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कहानी- एक फ़ैसला और (Short Story- Ek Faisla Aur)

"... वृन्दा है बड़ी भावुक. उसका यह एक फ़ैसला हमें सिर-माथे चढ़ा ही लेना चाहिए. ठीक भी है क्या पता कल को हम उसे किसी के भी साथ डोली में विदा कर दें और वह स्टोव फटने से मरने की ख़बर बनकर रह जाए..."

ललाट पर हाथ थामे चित्र को निहारते हुए बाबूजी ने अपनी टूटी कमानी का चश्मा चढ़ा कर, बॉलपेन से एक अदद काग़ज़ के टुकड़े पर अपनी कथा चन्द पंक्तियों में उगली. फिर टेबल पर रखी भारी-भरकम पोथी के नीचे लपेटकर वे चुपचाप बाहर हो जाते हैं, उनका चेहरा अभी कोई गौर से देखे तो लगेगा कि शायद राख पोत रखी हो उन्होंने.

"चलो बिटिया नहीं थी. पढ़ लेगी जब आएगी..." बुदबुदाते वे परेशानी से उभरे पसीने पोंछकर चुपचाप बाहर आ गए.

वे अभी वृन्दा की मम्मी से कुछ गुफ्तगू करने की सोच ही रहे थे कि अमरबेल की तरह तेज़ी से बढ़ती वृन्दा, कमरे में आ धमकी. उसके हाथ का पर्स और किताबें अभी मेज़ पर गिरी भी नहीं थी कि उसकी निगाह उस मुड़े हुए काग़ज़ पर पड़ गई. उसने हौले से वह काग़ज़ उठाया. उसे एक बार पढ़ा, दो बार, तीन बार और पढ़ते-पढ़ते ही वह वाक्य उसने रट लिया. फिर उसने मुड़ते हुए धीरे से कहा, "क्या सोच रही हो वृन्दा, तुम्हारे मदर-फादर कल फिर तुम्हारी प्रदर्शनी लगा रहे हैं."

फिर वह हूं... ह... हूं... ह करती धम्म से पलंग पर गिर पड़ती है. अजीब सी मुख-मुद्राएं बना-बना कर वह छाती में उभरे विद्रोह को कतरा-कतरा बहा रही है. फिर ख़ुद ही बुदबुदा उठती है, "गज़ब हो रहा है वृन्दा गज़ब. अब तू मां-पिता की आंखों का नूर नहीं रही. आंख में चुभने वाली किरकिरी बन चुकी है यार. तभी तो तेरी जैसी गाय को बांधने के लिए हर दिन मज़बूत खूंटे की तलाश जारी है.और यह सब सोचते भावुक वृन्दा की आंखों में गंगा-यमुना उमड़ आती है. वह रूमाल से आंखें पोंछ कर उठती है और बाथरूम जाकर हाथ मुंह धो मम्मी से पूछती है, "मम्मी! सब्ज़ी क्या बनानी है आज? लाओ मैं तैयारी शुरू कर दूं अभी से."

"अरी बिटिया! सारी उम्र यही सब करना है री. तू थकी-हारी आई है, आराम कर ले. चाय बनाऊं क्या तेरे लिए?"

"ना मम्मी, चाय नहीं और आराम जैसा क्या करना है, आप तो बताइए सब्ज़ी क्या बनानी है."

"तू तो बेटी आराम कर. कल परेश देखने आ रहा है तुमको, ज़रा ठीक से पेश आना. ऐसे लड़के हज़ारों में नहीं करोड़ों में एक ही हाथ आते हैं." मम्मी ने तभी इधर-उधर झांक कर बिटिया को याद दिलाया आने वाले कल का, जब उसे अपने आपको एक बार फिर किसी के समक्ष नंगा करके उसकी प्रतिक्रिया जानने की वितृष्णा भोगनी है. वह बिना कुछ कहे उठ गई.

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पूरे घर में एक अज़ीब हड़बड़ी सी फैली हुई थी. भाभी और मम्मी ही नहीं, बताशो बुआ, जो कभी एक तिनका इधर से उधर रखना भी पाप मानती थीं, आज सफ़ाई में जुटी हैं. भाईसाहब पैंट-बुशर्ट में स्मार्ट नज़र आ रहे हैं तो बाबाजी की मौटी काया भी बाफते के कुर्ते, अबरगंडी की शानदार जवाहर जैकेट और मलमल की धोती में लिपट गई है. भाभी, मम्मी 'सभी ने मिल कर उसको भी सजा संवार कर शो पीस बनाने में ही अपनी सारी कलाओं की सार्थकता मान ली है.

