कहानी- नई राह नई मंज़िल 3 (Story Series- Nayi Raah Nayi Manzil 3)

“हर उम्र की अपनी एक सोच होती है. ग़लत कुछ भी नहीं है. ग़लत स़िर्फ यह है कि उम्र के उस दौर से गुज़रने के पश्‍चात् हम अपने एहसास को भूल जाते हैं. भूल जाते हैं कि कभी हमारी भी यही सोच थी, यही चाहतें थीं, यही उमंगें थीं. व़़क़्त गुज़र जाता है और हम अपने बच्चों की भावनाओं को न समझने की भूल कर बैठते हैं. विनीत और प्रिया ने तुम्हारा बहुत साथ निभाया है. अब तुम्हारी बारी है. तुम उनकी भावनाओं को समझो. इन छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठो. अपने खालीपन को भरने के लिए दूसरे की स्वतंत्रता को ख़त्म कर देना कहां की समझदारी है? हमारे प्रति अपने कर्त्तव्य को बच्चे बोझ न समझने लगें, यह बहुत कुछ हमारे व्यवहार पर भी निर्भर करता है.”

“आपने तो बिल्कुल भुला दिया. कहां खो गए थे आप इन दो वर्षों में?” अपनत्व भरा उलाहना उसने दिया.

“क्या कहूं संध्या? हालात की साज़िश का शिकार हो गया था.” बेंच पर बैठते हुए मोहनजी बोले.

“क्या मतलब?” संध्या उनकी बात का अर्थ न समझ सकी.

“सविता के स्वर्गवास के तीन माह बाद मेरा भी एक्सीडेंट हो गया, जिसमें मेरा एक पैर जाता रहा. पूरे आठ माह तक हॉस्पिटल में रहा. पैर में स्टील की रॉड डाली गई.” “इतना सब कुछ हो गया और आपने ख़बर भी नहीं की.” मोहनजी के साथ हुए हादसे को सुनकर संध्या अपना दर्द भूल गई.

“कैसे ख़बर देता, एक्सीडेंट के व़क़्त मेरा मोबाइल खो गया था. तुम लोगों का नंबर उसी में फीड था.” मोहनजी ने एक गहरी सांस ली.

“ख़ैर, छोड़ो ये सब, तुम अपनी कहो, यहां पूना में कैसे? जतिन कैसा है? अब तो रिटायर हो गया होगा.” संध्या कुछ क्षण ख़ामोश रही, फिर धीमे स्वर में बोली, “रिटायर भी हो गए और मुझे छोड़कर भी चले गए.”

“यह क्या कह रही हो तुम?” विचलित हो उठे मोहनजी. संध्या की आंखों में आंसू छलक आए. रुंधे कंठ से वो बोली, “रिटायर हुए दो माह बीते थे कि एक रात सीवियर हार्ट अटैक आया. हॉस्पिटल भी नहीं पहुंच पाए, रास्ते में ही…” कहते-कहते वो सिसक उठी.

पीड़ा का आवेग कुछ कम हुआ, तो वो बोली, “उसके बाद विनीत और उसकी पत्नी प्रिया मुझे पूना ले आए.”

मोहनजी कुछ देर ख़ामोशी से सिर झुकाए परिस्थितियों को आत्मसात करने का प्रयास करते रहे, फिर धीमे स्वर में बोले, “अपनी कहो, कुछ मन लगा पूना में? क्या दिनचर्या रहती है?” संध्या ख़ामोश रही. क्या कहती? सुबह से दिल में उमड़-घुमड़ रहे वेदना के बादल बरस पड़ने को हुए, लेकिन उसने ख़ुद को रोक लिया. इतने दिनों बाद मिले हैं, क्या वो आज ही अपना रोना लेकर बैठ जाए? नहीं, यह शोभनीय नहीं होगा.

इससे पहले कि वो कोई संतोषजनक उत्तर सोच पाती, उसके मनोभावों को भांप चुके थे मोहनजी. उन्होंने कहा, “संध्या, तुम कल भी मेरी छोटी बहन थी और आज भी छोटी बहन ही हो. व़क़्त के अंतराल के साथ रिश्तों के मायने नहीं बदल जाते हैं. रिश्ते वही रहते हैं. जिस तरह तुम खोई-खोई-सी बैठी थीं, अवश्य ही कोई परेशानी है, बताओ मुझे.”

