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महिलाओं के नाम संपत्ति खरीदने से क्यों बच रहे हैं पुरुष? (Why are men often reluctant to buy property in a woman’s name?)

संपत्ति के स्वामित्व में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए महिलाओं को स्टैंप ड्यूटी में छूट दी जा रही है. विभागीय आंकड़ों पर गौर करें, तो कोरोना काल से पहले जो आंकड़े बढ़ रहे थे, अब उनमें गिरावट हो रही है. पुरुष अब महिलाओं के नाम संपत्तियों की रजिस्ट्री कराने से कतरा रहे हैं. सोशल एक्सपर्ट्स इसे भरोसे के संकट से जोड़कर देख रहे हैं. उनका अनुमान है कि पुरुष उत्पीड़न की घटनाओं और विवाह जैसे पवित्र रिश्ते में भरोसे की कमी इसकी सबसे बड़ी वजह है.

ज़रा इन बातों पर गौर करें-

- महिलाओं के नाम प्रॉपर्टी खरीदने पर स्टैंप ड्यूटी में छूट मिलती है.

- महिलाओं को होम लोन की ब्याज दरों में भी राहत मिलती है. बैंक और फाइनेंस कंपनियां महिला घर खरीदारों को होम लोन में छूट देते हैं.

- महिलाओं को घर खरीदने पर इन्कम टैक्स में भी छूट मिलती है.

इसके बावजूद

- बरेली के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के नाम पर प्रॉपर्टी खरीदने के आंकड़े लगातार गिर रहे हैं.

- साल 2022 में महिलाओं के नाम 31,114 संपत्तियों रजिस्टर हुई थीं, जो 2025 में घटकर 19139 हो गईं.

- आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के नाम महंगी प्रॉपर्टी खरीदने से भी पुरुष पीछे हट रहे हैं.

- यही स्थिति कमोबेश देशभर में है. महिलाओं के नाम पुरुष प्रॉपर्टी लेने से बचने लगे हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह है रिश्तों में टूटता भरोसा.

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रिश्तों में क्या बदला?

- आज से कुछ सालों पहले तक संपत्ति के काग़ज़ों पर नाम लिखवाना सिर्फ क़ानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भरोसे का प्रतीक हुआ करती थी.

- कई बार एक से अधिक मकान या संपत्ति होने पर अधिकतर पत्नी के नाम पर प्रॉपर्टी खरीदी जाती थी.

- लेकिन आज के दौर में वो भरोसा कहीं खो गया है, जो कभी रिश्तों की नींव हुआ करता था.

- शायद यह डर सिर्फ अविश्‍वास नहीं, बल्कि समाज में देखी गई कड़वी सच्चाइयों का नतीजा है.

- जब हम अपने चारों तरफ तलाक़ और क़ानूनी लड़ाइयां होते देखते हैं, तो सतर्क होना स्वाभाविक है.

- पहले शादी भरोसे का बंधन हुआ करती थी. तेरा मेरा की कोई दीवार नहीं थी. लेकिन अब रिश्तों में काफी कुछ बदल गया है. रिश्ते भी इमोशनल कम, प्रैक्टिकल ज़्यादा हो गए हैं. हर रिश्ते में एक अनकहा डर घुस आया है कि अगर कल शादी नहीं टिकी तो.

- अमित जो दिल्ली के एक आईटी कंपनी में काम करता है, उसका कहना है, मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूं. लेकिन जब मैंने अपने दो दोस्तों को तलाक़ की लड़ाई में सारी संपत्ति गंवाते देखा, तो मन में डर आ गया.  

- ये डर अकारण नहीं है. आज के माहौल में कुछ मामलों में पुरुषों को लगता है कि क़ानून संतुलित नहीं है. ज़्यादातर क़ानून महिला स्पेशल हैं

- मीडिया में तलाक़ की लड़ाइयों की कड़वी कहानियां, भारी-भरकम एलीमनी की मांग, संपत्ति विवाद... ये सब मिलकर डर का माहौल बना देते हैं.

- भरोसे की जगह क़ानूनी सुरक्षा ले रही है.

- रिश्तों में एग्ज़िट प्लान की सोच आ रही है. अब लोग शादीशुदा जीवन में एडजस्ट नहीं करना चाहते. वो इस माइंडसेट के साथ ही शादी करते हैं कि अगर नहीं निभी, तो तलाक़ का ऑप्शन तो है ही.

