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कहानी- एक बदलाव की उम्मीद… 2 (Story Series- Ek Badlav Ki Umeed 2)

ये छूत-अछूत, पवित्र-अपवित्र की सनक धीरे-धीरे उनके अस्तित्व और व्यक्तित्व दोनों पर हावी होने लगी. दादाजी अपने अंतिम समय तक उन्हें बहुत समझाते रहे, किंतु सब व्यर्थ. उनका व्यवहार, वाणी और वचन दूसरों को अत्यंत पीड़ा देते थे, जिसे दादी कभी समझ नहीं पाईं.

 

… विधवा स्त्री तो वैसे ही भाग्य की मारी होती थी और ऊपर से उस बेचारी पर अपशकुन, अछूत का तमग़ा समाज ने बड़े गर्व के साथ लगा दिया, ख़ासतौर पर किसी भी शुभ कार्य में उनकी उपस्थिति एक बहुत बड़ा अपशगुन होता.
वृंदावन में रहती घर से निकाली विधवा और उनकी दुर्दशा इसका साक्षात उदाहरण है. ऐसे में कोई भी ऐसी स्त्री के सम्पर्क में आ जाता, तो वे अपने हाथ ऐसे धोते मानो उनको छूने से वो भी अछूत हो गए हो. कई लोग तो अपने ऊपर गंगाजल छिड़क कर अपने को पवित्र करते थे. लोगों की मानसिकता अत्यंत संकुचित और छोटी थी. जिनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता, उसके दिल पर क्या बीतती होगी इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है. ठीक ऐसी ही स्थिति कोरोना के मरीज़ की है. भले ही कोरोना पीड़ित रोगी और एक अछूत… दोनों की व्याख्या एकदम भिन्न है, नियम भिन्न है, सब कुछ भिन्न है, किंतु उनके साथ व्यवहार और उसे महसूस करने की पीड़ा एक ही है. मुंह पर मास्क, हाथों में दस्ताने पहनने सबके लिए ज़रूरी थे, ख़ासतौर पर दादी के लिए.
अगर ग़लती से भी कभी उनके मुंह से मास्क उतर जाता या फिर हाथों में दस्ताने न होते, तो सभी उन्हें टोक देते. मंजरी… उसे भी क़ुदरत ने टोकने का हक़ दे दिया था. मैं दूर खड़ी उनके चेहरे पर विवशता और दुख के उमड़ते भावों को पढ़ रही थी. उनकी तकलीफ़ और पीड़ा देखना हम सब के लिए असहनीय था, किंतु विवशता की ज़ंजीरों ने हम सभी को जकड़ रखा था. उनकी ऐसी हालत मुझे उनके अतीत के उन लम्हों की तरफ़ धकेल रही थी, जिनमें उन्होंने अपनी इस संकुचित सोच के कारण लोगों को पीड़ा देने में शायद ही कोई कसर छोड़ी थी.
गांव में दादाजी और दादी का पूरा रुतबा था. दादाजी अपनी ज़मींदारी में व्यस्त रहते और दादी अपने पूजा-पाठ और उससे ज़्यादा पाखंडी पंडितों में व्यस्त रहती, जिनके कारण उनके हृदय और नज़रिए में छूत-अछूत, जात-पात, शगुन-अपशगुन जैसी चीज़ें पूरी गहराई के साथ बसी हुई थीं. हवेली के सभी नौकर-चाकर भी जात-पात को अच्छी तरह से देख-परख कर रखे गए थे. ये छूत-अछूत, पवित्र-अपवित्र की सनक धीरे-धीरे उनके अस्तित्व और व्यक्तित्व दोनों पर हावी होने लगी. दादाजी अपने अंतिम समय तक उन्हें बहुत समझाते रहे, किंतु सब व्यर्थ. उनका व्यवहार, वाणी और वचन दूसरों को अत्यंत पीड़ा देते थे, जिसे दादी कभी समझ नहीं पाईं. उनका गांव से शहर तक का सफ़र भी उनको बदल नहीं पाया.

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वक़्त के साथ-साथ लोगों की सोच में परिवर्तन आ गया था, किंतु अभी भी उसकी किर्चे कुछ लोगों में बाकी थीं. दादी भी उन्हीं लोगों में से एक थीं. वे मां से अक्सर मंजरी… हमारी कामवाली की जात-पात के विषय में पूछतीं, जिसे मां बड़ी होशियारी के साथ टाल देतीं.
उस दिन न जाने कैसे दादी को भनक लग गई कि मंजरी ने पीरियड्स (माहवारी) में होते हुए उनके बाहर सूख रहे कपड़ों को छू लिया. बस इस बात पर उन्होंने घर में अच्छा-ख़ासा बवाल कर दिया. उसे अछूत, अपवित्र और न जाने क्या-क्या ताने मारते हुए मन ही मन उसे कोसते हुए अपने ऊपर और अपने कपड़ों पर गंगाजल छिड़क लिया था…

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

कीर्ति जैन

कीर्ति जैन

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