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कविता- नि:शब्द… (Poetry- Nishabd)

हर दिन

मैं लिखता हूं कविता

शब्दों में गूंथ देता हूं

अपना सारा प्रेम

जैसे मोगरे की कलियां

गुंथी रहती हैं गजरे में

महकती हुई

प्रेम में गुंथी उन

कविताओं की महक में

मैं दिन भर सराबोर रहता हूं

और सिंदूरी शाम को

तुम्हारे जूड़े में

वेणी की तरह

सजाने लगता हूं

महकती कविताएं

और तभी तुम पलट कर

झांकती हो मेरी आंखों में

तुम्हारी आंखों में

लहराते असीम प्रेम में

डूब जाती हैं मेरी कविताएं

बह जाते हैं प्रेम के सारे

उपमा अलंकार

और निःशब्द होकर

मुग्ध सा खड़ा रह जाता हूं मैं…

– विनीता राहुरीकर

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Photo Courtesy: Freepik

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