कहानी- एक और एक ग्यारह 2 (Story ...

कहानी- एक और एक ग्यारह 2 (Story Series- Ek Aur Ek Gyarh 2)

 

हरदम भागती-दौड़ती सी मुंबई में किसी को फ़ुर्सत नहीं थी दूसरों के जीवन में दख़लअंदाज़ी करने की. सभी व्यस्त, अपने ही काम की धुन में रहते थे. यहां न कोई पूर्वा को जानता था, न ही उसके अतीत से किसी को लेना-देना था. उसके कमरे की साथिन नीलम, मस्त और ख़ुशमिज़ाज थी. उसे पूर्वा का व्यवहार अजीब लगता. बात करने पर कई बार संदेह होता कि वह उसकी बात सुन भी रही है या नहीं. हंसी की बात होने पर भी चेहरा भावहीन बना रहता.

 

 

 

 

… “ख़बरदार जो मुंह खोला तो.” पापा ने क्रोधित स्वर में कहा.
छोटा-सा शहर था वह संकुचित विचारोंवाला. बहुत लोग परिचित थे. इससे पहले जब भी ऐसा कोई हादसा हुआ, लड़की को ही भुगतना पड़ा, यूं जैसे उसने स्वयं ही बलात्कारी को निमंत्रित किया हो.
यह किस सभ्य समाज में रह रहे हैं हम?
दूसरे दिन कॉलेज न जाने पर मीरा शाम को उससे मिलने घर आ गई. बारिश में भीगने से बीमार न पड़ गई हो, यह देखने. उसे यह कहकर लौटा दिया गया कि पूर्वा कार्यवश अपनी मौसी के घर चली गई है, जबकि पूर्वा पर घर से तो क्या, अपने कमरे से बाहर आने पर भी पाबंदी लगा दी गई थी.
पर ऐसा कब तक चलता? कोई हल तो ढूंढ़ना ही था. पूर्वा को शहर से कहीं बाहर भेजना तय हुआ, कहीं भी. बस, इस शहर से दूर. मुंबई अच्छा विकल्प था. वहां कॉलेज में सीट मिलना सरल नहीं था, परन्तु दौड़-भाग कर के पूर्वा के पिता ने मुंबई के एक ऐसे कॉलेज में दाख़िला करवा लिया, जिसमें लड़कियों का होस्टल में रहने का
प्रबंध भी था.

 

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हरदम भागती-दौड़ती सी मुंबई में किसी को फ़ुर्सत नहीं थी दूसरों के जीवन में दख़लअंदाज़ी करने की. सभी व्यस्त, अपने ही काम की धुन में रहते थे. यहां न कोई पूर्वा को जानता था, न ही उसके अतीत से किसी को लेना-देना था. उसके कमरे की साथिन नीलम, मस्त और ख़ुशमिज़ाज थी. उसे पूर्वा का व्यवहार अजीब लगता. बात करने पर कई बार संदेह होता कि वह उसकी बात सुन भी रही है या नहीं. हंसी की बात होने पर भी चेहरा भावहीन बना रहता. यहां तक कि पूर्वा के घर से फोन आने पर भी वह छोटे-छोटे दो-चार वाक्य बोल कर फोन रख देती. बातूनी नीलम को यह सब बहुत अजीब लगता. वह ढेर सारी बातें करना चाहती थी अपनी इस नई सखी से. जब एक ही कमरे में रहना है, तो मुंह सिल कर कैसे रह सकते हैं. पूर्वा की चुप्पी उसे खलती.
और भी कई अजीब हरकतें करती पूर्वा. नहाती तो घंटों नहाती रहती. देर तक गुमसुम बैठी रहती.
एक बार बीच रात पूर्वा ज़ोर से चीखने लगी. कुछ ऐसा भय था उस चीख में, जिससे नीलम की नींद खुली और वह भागकर पूर्वा के पास पहुंची. नीलम ने डर के मारे इधर-उधर देखा. कमरा भीतर से बंद था. खिड़की में सलाखें थीं. पूर्वा इतनी ज़ोर से डरी हुई थी कि अभी तक कांप रही थी. नीलम को लगा उसने कोई बहुत भयानक सपना देखा है, कुछ देर में ठीक हो जाएगी. वह बहुत देर तक पूर्वा को अपनी बांहों के घेरे में लिए उसके पास ही बैठी रही. चुलबुली होने के साथ ही नीलम बहुत संवेदनशील भी थी, दूसरे का दर्द समझनेवाली. वह उस वक़्त एकदम गम्भीर और ज़िम्मेदार बन गई. पूर्वा का सिर अपने कंधे पर रख उसे थपकियां देने लगी, ताकि उसे चैन मिले और नींद आ जाए.

 

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पूर्वा को झपकी लगी, तो वह नींद में बुदबुदाने लगी. फिर उसकी बुदबुदाहट थोड़ी तेज़ होने लगी. उसने चीख़ कर कहा, “मैं उसे छोडूंगी नहीं. जेल भिजवा कर ही रहूंगी.”
व्यक्ति स्थान बदल ले, माहौल बदल जाए, पर जो दुख मन के भीतर ही बैठा हो, वह कहां जाएगा? यह तो एक ऐसा ज़ख़्म था, जो और गहरा रहा था. सूख ही नहीं रहा था.

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें

Usha Wadhwa

उषा वधवा

 

 

 

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