कहानी- एक थी शाहिना 2 (Story Series- Ek Thi Shaheena 2)

 

अनायास ही मेरा हाथ उठा और शाहिना के ललाट पर मैंने हाथ रखते हुए पूछा, “बहुत तप रहा है? एक सौ तीन तो बहुत ज़्यादा होता है…” शाहिना ने आंखें खोलकर बंद कर ली.
यह मेरा पहला स्पर्श था. शाहिना मानो अपनी ही रजाई में घुस जाना चाहती थी. मैंने उसे घूरते हुए अंग्रेज़ी में कहा, “आप बीमार न पड़ा करें, मैं परेशान हो जाता हूं..” और सबकी नज़रें बचा कर मैंने काग़ज़ का एक मुड़ा तुड़ा-सा टुकड़ा उसे पकड़ा दिया. उसे मानो कोई ख़ज़ाना मिल गया हो. होंठों को हिलाकर उसने ‘थैंक्यू’ कहा. अम्मी आ गई, तो मैंने उठते हुए धीरे से कहा, “गेट वेल सून…”

 

एक दिन अचानक शाहिना की अम्मी का फ़ोन आया. मैं घबरा गया. अचानक शाहिना को बुखार आ जाने से अम्मी घबरा गई थीं. घर में उस व़क़्त कोई पुरुष नहीं था. मैंने फुहादीन को फ़ोन कर दिया और ख़ुद भी उनके फैमिली डॉक्टर को साथ लेकर घर पहुंच गया. घबराहट में उस दिन अम्मी शाहिना को बुरका पहनाना भी भूल गई थीं. शाहिना ने मुझे कमरे में देखा तो शर्म से तकिए में मुंह छिपाने लगी.
पहली बार मैंने उसका चेहरा देखा था. उसकी सुन्दरता देखकर मैं क्षणभर को अवाक्-सा रह गया था. गुलाब की पंखुड़ियों से गढ़ी हुई काया. पलकों की ओट से झांकती हुई उसकी मादक आंखें. डॉक्टर ने अपना बैग मुझसे मांगा, तो मेरी तन्द्रा टूटी. डॉक्टर को उनका बैग पकड़ाकर मैं शालीनता से कमरे से बाहर आ गया.
डॉक्टर ने बताया इन्जेक्शन दे दिया है, सुबह तक बुखार उतर जाएगा. अम्मी को थोड़ी तसल्ली हुई. रात के आठ बज रहे थे, इसलिए मुझे खाना खाने के लिए रोक लिया गया. फुहादिन आया, तो मैं उसके साथ ही पुन: शाहिना के कमरे में पहुंचा, शाहिना सो रही थी. फुहादीन ने उसके सिर पर हाथ रखकर पूछा, “अब कैसी हो?” शाहिना ने अचानक आंखें खोलीं. मुझे सामने देखकर उसके गाल लाल हो उठे. शर्म और लाज से उसके कान तक गुलाबी हो गए. शाहिना ने स़िर्फ सिर हिलाकर ज़ाहिर कर दिया कि ठीक हूं और अपना चेहरा पास पड़े दुपट्टे से ढंक लिया.
मैं फुहादीन के साथ वहीं बैठ गया. अम्मी कमरे में चाय पहुंचाकर चली गई. हम दोनों चाय पी ही रहे थे कि तभी फुहादीन का फ़ोन आ गया. वो फ़ोन अटैंड करने बाहर चला गया. अनायास ही मेरा हाथ उठा और शाहिना के ललाट पर मैंने हाथ रखते हुए पूछा, “बहुत तप रहा है? एक सौ तीन तो बहुत ज़्यादा होता है…” शाहिना ने आंखें खोलकर बंद कर ली.
यह मेरा पहला स्पर्श था. शाहिना मानो अपनी ही रजाई में घुस जाना चाहती थी. मैंने उसे घूरते हुए अंग्रेज़ी में कहा, “आप बीमार न पड़ा करें, मैं परेशान हो जाता हूं..” और सबकी नज़रें बचा कर मैंने काग़ज़ का एक मुड़ा तुड़ा-सा टुकड़ा उसे पकड़ा दिया. उसे मानो कोई ख़ज़ाना मिल गया हो. होंठों को हिलाकर उसने ‘थैंक्यू’ कहा. अम्मी आ गई, तो मैंने उठते हुए धीरे से कहा, “गेट वेल सून…”
उस रात मैं बेड़ पर लेटा करवटें बदलता रहा.
दिनभर भी काम में मन नहीं लगा. शाम को जब शाहिना का फ़ोन आया तो मेरे दिल को चैन आया. उसने स़िर्फ ‘शुक्रन’ कहकर फ़ोन रख दिया. उसके बाद हमारा पत्रों का सिलसिला शुरू हो गया. आठ-दस पेज की चिट्ठियां उसके लिए आम बात थी. हम दोनों एक-दूसरे के बारे में बहुत कुछ जान चुके थे, पारदर्शी हो चुके थे. मैं शाहिना से अटूट प्यार करने लगा था, पर अपने आप को संयम में रखे हुए था. मगर शाहिना का दीवानापन उसके पागलपन में बदल चुका था…
एक दिन मैं ऑफ़िस में बैठा कामकाज में व्यस्त था. अचानक फ़ोन आया, “मैं सुपर मार्केट जा रही हूं, नीलीवाली क्लासिक गाड़ी है. सुनो, अम्मी भी मेरे साथ हैं, तुम आ जाओ. तुम्हें देखना चाहती हूं.” इससे पहले कि मैं अपनी असमर्थता ज़ाहिर करता, वह बोल पड़ी, “तुम कैसे भी मैनेज करो, आई डोंट नो, बस तुम्हें आना है…” और उसने फ़ोन रख दिया.
प्रेम में कभी-कभी यह अधिकारपूर्ण व्यवहार भारी पड़ जाता है. मैंने फ़ोन रख दिया और बैठकर सोचने लगा. तीन बजे उठा, अपने सहायक को काम समझाकर, टैक्सी पकड़कर सीधे सुपर मार्केट पहुंच गया.
सुपर मार्केट के पास ही एक चौराहे पर खड़े होकर आने-जाने वाली गाड़ियों में ‘क्लासिक’ ढूंढ़ने लगा. शाहिना की नीली ‘क्लासिक’ कार दिखाई पड़ी, तो मैं रास्ता क्रॉस करने लगा. हमारी योजना सफल हुई. शाहिना के ड्राइवर ने मुझे देखा तो गाड़ी रोक दी, “अरे साहब आप… आप यहां कैसे?” अभिनय करते हुए मैंने उत्तर दिया, “मेरी गाड़ी ख़राब हो गई, तो मैंने सोचा टैक्सी से… अरे नमस्ते अम्मी… हेलो शाहिना.”
शाहिना अपने चेहरे से पर्दा हटाकर अपनी मां से नज़रें बचाते हुए मुझे जीभ निकालकर चिढ़ाने लगी. अम्मी की ज़िद पर मैं भी कार में आकर बैठ गया. उन्होंने कहा कि मार्केट के बाद वे मुझे घर तक छोड़ देंगी. यही तो हमारी योजना थी.

सुनीता सिन्हा

 

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