- हर बात को अधिकार और कर्तव्य के तराज़ू में तौला जाने लगा है. रिश्तों से इमोशनल बॉन्डिंग गायब हो रही है.

- सोशल एक्सपर्ट्स के अनुसार बीते दो-तीन वर्षों में पति के प्रति पत्नी के हिंसक होने के मामले बढ़े हैं.

- 498 ए जैसे क़ानून का दुरुपयोग और भारी-भरकम एलिमनी की मांग भी पुरुषों को डराने लगी है.

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सोशल मीडिया भी जिम्मेदार

- सोशल मीडिया पर रोज़ ही तलाक़ की कहानियां, धोखे की घटनाएं और क़ानूनी लड़ाइयों के किस्से वायरल होते हैं.

- लगातार इस तरह की नेगेटिव ख़बरें मन में शक का बीज बो देती हैं, पॉजिटिव ख़बरों पर हमारा ध्यान जाता ही नहीं, हम भूल जाते हैं कि लाखों ख़ुशहाल शादियां भी हैं, जिन्हें सोशल मीडिया पर दिखाया नहीं जाता.

- सोशल मीडिया पर दिखने वाली परफेक्ट शादियां लोगों को अपने जीवन से असंतुष्ट बना रही हैं, जिससे वैवाहिक जीवन में समस्या हो रही है

- ज्यादातर मामलों में प्रेम-प्रसंग उजागर हो रहे हैं एक्स्ट्रा मैरिटल रिश्तों के केसेस बढ़े हैं, जिससे शादियां टूट रही हैं या रिश्तों में विवाद हो रहे हैं. इससे पत्नी पर भरोसा डगमगाया है. एक बार पत्नी के नाम से संपत्ति खरीदने पर भविष्य में खरीद-बिक्री का निर्णय पुरुष नहीं ले सकता. पुरुष छूट से ज्यादा अपनी गाढ़ी कमाई को लेकर संवेदनशील हैं.

- बैंगलुरू के संजय कहते हैं, मेरे व्हाट्सऐप ग्रुप में रोज़ कोई तलाक़ की भयानक कहानी शेयर करता है. इससे मेरे मन में भी ये डर बैठ गया है कि कहीं मेरे साथ भी ऐसा न हो और ये डर अब मेरे रिश्ते में भी आ गया है.

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क्या है सोल्यूशन?

- सवाल ये नहीं है कि संपत्ति किसके नाम होनी चाहिए. सवाल ये है कि क्या हम एक-दूसरे से खुलकर बात कर सकते हैं.

- अगर मन में डर है तो बताएं, छिपाएं नहीं. अगर असुरक्षा है तो शेयर करें.

- दोनों मिलकर बीच का रास्ता निकालें, जो दोनों के लिए सही हो. जॉइंट ओनरशिप, प्रीनुपिटल एग्रीमेंट बनाएं. ट्रस्ट या वसीयत भी बनाई जा सकती है.

- किसी अच्छे वकील या फाइनेंशिल प्लानर को कंसल्ट करें. उनसे सलाह लें.

- सोशल मीडिया पर आंख मूंदकर भरोसा न करे. हर वायरल वीडियो सच नहीं होता. हर कहानी के दो पक्ष होते हैं. इसलिए अपनी ज़िंदगी की तुलना वायरल वीडियो से न करें.

- अगर आप किसी मुद्दे पर सहमत नहीं हो पा रहे हैं, तो काउंसलर की मदद भी ली जा सकती है. यह कमज़ोरी नहीं, समझदारी है.

- ध्यान रखें, भरोसा का मतलब ये नहीं होता कि आंख बंद करके कूद जाओ. भरोसा का मतलब है, आंखें खोलकर समझदारी से एक-दूसरे का साथ देना.

- संपत्ति के काग़ज़ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है आपके रिश्ते की नींव. अगर नींव में विश्‍वास है, संवाद है, समझ है, तो काग़ज़ों का मुद्दा सुलझ जाएगा.

- सवाल ये नहीं होना चाहिए कि प्रॉपर्टी किसके नाम है, सवाल ये होना चाहिए कि क्या हम ऐसा रिश्ता बना रहे हैं, जहां ये सवाल पूछने की ज़रूरत ही न पड़े.

- भरोसा एक दिन में नहीं बनता, लेकिन बातचीत से इसकी शुरुआत हो सकती है. तो क्यों न ये शुरुआत आज ही करें.

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