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कहानी- तूफ़ान के बाद (Short Story- Toofan Ke Baad)

"प्रमोशन ! अभी दिन भी कितने हुए हैं तुम्हारे नौकरी करते हुए? कुल छह-सात महीने, कैसे हो गया तुम्हारा प्रमोशन?" वह गरजा. मीना सहम कर चुप हो गई. मनोज ने व्यंग्य भरे शब्दों में कहा, "जानता हूं कि क्यों इन महिलाओं को इतनी जल्दी प्रमोशन मिल जाता है और अच्छे अंक भी मिल जाते हैं... ख़ूब सज-संवर कर निकलती हैं और..." ग्लानि, अपमान और ग़ुस्से से मीना का बदन कांप उठा.

काम पर जाने के लिए तैयार का होकर मीना ज्यों ही बाहर की ओर चलने लगी, मनोज ने चारपाई पर लेटे-लेटे ही रुखाई से आदेश दिया "मुझे एक ग्लास पानी देती जाओ."

"उफ! पहले ही मुझे देर हो गई है, साढ़े नौ बजे वाली बस निकल गई तो स्कूल में गैरहाजिरी लगेगी. पानी मेज़ पर ही जग में ढका रखा है, पी लीजिए." घड़ी की ओर उतावली सी नज़र डालती मीना दरवाज़े की ओर लपक गई.

मीना ने यद्यपि अत्यन्त विनम्रता से पति को उत्तर दिया था, परन्तु इस प्रकार उसे बिना पानी दिए चले जाने से मनोज के अन्दर का सम्पूर्ण अहं व पुरुषत्व चोट खाए सांप की भांति जाग उठा, "अहं! नौकरी का इतना घमंड! पति को एक ग्लास पानी तक नहीं दे सकती!"

चारपाई से उठकर जग का पूरा पानी नाली में उलट कर नल से पानी का ग्लास ले, एक ही सांस में गले से नीचे उतार गया.

"न जाने समझती क्या है अपने आपको, मैं कोई गया गुज़रा बीमार आदमी थोड़े ही हूं. मैंने तो एक बहाना किया था कि किसी तरह उसे देर हो जाए और उसकी बस छूट जाए! स्कूल पहुंचते ही डांट खानी पड़े, तब पता चले कि नौकरी का मज़ा क्या होता है... बड़ी आई है नौकरी करनेवाली..." खीझता, झुंझलाता फिर चारपाई पर जा लेटा.

वह जानता है कि मीना की नौकरी के आधार पर ही उन दोनों की जीविका चल रही है. पिछले दो वर्षों से स्वयं बेकार पड़ा है. जानता है कि मीना अपने मन बहलाव के लिए नौकरी नहीं कर रही, अपितु गृहस्थी की गाड़ी खींचने का जुआ अपने कंधों पर डाले हुए है. बाहर काम पर भी जाती है और घर भी सम्भालती है, ऊपर से उसकी कही जली-कटी बातें भी सहन करती है. परन्तु मीना का सुबह ही अत्यन्त सुरुचिपूर्ण ढंग से तैयार होकर, नित नए परिधानों में अपने सौन्दर्य को निखार कर घर से निकल जाना उसे जरा नहीं सुहाता.

पूरा दिन घर में पड़ा सुलगता रहता है-!न जाने किसके साथ हंस-बोल रही होगी! कितनी अच्छी लगती है हंसती हुई. आज तो उस नीली साड़ी में कैसी खिल रही थी! वह चाहता है कि मीना घर में रहे, पूरा दिन उसका साथ दे, उसके साथ हंसे-बोले, खिलखिलाए, उसका एक-एक क्षण उसका अपना हो.

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कितनी विपरीत स्थिति में जीना पड़ रहा था उसे! मीना पूरा दिन घर से बाहर रहे और वह अकेला सूनी दीवारों को ताकता रहे.

मीना और उसने बी.एड. का प्रशिक्षण इकट्ठे लिया था. एक-दूसरे से अधिक अंक प्राप्त करने की दोनों की आपसी होड़ सी लगी रहती. कभी वह मीना से अधिक अंक ले जाता, कभी मीना के उससे अधिक अंक आते. मीना प्रायः उसकी सफलता पर बधाई देने पहुंच जाती, जबकि वह हमेशा मीना से मन ही मन जला करता.

