बुधवार! गणेश जी की उपासना का दिन. ज्ञान में अग्रणी, प्रथम पूज्य गणेश जी, पर कितना जानते हैं आप अपने प्रिय देवता को. आइए बुधवार को उनके बारे में कुछ समझें.
क्या आप जानते हैं कि गणेश जी के साथ एक पुस्तिका, क्यों दिखाई जाती हैं? इसके साथ कथा भी जुड़ी है और प्रतीकार्थ भी.
कथा ये कहती है कि महर्षि व्यास महाभारत लिखना चाहते थे, पर जितनी तेजी से वो सोच सकते थे, उतनी तेजी से लिख नहीं पाते थे. सोचने और लिखने में संतुलन बनाने में कठिनाई हो रही थी जिसका निराकरण सोचकर वो बहुत परेशान हो गए थे.

आज की भाषा में कहें मतलब आज के समय के हिसाब से बोले तो स्पीच टु टेक्स्ट वाला ए.आई. टूल चाहिए था उन्हें. तब ए.आई.. का ज़माना होता तो बात ही कुछ और थी. तब बहुत सोचने के बाद उनके जेहन में एक व्यक्ति कौंधा. असीमित बौद्धिक क्षमता से सम्पन्न गणेश जी.
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ज्ञान, बुद्धि और विवेक में अग्रणी अपने गणेश जी की चर्चा हर तरफ़ थी तो महर्षि ने उन्हें आज़माने की बात सोची. महर्षि व्यास ने उनसे प्रार्थना की तो गणेश जी ने भी एक शर्त रख दी कि उन्हें बिना रुके लगातार बोलना होगा. यदि वे रुके तो गणेश जी लिखना बंद कर देंगे. इस आत्मविश्वास पर व्यास जी दंग. पर वो जानते थे कि गणेश जी में अभिमान रंच मात्र भी नहीं है. वे केवल अपनी सहूलियत के लिए ही निरंतरता बनाए रखने की बात कर रहे हैं.

तो व्यास जी ने सोचना शुरू किया कि क्या करें वे समझ गए कि इतनी तेजी से वो सोच नहीं पाएंगे जितनी तेजी से गणेश जी लिख लेंगे. आख़िर उन्हें एक उपाय सूझा उन्होंने भी शर्त रख दी कि वे किसी श्लोक को समझे बिना न लिखें. दोनों ही प्रतिभा के धनी दोनों समझदार और बुद्धिमान. दोनो ने शर्त पूरी की. और बना प्रतिभा का अनूठा उदाहरण.
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ये एक सीख है कि लगातार और शीघ्र पढ़ना है, लिखना है, पर समझ-समझकर. तो गणेश जी के साथ दिखाई जाने वाली लंबी सी पत्रिका प्रतीक है कि जब श्रम निरंतर भी होना चाहिए. एकाग्रता का भी अपना महत्व है, शीघ्रता का भी अपना महत्व है, पर उसके साथ बोध ग्रहण मतलब समझने की इच्छा शक्ति का सबसे ज़्यादा महत्व है. जब ये गुण साथ मिलते हैं तभी बुद्धि या किसी भी और प्रतिभा में क्षेत्र में ऐसी पहचान जन्म लेती हैं, जो रहती दुनिया तक याद रखी जा सकती हैं.
- भावना प्रकाश

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