मोहनजी का सहारा पाकर संध्या भावनाओं के आवेग में बह गई. सब कुछ शांत भाव से सुनने के उपरांत मोहनजी गंभीरतापूर्वक बोले, “सच पूछो तो यह कोई समस्या है ही नहीं. यह बात उठती भी नहीं, यदि तुम शुरू से ही बीच का रास्ता अपनाती. कभी बच्चों के साथ जाना, कभी उन्हें प्राइवेसी देना ही समझदारी है. संध्या, हर इंसान अपनी प्राइवेसी और आज़ादी चाहता है. तुम्हारे बच्चे भी ऐसा चाहने लगे तो इसमें क्या ग़लत है? याद करो वो दिन, जब तुम्हारी नई-नई शादी हुई थी. जब भी जतिन फ़िल्म देखने या कहीं घूमने का प्रोग्राम बनाता, उसकी छोटी बहन तुम लोगों के साथ हो लेती थी. कितना बुरा लगता था उस समय तुम दोनों को, याद है न…?” संध्या ने गर्दन हिलाई.

मोहनजी ने अपनी बात जारी रखी, “हर उम्र की अपनी एक सोच होती है. ग़लत कुछ भी नहीं है. ग़लत स़िर्फ यह है कि उम्र के उस दौर से गुज़रने के पश्‍चात् हम अपने एहसास को भूल जाते हैं. भूल जाते हैं कि कभी हमारी भी यही सोच थी, यही चाहतें थीं, यही उमंगें थीं. व़़क़्त गुज़र जाता है और हम अपने बच्चों की भावनाओं को न समझने की भूल कर बैठते हैं. विनीत और प्रिया ने तुम्हारा बहुत साथ निभाया है. अब तुम्हारी बारी है. तुम उनकी भावनाओं को समझो. इन छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठो. अपने खालीपन को भरने के लिए दूसरे की स्वतंत्रता को ख़त्म कर देना कहां की समझदारी है? हमारे प्रति अपने कर्त्तव्य को बच्चे बोझ न समझने लगें, यह बहुत कुछ हमारे व्यवहार पर भी निर्भर करता है.”

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मोहनजी की बातों से संध्या को मानो परिस्थितियों को समझने के लिए एक नई दृष्टि मिल गई. समस्या वो नहीं, जिसे वो मान बैठी थी. समस्या तो उसका ग़लत दृष्टिकोण था. उ़फ्, एक मां होते हुए भी वो इतनी स्वार्थी कैसे हो गई? अपनी नासमझी पर लज्जित-सी होते हुए वो बोली, “मोहनजी, नियति ने एक बार पुनः आपसे मिलवाकर मेरे घर की सुख-शांति को बिखरने से बचा लिया. अब से मैं…”

“रुको संध्या, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है.” मोहनजी ने उसकी बात बीच में ही काट दी, “संध्या, सारी ज़िंदगी हम स़िर्फ अपने लिए जीते हैं. अपनी नौकरी, अपना परिवार, अपने बच्चे. इन सबसे आगे कभी सोच ही नहीं पाते. अभी वह समय है, जब समाज के प्रति भी हम अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर सकते हैं. दूसरों के काम आ सकते हैं. दो वर्ष पूर्व मैं भी तुम्हारी जैसी स्थिति में था. उस समय अपने बेटे-बहू के सहयोग से मैंने ‘नवनिर्माण’ नामक एक संस्था बनाई. आज इस संस्था से 15-16 लोग जुड़ चुके हैं. लोगों में चेतना जागृत करना, अपने शहर  को साफ़-सुथरा रखना, पेड़-पौधे लगाना और आसपास के लोगों की समस्याओं को दूर करना इस संस्था का काम है. कुछ महिलाएं गरीब बच्चों को पढ़ाती हैं. माह में दो बार सब लोग मिलकर आसपास ही कहीं पिकनिक मनाने भी जाते हैं. संध्या, तुम इस संस्था को ज्वाइन करोगी, तो नए-नए लोगों से मिलने से तुम्हारा समय भी अच्छा कटेगा और लोगों की समस्याओं से जुड़ने से तुम्हारी सोच की दिशा भी बदलेगी. किसी के काम आने पर आत्मसंतुष्टि तो मिलती ही है, साथ ही जीने का एक मक़सद भी मिल जाता है. लीक से हटकर कुछ अच्छा करने से तुम्हारे बच्चों को भी तुम पर गर्व होगा.” मोहनजी की बातों से संध्या की आंखों में एक नई चमक पैदा हो गई. उसे जीने की एक नई राह मिल गई थी. “मोहनजी, आप घर चलिए. विनीत आपको देखकर बहुत ख़ुश होगा.”

“संध्या, मैं कल तुम्हारे घर अवश्य आऊंगा.” संध्या ने उन्हें अपने घर का पता बताया. काफ़ी देर हो चुकी थी. उसे लग रहा था, बच्चे परेशान हो रहे होंगे. मोहनजी से विदा लेकर संध्या तेज़ क़दमों से घर की ओर चल पड़ी. ये क़दम उसे घर की ओर ही नहीं, एक नए संकल्प के साथ नई मंज़िल की ओर भी ले जा रहे थे.

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         रेनू मंडल

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