वार्षिक परीक्षा परिणाम के बाद जब उसे विदित हुआ कि मीना ने पूरी श्रेणी में प्रथम स्थान ग्रहण किया है तो उसे लगा जैसे कि मीना ने एक करारा थप्पड़ उसके गाल पर जड़ दिया हो. अपने परीक्षा परिणाम को देखकर वह हीनभावना से ग्रस्त हुआ परीक्षकों को दोषी ठहराता रहा. उसका नाम पूरक परीक्षा वाले छात्रों में था.

यह भी एक संयोग ही था कि मीना के पिता उसके लिए अपनी बेटी के रिश्ते का प्रस्ताव लेकर आ पहुंचे थे. वह एक अच्छे, धनाढ्य परिवार से सम्बन्धित था. उसे मुरादाबाद के एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी भी मिल गई थी इस शर्त पर कि वह जब पूरक परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाएगा, तभी उसकी नौकरी स्थायी होगी, अन्यथा उसे स्कूल से निकाल दिया जाएगा. मीना ने अपने पिता को पूर्ण आश्वस्त किया था कि मनोज बहुत मेधावी है, पूरक परीक्षा में अवश्य पास हो जाएगा. मनोज के अहं को भारी तुष्टि मिली थी. मीना को पत्नी रूप में पाकर वह अपनी हर इच्छा पूरी कर सकता था. उसे पूर्ण रूप से अपने अधीन रख कर, अपने इशारों रख सकता था.

मीना अपने स्वभाव की मधुरता एवं अपनी सहनशीलता के कारण विवाह जैसे पवित्र बन्धन के धागे को अत्यन्त सावधानी से समेटती आ रही थी. वह पूर्ण रूप से सतर्क रहती कि उसके किसी भी कार्य से पति का दिल न दुखने पाए, अतः अपने सम्पूर्ण हृदय को उसकी राहों में बिछाए रहती. उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों में प्यार की वह झलक रहती कि मनोज को स्वयं लगता कि प्यार का एक विशाल सागर उसकी आंखों में बसा है. उस सागर की गहराइयों में एकबारगी पिछली सभी भावनाएं लुप्त होने लगी थीं.

मनोविज्ञान के एक विषय में अपने पति के अनुत्तीर्ण होने के तथ्य को यद्यपि मीना ने तनिक भी महत्व नहीं दिया था. वह जानती थी कि अपने तनिक से परिश्रम से मनोज उत्तीर्ण हो जाएगा. परन्तु मनोज का अहं फिर आड़े आ गया और वही उनके जीवन की सबसे बड़ी समस्या बन गया.

अपने मेधावीपन की धाक जमाने के लिए वह याद दिलाने पर भी मीना के सामने किताब लेकर न बैठता.

"तुम क्या सोचती हो मुझे कुछ आता नहीं था, इसलिए फेल हुआ हूं? यह तो इन साले परीक्षकों की तरफ़दारी का परिणाम है." मीना उसे प्यार से भी समझाती, परन्तु वह उसे झिड़क देता, "मुझे स्वयं पता है कि परीक्षा देनी है... बार-बार क्यों याद दिलाती हो? तुम्हारे कहने से ही पढूंगा क्या?" मीना को चुप लगानी पड़ती. परीक्षा निकट आ गई तो कभी मीना के सो जाने पर देख लेता या कभी स्कूल में फ्री पीरियड में थोड़ा-बहुत पढ़ लेता. अपने परीक्षा परिणाम से वह मीना को आश्चर्य में डाल देना चाहता था, परन्तु हुआ ठीक उसके विपरीत, जो उसने चाहा था. सफलता तो हाथ लगी नहीं, नौकरी भी छूट गई. उसकी असफलता से दुखी होकर मीना ने अत्यन्त संयत स्वर में सान्त्वना दी थी, "आप एक वर्ष पूरी तरह मन लगा कर पढ़िए, नौकरी तब तक मैं भी कर सकती हूं."

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रात-दिन एक करके मीना ने अपने लिए नौकरी ढूंढ़ ली थी. दोहरी ज़िम्मेदारी निभाने को तत्पर मीना के चेहरे पर असन्तोष, निराशा व घमंड के लेशमात्र भी चिह्न नहीं थे. तब मनोज ने भी सोचा था कि वह ख़ूब मन लगा कर पढ़ेगा, लेकिन कहां लग पाया उसका मन पढ़ाई में. मीना का नौकरी पर जाना ही उसके लिए एक ऐसी विपरीत स्थिति थी, जिससे समझौता कर पाना उसके वश की बात नहीं थी.

