उसकी आंखें मुझे बहुत सुंदर लगती थीं. सितारों को देखने का एक अजीब सा शौक था उसे. अक्सर वह रात को छत पर चली जाती और सितारे देखा करती थी.
बादलों से आच्छादित रात में लाख कोशिशों के बावजूद मुझे कोई सितारा नज़र नहीं आ रहा था और मन एक बार फिर सालों पीछे लौट गया था.
उस सिख परिवार और हमारे परिवार के बीच दांत काटे की दोस्ती थी और उनकी लड़की तो जैसे दोनों परिवारों की जान थी. बचपन पार करके युवावस्था की दहलीज़ पर खड़ी कंचनमणि मासूम, गोरी चिट्टी व बात-बात पर हंसनेवाली लड़की थी. उसकी सीप-सी आंखों में देखकर लगता था, मानो हमेशा कोई सपना तैरता रहता था. वह दसवीं पास कर चुकी थी और मैं एम.बी.बी.एस. के प्रथम वर्ष में था.
मैं अक्सर पढ़ाई में उसकी सहायता करता था. कभी उसको अलग ढंग से देखा तो नहीं था मैंने, लेकिन जब वो हंसती तो उसके गाल पर गड्ढे पड़ जाते. हां, उसकी आंखें मुझे बहुत सुंदर लगती थीं. सितारों को देखने का एक अजीब सा शौक था उसे. अक्सर वह रात को छत पर चली जाती और सितारे देखा करती थी.
सब कुछ सामान्य गति से चल रहा था. एक दिन मैं उसे पूरी तन्मयता से पढ़ा कर जाने लगा तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली, "हृदय, तुम बहुत अच्छा पढ़ाते हो."
"अच्छा!" मैं ठहाका लगाकर हंसा.
लेकिन वह गंभीर होकर बोली, "और तुम बहुत अच्छे भी हो."
"क्या?" मैंने चौंककर उसकी ओर देखा और चुपचाप चला आया.
उस दिन सारी रात मैं सो नहीं पाया, कभी उसका चेहरा, कभी उसकी बोलती आंखें, कभी उसकी हंसी और कभी उसकी बातें याद आती रहीं.
दूसरे दिन मैं जब उसे पढ़ाने बैठा तो लगा मन अशांत है, दिल कुछ तेज़ी से धड़क रहा था. कुछ डर, कुछ झेंप और कुछ संकोच से मैं गर्दन नीची किए बैठा रहा.
"क्या हुआ?" उसने पूछा.
"कंचन..." मैंने धीरे से कहा, "तुम्हारी आंखें बहुत सुंदर हैं."
"और मैं?" वह बोली.
"तुम भी बहुत सुंदर, बहुत अच्छी हो." यह थी हमारे प्यार की शुरूआत. फिर तो धीरे-धीरे हम एक-दूसरे के बहुत क़रीब आते गए. दिन ख़ुशनुमा होने लगे थे और रातें सपनीली. मैं उसे ख़ूब मन लगाकर पढ़ने के लिए प्रेरित करता और वह मेरी सलामती के लिए गुरुद्वारों में दुआ मांगती.
वह अक्सर रात को सितारों को देखती हुई मुझसे कहती, "हृदय, हमारा प्यार तो इन सितारों से भी ऊंचा है. प्लीज़, तुम मुझसे कभी भी अलग मत होना." मैं मज़बूती से उसका हाथ थाम लेता.
लेकिन क़िस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था. अक्टूबर १९८४ में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद तो जैसे पूरे देश में एक हिंसक उन्माद छा गया. घृणा और बदले की भावना की लपटों ने सामाजिक रिश्तों, प्यार, शांति और नैतिकता को जला दिया और मेरा मासूम, निश्छल प्यार भी उसकी भेंट चढ़ गया.
वह परिवार कई दिन तक मेरे घर में छिपा रहा और एक दिन उन्हीं की ज़िद पर मौक़ा देखकर हमने उन्हें 'पंजाब मेल' से पंजाब के लिए विदा कर दिया. जाते समय कंचनमणि ने सबसे छुपकर मेरा हाथ अपने हाथों में लिया और रोते हुए बोली, "हम फिर कब मिलेंगे?"
"पता नहीं." मेरे कांपते होंठों से बस इतना ही निकल पाया.
सब कुछ शांत हो जाने के बाद हमने उनके वापस लौटने का बहुत इंतज़ार किया. मैंने उसको तलाशने की बहुत कोशिश की और आज तक वह तलाश जारी है. मुझे विश्वास है कि मेरा पहला प्यार जहां कहीं भी होगा उसे भी मेरी तलाश होगी.
कंचन को याद करके अक्सर मेरी आंखें भीग जाती हैं और अक्सर मैं रात में छत पर चला जाता हूं, सितारों को देखने के लिए.
- हृदय

Photo Courtesy: Freepik