देखते ही देखते भाई साहब‌ काली-कलूटी पर सूट में सजी एक काया के साथ कमरे में प्रविष्ट होते हैं. अम्मा, बाबूजी, मम्मी, भाभी, बुआ सभी किसी न किसी बहाने वहां से उठ कर बाहर हो जाते हैं. उसे यह पूर्व नियोजित षड़यंत्र ही लगता है सब. कमरे में अब वृन्दा और कथित युवक परेश की देह-गंध ही व्याप्त हो रही थी. कुछ देर सन्नाटा छाया रहा. वह भी कुछ नहीं कह सकी और शायद वह तो वृन्दा का व्यक्तित्व देख कर ही हारे हुए जुआरी जैसा बुझ चुका था. तभी उसने चौंक कर कान लगाए. बगल वाले कमरे के रेडियो पर गीत बज रहा था- 'मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनिया...' वह फिर व्यवस्थित होने का प्रयत्न करती सुन रही थी. भैया भी शायद इसी गीत को गुनगुना रहे थे.

तभी परेश में स्वर फूटे, "तुमने फिलॉसफी में एम.ए. किया है न वृन्दा?"

"हां, फिलॉसफी में ही किया है, यदि अंग्रेज़ी में कर लेती तो ठीक रहता. आजकल फिलॉसफी की क्या रह गई है?"

वह चुप ही रहती है. शायद मन ही मन कुछ सोच रही थी. तभी फिर सवाल-बम फूटा, "लिटरेचर में भी इन्ट्रेस्टेड हो या यही पति पैर पूजक सीता, अहिल्या, तारा की डुप्लीकेट मनोवृत्ति की हो?"

"इंच तो चर में."

"क्या पढ़ती हो गुलशन नन्दा, गोविन्दसिंह रानू!"

"आपने पढ़ा होगा, उससे तो कुछ अधिक ही पढ़ा होगा जनाब."

"गा भी लेती हो क्या?"

"लता मंगेशकर या आशा भोसले की टक्कर की चाहिए तो और किसी को देख लो. वैसे थोड़ा-बहुत गाना तो हिन्दुस्तान की हर लड़की जानती है."

"वर प्राप्ति के लिए अब तक कितनों से चोंच लड़ाई है? कोई भी उल्लू नहीं जंचा आपको?"

"उल्लू तो किसी रात की रानी पर ही रीझाते ना। वे मुझ जैसी सूर्यमुखी लड़की से क्यों..!"

"अरे वाह! जवाब नहीं वृन्दा तुम्हारा भी. मज़ा आ गया." कह कर वह चुप हो गया. फिर बोला, "हो तो तुम नूर की परी. ज़रा एक बात तो बताओ. सच-सच बताओगी ना मुझ को?"

वह जिज्ञासा से उसकी देह और रंगत की तुलना करती है. और उसका सवाल उसके सीने में शूल की तरह चुभ उठता है, "तुम्हार लव अफ़ेयर्स तो कई से चले हैं कॉलेज में?"

"आप हिसाब-किताब रखते रहे हों शायद उन सभी का."

"नहीं डार्लिंग, नहीं, नहीं, बात यह है कि कुछ तो कुंआरी हवा, कुछ उम्र का तकाज़ा और कुछ कॉलेज का एटमॉस्फियर, फिर ख़ूबसूरती. इन सबके रहते भी कोई दिलफेंक तुम्हें न फंसा पाया हो, ऐसा मैं नहीं मानता."

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वह उसे आग्नेय नेत्रों से घूरती है. तभी वह पूछता है, "अरे चुप क्यों हो? मौन स्वीकृति-लक्षण वाली हालत है न शायद."

वह उठती है और तड़ाक की तीन-चार आवाज़ें कमरे में गूंजती हैं. क्रुद्ध सर्पिणी की तरह चली जाती है बाहर.

और फिर वह अपने आपको एक अदद वर प्राप्ति अभियान का साक्षात्कार देने वाली मानती एक और छबीले के सामने है.

"ज्वाइण्ट फैमिली है, रह लोगी?"

"रहना तो पड़ेगा, यदि क़िस्मत की डोर तुम्हारे हाथ में दे ही दूंगी तो."

"पहली वाइफ के तीन बच्चे, चार लड़कियां हैं. उन्हें मदर चाहिए मदर, क्या आप उन्हें मां का प्यार देती रहेंगी?"