मीना चली जाती तो उसका अंतर्द्वन्द्व शुरू हो जाता. अकेला पड़ा खीझता रहता, अपने से ही लड़ता रहता. शाम के पांच बजे जब मीना लौटी, तो उसका चेहरा प्रसन्नता से दमक रहा था. उसने आते ही गैस पर चाय का पानी चढ़ाया, हाथ-मुंह धोकर चाय बनाई और साथ ही मिठाई की एक प्लेट पति के सामने रख दी. वह अनमने ढंग से चाय पीता रहा.

मीना ने मिठाई की प्लेट पति की ओर बढ़ाते हुए प्यार से कहा, "मिठाई तो लो ही नहीं."

"किस ख़ुशी में लाई हूं..."

"यह भी कोई बात हुई कि पत्नी का प्रमोशन हो और पति उसकी खुशी में साथ न दे..."

"प्रमोशन ! अभी दिन भी कितने हुए हैं तुम्हारे नौकरी करते हुए? कुल छह-सात महीने, कैसे हो गया तुम्हारा प्रमोशन?" वह गरजा.

मीना सहम कर चुप हो गई. मनोज ने व्यंग्य भरे शब्दों में कहा, "जानता हूं कि क्यों इन महिलाओं को इतनी जल्दी प्रमोशन मिल जाता है और अच्छे अंक भी मिल जाते हैं... ख़ूब सज-संवर कर निकलती हैं और..." ग्लानि, अपमान और ग़ुस्से से मीना का बदन कांप उठा.

हमेशा से अपने आपको संयत रखने वाली मीना चिल्लाती हुई बोली, "तुम कुछ भी सोच लो, मुझे कुछ परवाह नहीं, परन्तु कान खोलकर सुन लो मेरी पदोन्नति का कारण है मेरी कठोर मेहनत व अथक परिश्रम, यह तुम स्वयं भी जानते हो."

पहली बार वह पति के सामने बोली थी. इसका उसे तनिक भी अफ़सोस नहीं हुआ, वह चुप रह जाती तो पति के सन्देह को सहारा मिलता.

उधर मनोज को भी मीना का वह रूप पहली बार देखने को मिला था. उसके शब्दों का विरोध उसे अच्छा लगा. उसके वे शब्द मानो मीना के उज्ज्वल, दृढ़ व आदर्श चरित्र का प्रमाण थे. उसे पहली बार अपने कहे पर आत्मग्लानि हुई, परन्तु मीना के आगे कुछ भी स्वीकार करने में उसके अहं को ठेस पहुंचती थी.

मनोज का यूं नाराज़ होना मीना को बहुत अखरा. यूं तो प्रतिदिन ही वह उसे मौक़े बेमौक़े जली-कटी सुनाता रहता था, परन्तु इतने नीचे स्तर पर वह कभी नहीं उतरा था. मीना उसकी मनःस्थिति भी भलीभांति जानती है. उसका बेकार रहना ही उसकी खीझ का कारण है. किस पर उतारेगा, वह अच्छी तरह समझती है; इसीलिए अपने आपको जल्दी से सहज करने का प्रयत्न भी करती रहती है. रात के खाने पर उसकी जानी-पहचानी मुस्कान उसके चेहरे पर थी.

उधर मनोज रात को देर तक जागता रहा. अपनी असफलता को लेकर एक अंतर्द्वन्द्र से घिरा रहा. अपनी असफलता का पूर्ण दायित्व वह मीना पर ही लादता था- यदि मेरा विवाह मीना से न हुआ होता, तो मुझे यूं छुपकर परीक्षा न देनी पड़ती और न ही मैं अनुत्तीर्ण होता और न मेरी नौकरी छूटती... अब यदि इस वर्ष परीक्षा उत्तीर्ण कर भी लेता हूं तो नौकरी पाने में न जाने कितना समय लग जाए!.. मीना तो इतनी जल्दी प्रधानाध्यापिका बन गई है, मुझे नौकरी मिल भी गई तो मैं केवल एक साधारण अध्यापक ही रह जाऊंगा... क्या कहेंगे सब?.. मीना की नौकरी ही उसके मानसिक रोग का कारण बनती गई.

एक दिन स्कूल जाते समय मीना कह कर गई थी कि उसे लौटने में देर हो जाएगी, क्योंकि उसके स्कूल का वार्षिकोत्सव था, परन्तु दिनभर के एकांत से मनोज पूरी तरह ऊब चुका था और उसी ऊब व उकताहट से परेशान हो वह देर से लौटी मीना पर बुरी तरह चिल्ला उठा.

