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कहानी- लव में थ्रिल 3 (Story Series- Love Mein Thrill 3)

“बड़ी अजीब बात है, आप उस भगवान पर विश्‍वास कर सकते हैं, जिसे आपने कभी नहीं देखा, मगर अपने पैरेंट्स पर विश्‍वास नहीं कर सकते, जिन्होंने आपको जन्म दिया, पाला-पोसा, बड़ा किया…” इस बार मेरे पास कोई तर्क, कोई पक्ष नहीं बचा था. मेरी नज़रें झुक गईं और मन में विश्‍वास जम गया कि अगर इस लड़की को जीवनसाथी बनाना है, तो चाचाजी के माध्यम से अरेंज मैरिज के रास्ते ही जाना पड़ेगा.

 

 

“आप?” आगे के शब्द मेरे हलक में ही अटके रह गए.
“मैं सौम्या, इसी बिल्डिंग में थर्ड फ्लोर पर जो कंपनी है, मैं वहां एच वआर मैनेजर हूं. पिछले महीने ही ज्वाइनिंग हुई है.”
सौम्या… मैंने भीतर ही भीतर इस नाम को मंत्र की तरह दोहराया.
“आपने एक बार फोटो देखकर पहचान लिया मुझे?”
“जी, दरअसल मैंने आपको पहले भी यहां कई बार देखा है… कभी लिफ्ट में, कभी कैंटीन में… बस, बात आज हो पाई है… वो जैसे कुछ पूछते हुए रूक गई. फिर थोड़ा संभलकर बोली, “आपने मुझे पहले कभी नहीं देखा… कभी मेरा कोई फोटो या मेरे बारे में कोई ज़िक्र हुआ हो..?”
मैं दिमाग़ पर ज़ोर डालने लगा, इसकी फोटो… भला मैं क्यों देखने लगा? चाचाजी ने भी कभी कोई ज़िक्र नहीं किया…
“चलिए छोडिए, यूं ही पूछ लिया था.” उसने कहा तो मैं अतीत को छोड़ वर्तमान में आ गया, जहां मेरे सामने एक हसीन सपना चल रहा था.
उसके बाद हमने इधर-उधर की ढेर सारी बाते की… कुछ उसके कानपुर की, कुछ मेरे कस्बे बुढ़ाना की और कुछ इस नोएडा नगरी की. पहली मुलाकात में ही हम अच्छे-ख़ासे बेतकल्लुफ़ हो चुके थे. मुझे यक़ीन हो चला था, उससे ये मेरी पहली मुलाक़ात नहीं है, कभी किसी जन्म में कुछ तो रहा होगा हमारे बीच, वरना कोई पहली मुलाक़ात में इतना ख़ास, इतना अपना कैसे लग सकता है? उसके साथ गुज़रता एक-एक लम्हा मेरे दिल पर अपनी तहे जमा रहा था.
काफ़ी देर साथ बैठ, एक-दूसरे से फोन नंबर एक्सचेंज कर और फिर मिलने का वादा कर हमने अपनी-अपनी राह ले ली. मैं रोज़ की तरह ऑफिस से घर आ गया था, मगर अकेले नहीं… वो एक मीठा ख़्वाब बन मेरे साथ चली आई थी.
अगली शाम हम दोनों एक बार फिर कैफे में एक-दूसरे के साथ बैठे थे और फिर तो ये रोज़ का सिलसिला हो गया था. ऑफिस के बाद घर की राह पकड़ने से पहले ढलती शामों के कुछ हिस्सों को साथ-साथ जीना… चाय की घूंट के संग आहिस्ता-आहिस्ता पीना.
चंद मुलाक़ातों में बहुत कुछ जान गया था मैं उसके बारे मैं… जैसे उसका मन शीशे-सा पारदर्शी है, कोई बनावट नहीं… ना बातों में, ना भावो में, ना व्यवहार में… बिल्कुल एक निर्मल नदी-सी बहती वो और उतनी ही पाक़ उसकी आंखें, जिनमें मैं डूबता जा रहा था. आज जब मैं सोच ही रहा था कि उससे अपने दिल की बात कह दूं, तभी उसके एक सवाल ने मुझे घेर लिया. “इफ यू डोंट माइंड, एक बात पूछूं?”
“कहिए.”
“आपको अरेंज मैरिज से क्या प्रॉब्लम है.” मैं चुप रहा, तो उसने आगे कहा, “दरअसल, आपके चाचाजी ने बताया था कि आपके लिए रिश्ता खोजने में आपके घरवालों ने कैसे जी जान लगा दी, मगर आप तैयार ही नहीं हुए…”
“हां वो तो है… ज़रा आप ही बताइए आजकल कौन अरेंज मैरिज करता है… अब वो ज़माना नहीं रहा कि जिसके साथ माता-पिता ने बांध दिया, बस पूरी उम्र के लिए बंध गए…” मैं उसकी आंखों में लव मैरिज का समर्थन तलाशने लगा.
“हां, मैं मानती हूं, वो ज़माना नहीं रहा, मगर आजकल पैरेंट भी ज़ोर-ज़बर्दस्ती कहां करते हैं..? उस सिस्टम में भी पहले लड़का लड़की मिलते हैं, एक-दूसरे को जानते-समझते हैं, तब ही कोई फ़ैसला लेते हैं ना… तो फिर इसमें बुरा क्या है?”
बात तो सही थी, मगर मैं अपने इतने सालों के अटल विश्वास को कैसे बिखरने देता, इसलिए अपना पक्ष रखना ज़ारी रखा.
“लव मैरिज में थ्रिल होता है, अरेंज मैरिज में नहीं… और वैसे भी कहते हैं ना, प्रेमियों के जोड़े भगवान बनाता है”, सुनकर सौम्या हंस पड़ी.
“बड़ी अजीब बात है, आप उस भगवान पर विश्‍वास कर सकते हैं, जिसे आपने कभी नहीं देखा, मगर अपने पैरेंट्स पर विश्‍वास नहीं कर सकते, जिन्होंने आपको जन्म दिया, पाला-पोसा, बड़ा किया…” इस बार मेरे पास कोई तर्क, कोई पक्ष नहीं बचा था. मेरी नज़रें झुक गईं और मन में विश्‍वास जम गया कि अगर इस लड़की को जीवनसाथी बनाना है, तो चाचाजी के माध्यम से अरेंज मैरिज के रास्ते ही जाना पड़ेगा.
“लगता है आप तो अरेंज मैरिज ही करेगी.” मैंने सवाल की दिशा मोड़ी.

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“ऐसा कुछ ठान कर नहीं रखा है, किसी से प्रेम होता, तो लव मैरिज भी कर लेती, मगर नहीं हुआ तो अरेंज मैरेज से भी परहेज नहीं है… वैसे बात चल रही है एक जगह, इसीलिए इस वीकेंड घर जा रही हूं… देखते हैं क्या होता है” उसने लजाते, मुस्कुराते जैसे ही यह सूचना दी, मेरे ऊपर कयामत टूट पड़ी. जिस लड़की का डीपी देख-देख कर आजकल रातें गुज़र रही थी, वो किसी और की हो सकती है, इस पीड़ा से मेरा कलेजा जल उठा.

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

Deepti Mittal

दीप्ति मित्तल

 

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