"तुम्हारे साथ सप्तपदी दोहराने की बेवकूफ़ी करूंगी तो यह भी करना पड़ेगा. चलो बिना डिलीवरी की पीड़ा झेले, सात बच्चों की मम्मी जो कहलाऊंगी. वो गायेंगे ठाट से मेरे इर्द-गिर्द, मम्मी ओ मम्मी..."

"आमदनी ज़रा..."

"हां, वह भी मैं करूंगी ही. आख़िर पढ़ी-लिखी... पर आप भी तो इसी वजह से डोरे डाल रहे हैं."

"तो ठीक है. मैं बाबूजी को पत्र से जवाब दे दूंगा." कह कर वे खांसते हुए बीड़ी सुलगा कर उठ खड़े हुए.

चन्द दिनों के बाद तीन पंक्तियों का पोस्टकार्ड बाबूजी पढ़ रहे थे. लिखा था 'इतनी पढ़ी-लिखी शहर की हमारे यहां खप नहीं सकेगी, नहीं तो एतराज़ नहीं था इस रिश्ते में...' और बाबूजी के चेहरे पर एक बार फिर राख पुत जाती है.

उसकी इसी तरह हर आठ-दस दिनों में प्रदर्शनी लगती. कोई ताक-झांक करता, कोई हम बिस्तर होने तक का फूहड़ प्रस्ताव कर बैठता तो कोई कितनों की बांछे खिलाई हैं, अपनी देह सौष्ठव से इसकी गिनती करने की तत्परता दिखाता, पर बाबूजी के पास जो भी ख़त आता, वह उनकी परेशानी में चार-छह इंच दुख की परतें और चढ़ा जाता.

अब लगता है कि वह महज़ इन्टरव्यू प्रूफ हो चुकी है. आज फिर उसे एक 'रोड रोमियो' को अपना भाग्य विधाता बनाने के रू-ब-रू होना था.

गले में स्कार्फ बांधे हुए वह एक ताड़वृक्ष की डुप्लीकेट काया से पूछ रही थी, "तो आप ही है, जो मुझसे मैरिज करने की तमन्ना रखते हैं."

"हां जानेमन, मैं ही हूं तुम्हारी मांग का सिंदूर."

"चुप रह इंडियट. किसी कुंआरी कन्या से बात करने की तमौज़ भी नहीं सिखायी गई क्या‌ तुम्हें?"

"अरे जानेमन. यह खटर-पटर तो अब ज़िन्दगी भर पालनी ही है. हम रोज़ एक-दूसरे के तजुर्बों का पोस्टमार्टम कर डालेंगे."

"पर यह तो तब होगा जब मुझ जैसी मृगनयनी तुम्हारे जैसे को चारा डालेगी."

"ओह! तो हम पसन्द नहीं आए या हमें पौरुषविहीन मान बैठी हो." वह आंखें अजीब अन्दाज़ में मटका कर कह उठा.

"ओह! तो आप में पौरूष भी है!"

"विश्वास नहीं हो तो..."

"शटअप. इंडियट कहीं का." कह कर आज फिर उसे अपने तमाचों का जौहर बतलाते हुए कहा, "अरे नामाकूलों की औलाद, रोज़-रोज़ लड़कियों को देखने के बहाने यौन कुण्ठाएं तृप्त करते रहना, क्या तुम्हारा अभीष्ट रह गया है? चले जाओ यहां से."

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और वह आकर अपने बूढ़े माता-पिता से कह उठी, "कल से यह मैरिज इन्टरव्यू बन्द हो जाना चाहिए बाबूजी. मैं अब बी.एड. करके कहीं टीचरशिप करना चाहूंगी. जब भी कोई सुर्खाब के पर वाला जीव मुझे नज़र आएगा, तब मैं उसे आपके सामने लाकर कह दूंगी यह है आपका भावी दामाद, पूज लीजिए पंचामृत से इसके दाहिने पैर का अंगूठा. यह है मेरा फ़ैसला."

और मां कह रही थी, "वृन्दा है बड़ी भावुक. उसका यह एक फ़ैसला हमें सिर-माथे चढ़ा ही लेना चाहिए. ठीक भी है क्या पता कल को हम उसे किसी के भी साथ डोली में विदा कर दें और वह स्टोव फटने से मरने की ख़बर बनकर रह जाए. ठीक है, उसका यह एक और फ़ैसला."

- बाल मुकुंद

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