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"जान-बूझकर मेरी उपेक्षा करने लगी हो, साफ़ क्यों नहीं कह देती हो कि तुम्हें अपनी नौकरी व योग्यता पर घमण्ड है. मैं तुम्हारे अयोग्य हूं, बेरोज़गार हूं, अतः तुम्हें मुझसे अब छुटकारा चाहिए."

मीना तो पहले ही उस स्थिति के लिए तैयार होकर आई थी. जानती थी कि उसका पति दिनभर का अकेला परेशान हो गया होगा, परन्तु वह उससे छुटकारा लेने की बात तो सोच भी नहीं सकती. उधर उसका स्वयं का मन भी स्वीकरता है कि मनोज भी उसको बेहद प्यार करता है. हां, यह बात अलग है कि हर जगह उसका पुरुषत्व आड़े आ जाता है. उसका अहं उसके नारीत्व की भर्त्सना पर उतारू हो जाता है, परन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं है कि वह मुझ बिना रह भी सकता है,.

यही नहीं, उसने अपने स्थिर शांत क्षणों में अनुभव किया था कि मनोज के प्रति उसके अन्दर एक रागात्मक सम्बन्ध है, जो मनोज के मानसिक रोगी हो जाने पर भी ज्यों का त्यों बना हुआ है. इस रोग का इलाज वह अवश्य ही ढूंढ़ेगी, उसने निश्चय किया.

एक रात मनोज अपने बिस्तर पर नहीं था. बाहर कड़ी ठंड पड़ रही थी. कोहरे के कारण पेड़ों के पत्तों से पानी टपक रहा था. बरामदे से बाहर लॉन में लगे बिजली के खम्भे से सटा उसका पति सिगरेट पी रहा था. धुएं के गोले बनते और कोहरे में विलीन हो जाते. खिड़की से सटी मीना पति के चेहरे के एक एक भाव को बड़ी सरलता से पढ़ने में समर्थ थी. पति को लड़ते-झगड़ते, डांटते-डपटते उसने बहुत बार देखा था, परन्तु अपने हृदय से वह इतना दुखी भी है, वह पहली बार देख पाई थी. वह एकदम सहम गई. उन्हें कुछ हो गया तो!'

अपनी शॉल को कंधों पर लपेटती हुई धीरे से पति के पास खड़ी हो मीना बोली, "यहां इतनी रात में, इस ठण्ड में क्या कर रहे हो? अन्दर चलो न!"

वह बिना कुछ कहे उसके पीछे हो लिया. थोड़ी देर दोनों चुप रहे, फिर मीना ने ही आरंभ किया, "तुम चाहो तो मैं अपनी नौकरी छोड़ दूं?" मनोज की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, जैसे कि कुछ सुना ही न हो. थोड़ी देर फिर ख़ामोशी छाई रही. मीना ही बोली, "तुमसे कुछ पूछ रही हूं, बोलोगे नहीं क्या?"

मनोज कुछ झुंझला कर बोला, "मुझे चिढ़ा रही हो क्या इतनी रात में? जानती हो न कि तुमसे नौकरी करवाना मेरी विवशता है, तुमसे यदि कहूंगा हां, छोड़ दो नौकरी तो दोनों भूखों मर जाएंगे. कहां से आएगा यह सब कुछ!"

वह रोती हुई सी आवाज़ में बोली, "नहीं मनोज, हम भूखों नहीं मरेंगे, मैं नौकरी छोड़ दूंगी, तो तुम कमाओगे, ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है! मैंने अपने कुछ छात्र-छात्राओं को घर पर ही पढ़ने को तैयार कर लिया है. शाम के समय हम दोनों उनमें व्यस्त रहेंगे. दिन में तुम अपनी पढ़ाई करना, मेरे साथ बैठकर, मेरे सामने, है न ठीक?"

मनोज ने भाव-विह्वल होकर मीना को अपने बाहुपाश में बांध लिया, "तुम कितनी समझदर हो. यह मैं आज ही समझ पाया हूं, मुझे क्षमा कर दो..."

मीना ने अपने ख़ुशी के आंसू अपने आंचल से पोंछ दिए, उसे लगा एक भारी तूफ़ान उसके सिर से गुज़र गया था...

- कान्ता 'निशा'

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