के लिए प्रेरित करती है. हम औरतें अगर अपने ऊपर हए जुर्म के प्रति आवाज़ नहीं उठायेंगी तो कौन उठाएगा? जहां तक बदनामी का प्रश्‍न है. उसने कोई गुनाह नहीं किया है. बिन किए अपराध की सज़ा मन-ही-मन भुगतते हुए वह पूरी ज़िंदगी कुंठा में क्यों गुज़ारे. अपराधियों को खुला क्यों घूमने दे. क्या इसलिए कि वे बेखौफ़ होकर इसी तरह की दूसरी घटना को अंजाम दे सकें?”

“पर बेटी, स्त्री का चरित्र ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है. अगर एक बार उसके चरित्र पर दाग लग गया तो मिटाए नहीं मिटता.” उसने पुन: कहा.

“ममा, स्त्री को देह के दायरे में बांधकर परिभाषित मत करो. देह से परे भी उसका अपना एक अस्तित्व है, अस्मिता है. देह पर अत्याचार हो सकता है, पर अस्मिता पर नहीं. देह मैली हो सकती है, पर चरित्र नहीं… स्त्री की सोच सार्वभौमिक है, उसे किसी दायरे में बांधकर रखना उसका अपमान करना है. यही सोच आज स्त्री को हर आततायी, अनाचारी से प्रतिशोध लेने को प्रेरित कर रही है… आख़िर क्यों न ले प्रतिशोध? क्या स्त्री ही सदा अग्निपरीक्षा देती रहेगी. ममा आज की स्त्री कमज़ोर नहीं है. मैं कमज़ोर थी ममा, जो चुप रह गई, पर वह लड़की कमज़ोर नहीं है. आज उस जैसी ही लड़कियों की आवश्यकता है. कम-से-कम अपराधी को सज़ा दिलवाकर कुंठा से मुक्त तो हो सकेगी. मेरी तरह ताउम्र बिन किए अपराध की सज़ा तो नहीं भोगेगी.” कहते हुए वह सुबक पड़ी थी. मानो उस रात का एक-एक पल उसकी आंखों में तिर आया हो.

जब तक वह कुछ कहती, वह उठी और अपने कमरे में चली गई. जिस दिव्या को वह कठोर, अनुशासित, कर्मठ, काम के प्रति समर्पित समझती रही थी, वह अंदर-ही-अंदर इतनी खोखली हो चुकी है, उसने सोचा भी न था. तो क्या वह आज भी उस घटना को नहीं भूली है?

“कम-से-कम अपराधी को सज़ा दिलवाकर कुंठा से मुक्त तो हो सकेगी.” बार-बार यह वाक्य उसके दिल में हथौ़ड़े की तरह प्रहार कर रहा था…

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उसे बदलते समीकरणों का एहसास हुआ. दिव्या ने उसके सम्मुख एक नई औरत का खाका खींच दिया था. आग की भीषण लपटों से कुंदन बन निकली लड़की, जो सब वर्जनाओं से मुक्त हो चुकी है, वह देह की सीमाओं से परे, स्वाभिमान और आत्मसम्मान से जीना चाहती है. पुरुषों के एकछत्र साम्राज्य को चुनौती देती, तेज़ी से आगे बढ़ती, हर जगह अपने निशां छोड़ती, अपनी पहचान बनाने में जुटी है.

“ममा, मीटिंग में जा रही हूं. आने में देर हो सकती है. खाने पर इंतज़ार मत करना.”

थोड़ी देर पहले सुबकती दिव्या और सामने खड़ी दिव्या में काफ़ी फ़र्क़ था. दिव्या के चेहरे पर ग़ज़ब का आत्मविश्‍वास झलक रहा था. कोई बात थोड़ी देर के लिए भले ही उसे दंश दे दे, पर अपनी परेशानी की वजह से वह अपने कर्त्तव्य से मुंह नहीं मोड़ेगी. हर समस्या का डटकर मुक़ाबला करेगी. अपने ऊपर हुए अन्याय का प्रतिकार वह भले ही न कर पाई हो, पर दूसरे के ऊपर हुए अन्याय पर वह चुप नहीं बैठेगी. उसे न्याय दिलवाकर रहेगी. एकाएक उसे दिव्या पर गर्व हो आया था.

– सुधा आदेश

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