शर्म आती है उसे अपना बेटा कहने में!”
“क्यों! क्योंकि वो तुम्हारी दुकान का सबसे क़ीमती और आकर्षक घड़ा नहीं बन पाया?”
“तुम कहना क्या चाहती हो?”
“वही जो तुम समझना नहीं चाहते! तुम शशांक की ग़लतियां निकालते रहे, उसे अपने अनुसार सांचे में ढालते रहे.
“निशा आज मैं हार गया, ख़ुद की औलाद से हार गया. शशांक ड्रग्स लेते हुए पकड़ा गया! सब कुछ ख़त्म कर दिया उसने, मेरा मान-सम्मान, मेरा स्वाभिमान! सब कुछ ख़त्म कर दिया. क्या नहीं किया मैंने उसके लिए! और उसने!”
“मयंक ऐसे मत बोलो, वो हमारा बेटा है उसे इस समय हमारी ज़रूरत है.”
“ज़रूरत! बीस साल से उसे सही ग़लत समझाता रहा, अच्छे ग़लत का फ़र्क़ सिखाता रहा. दूसरों को आदर्शों का पाठ पढ़ाने वाले प्रोफेसर मयंक का ख़ुद का बेटा आज जेल में है. शर्म आती है उसे अपना बेटा कहने में!”
“क्यों! क्योंकि वो तुम्हारी दुकान का सबसे क़ीमती और आकर्षक घड़ा नहीं बन पाया?”
“तुम कहना क्या चाहती हो?”
“वही जो तुम समझना नहीं चाहते! तुम शशांक की ग़लतियां निकालते रहे, उसे अपने अनुसार सांचे में ढालते रहे.
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तुम्हें दुनिया को दिखाना था कि ये है शशांक कुमार! आईआईटी दिल्ली के ग्रेट प्रोफेसर मयंक कुमार का बेटा, शशांक.
बचपन से तुम उसे गणित और विज्ञान के सूत्र रटाते रहे, जबकि उसको साहित्य से लगाव था. उसकी कमियां निकालते-निकालते उसके व्यक्तित्व में इतने छेद कर दिए कि उसका ख़ुद का वजूद ही उसमें से रिसने लगा.”
आज मयंक की आंखों के सामने नन्हा शशांक खड़ा था, जो हर डांट के बाद उसे इस उम्मीद से देखता था कि अब पापा प्यार से उसे गले लगा लेंगे. हर रिजल्ट के बाद कहता, “सॉरी पापा मैथ में अच्छे नम्बर नहीं आए.” शायद इस उम्मीद में कि पापा कहेंगे, “कोई बात नहीं बेटा, इंग्लिश और जीके में तो टॉप किया है तुमने!”
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आज उसे लग रहा था कि कुम्हार घड़ा बनाने के लिए अंदर से अपने हाथ का सहारा देना ही भूल गया और घड़ा आग में जाते ही चटक गया.
– पल्लवी विनोद
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