कहानी- पैरों की डोर 4 (Story Ser...

कहानी- पैरों की डोर 4 (Story Series- Pairon Ki Dor 4)

बड़ी होती बेटी के साथ उसने एक आवारा कुत्ते भोटू से भी दोस्ती कर ली थी. वह उसे भी कुछ न कुछ खिला देती, ताकि रात में वह खुले आकाश के नीचे उनके बगल में बैठकर उसकी बेटी की चौकीदारी करता रहे. जरा-सा खटका होने पर वह उठकर बैठ जाती और भोटू के साथ इधर-उधर देखने लगती.

 

 

 

… दूसरे दिन सुबह उसने बेटी को स्कूल छोड़ा और उसके बाद इंटरवल में उसे देखने चली आई थी. छुट्टी के समय वह उसे अपने साथ ले गई.
अब यह उसका रोज का नियम हो गया था. स्कूल से घर लौटते समय वह बेटी को एक छोटे से ढाबे में खाना खिलाती. किसी खाली जगह पर बैठकर उसकी कॉपी-किताब पलटती. वह उसके साथ स्कूल के बारे में बातें करती. उसके बाद वह एक कोने में उसके कपड़े बदलती और उसे अपने साथ लेकर चली जाती.
समय का पहिया अपनी गति से घूम रहा था.
बेटी बड़ी हो रही थी और प्रकाशी की चिंता भी बढ़ रही थी. वह किसी पर ज्यादा भरोसा नहीं करती थी. उसके सामने रहीम भाई फलों का ठेला लगाते थे. उसे प्रकाशी से बहुत हमदर्दी थी. अक्सर वह उसे फल खाने को दे देते थे. उन दोनों की चौकसी में सोनी ठीक से पढ़ रही थी. रहीम चाचा उसका बहुत ख्याल रखते.
प्रकाशी रात में सोनी के पैर पर एक डोरी बांधकर उसे अपने हाथ से बांध देती. सोनी के करवट बदलने पर भी वह सचेत हो जाती. बेटी को लेकर वह कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती थी.
सोनी छठी क्लास में आ गई थी. अब लोगों के मुंह से अपने लिए मंगती की बेटी सुनकर उसे बुरा भी लगता था. लेकिन वह मजबूर थी. मां की हालत वह जानती थी. वह बहुत ज्यादा समझने की स्थिति में नहीं थी, लेकिन ममता को पूरी तरह पहचानती थी.
बड़ी होती बेटी के साथ उसने एक आवारा कुत्ते भोटू से भी दोस्ती कर ली थी. वह उसे भी कुछ न कुछ खिला देती, ताकि रात में वह खुले आकाश के नीचे उनके बगल में बैठकर उसकी बेटी की चौकीदारी करता रहे. जरा-सा खटका होने पर वह उठकर बैठ जाती और भोटू के साथ इधर-उधर देखने लगती. वह एक मोटा सा डंडा अपने सिरहाने पर हमेशा रखती.
जब सोनी छठी क्लास में आई, तो रेनू का वहां से तबादला हो गया. उस दिन प्रकाशी को बहुत बुरा लगा. वह बोली, “आप तो जा रही हो मैडमजी. मेरी बेटी को कौन देखेगा?”
“उसकी चिंता मत कर प्रकाशी. मैंने दीपा मैडम को सब कुछ समझा दिया है. वह मेरी तरह इसका ख्याल रखेगी.”
रेनू की बात सुनकर प्रकाशी थोड़ा आश्वस्त हो गयी. रेनू ने रहीम को भी हिदायत दी, “भैया इन मां-बेटी का ख्याल रखना. बड़ी मुश्किल से अपनी बेटी को पढ़ा रही है.”

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“आप ठीक कहती है मैडमजी. मैं भी पूरी कोशिश करता हूं. बाकी ऊपरवाले की मेहरबानी चाहिए.”
उसके बाद वह दुगड्डा से दूर यहां कराल घाटी चली आई थी.
आज फिर से रेनू के दिमाग में वही मां-बेटी घूम रही थीं. उसे तब तक चैन नहीं मिलनेवाला था, जब तक वह सोनी से मिलकर उसके बारे में सब कुछ जान न लेती.
दूसरे दिन शाम के समय वह बैंक के पास ही खड़ी हो गई. सोनी अपना काम निपटाकर बाहर आयी, तो सामने मैडम को देखकर बोली, “मैडम आप?”
“इधर से गुजर रही थी. अच्छा हुआ तुमसे मुलाकात हो गई. तुम्हारे बारे में जानने की मुझे बड़ी उत्सुकता थी. जब मैं तुम्हारी मां से पिछले साल मिली थी, उसके आंसू बहुत दिन तक मेरा पीछा करते रहे. मैंने तुम्हें ढूढ़ने की कोशिश की, लेकिन इतनी बड़ी दुनिया में तुम न जाने कहां गुम हो गई थी? तुम इतने सालों तक कहां रही सोनी?” रेनू ने पूछा.
सोनी उसे अपनी आपबीती सुनाते हुए अतीत में खो गई.
रेनू मैडम के जाने के बाद उस साल सोनी की क्लास में एक नयी लड़की आशा आई थी. उसके पिताजी जूनियर इंजीनियर थे. आशा स्वभाव से बहुत सरल थी. उसकी और सोनी की बहुत अच्छी दोस्ती हो गई थी. नौवीं तक दोनों ने साथ पढ़ाई की.
सोनी अब थोड़ा बहुत दुनियादारी समझने लगी थी. लोगों की बुरी निगाहों की भी उसे पहचान होने लगी. प्रकाशी भी यह बात समझती थी और तभी किसी को अपनी बेटी छूने तक न देती. रहीम ने उसे समझाया, “मंगती तू अब इसे लेकर मत घूमा कर.”
उसके कहने पर उसने घूर कर देखा जैसे पूछ रही हो क्यों?..

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Dr. K. Rani
डॉ. के. रानी

 

 

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