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कहानी- लौटी हुई ख़ुशी (Short Story- Lauti Huyi Khushi)

यह याद आते ही पुनः हृदय ज़ोरों से धड़कने लगा. कहीं मुझसे अपमानित परम भी पीना शुरू न कर दें. इस ख़्याल से ही मेरी आंखें छलक आई. जी चाह रहा था कि इतनी ज़ोर से परम को आवाज़ दूं कि वो जहां कहीं भी हो, मेरी आवाज़ सुन ले और तुरंत घर लौट आए. डर और भावुकता से भरे हृदय के भावों ने मानो मुझे बेहद असहज बना दिया था. सोचने-समझने की शक्ति भी जैसे ख़त्म होती जा रही थी.

लाल, पीले, नीले रंग की दर्जन भर कांच की चूड़ियों से ला मेरे आंचल को भरता हुआ परम ख़ुशी से इतना अधिक उत्तेजित नज़र आ रहा था, मानो मेरे लिए कांच की जगह हीरों का जड़ाऊ कंगन ख़रीद लाया हो.

मैंने बड़ी आशा से परम के खुले बैग में झांककर देख लिया, शायद आज वादे के मुताबिक़ वो किसी पेपर में लपेटकर मेरे लिए साड़ी लाया हो.

"पसंद आया..." बैग की ओर मुड़े मेरे चेहरे को अपनी हथेली में लेकर अपनी तरफ़ करते हुए स्नेहलिप्त होकर परम ने पूछा तो चोर दृष्टि से बैग में झांकने के अपराधबोध से भरकर मैंने नज़रें झुका ली और सिर हिलाकर परम के प्रश्न का 'हां' में उत्तर दिया.

अपनी मनःस्थिति से मैं स्वयं परेशान थी. थके-हारे परम का स्वागत बनावटी मुस्कुराहट से करते समय अंदर तक एक तड़प भी होती है. पर इस पीड़ा से कहीं ज़्यादा गहरी पीड़ा मुझे एक नई साड़ी के अभाव से हो रही थी. इसलिए मैं चाहकर भी परम से हो रही खीज कम नहीं कर पा रही थी.

परम की बांहों का बंधन ज़रा सा ढीला होते ही मैं चाय बनाने के बहाने तेजी से रसोई में चली जाती हूं.

परसों फिर से कॉलोनी की महिलाओं की किट्टी पार्टी है. जाना तो पड़ेगा ही, साथ ही वही पुरानी साड़ी पहनकर जाने की पीड़ा को भी भोगना पड़ेगा.

सभी कितनी सज-धजकर आती हैं. हर किसी का यही प्रयास रहता है कि स्वयं को सबसे अधिक उत्कृष्ट सिद्ध कर दें, पर मैं ऐसा कभी नहीं कर पाती हूं. परम को मेकअप से सख्त नफ़रत है, इसीलिए श्रृंगार के नाम पर मैं सिर्फ़ पाउडर और बिंदी ही लगाती हूं. वैसे मेकअप का मुझे भी कोई शौक नहीं, बस पिछले कई महीनों से एक नई साड़ी के लिए मन ललक रहा था.

जब से इस कॉलोनी में आई हूं, जैसे अच्छे कपड़े पहनने की प्रतियोगिता में शामिल हो गई हूं. पर पहले वसई में जहां रहते थे, वहां न तो कॉलोनी थी, न ही पास-पड़ोस की महिलाएं ऐसे किसी कि‌टी पार्टी का आयोजन करती थीं. अच्छी-ख़ासी शांत ज़िंदगी थी और फिर उस मकान का किराया भी यहां से कम था.

बुराई बस एक ही थी. जिस जगह वो मकान था, वहां आसपास फैली झोपडप‌ट्टी और दारू की दुकानों ने वातावरण को दूषित कर रखा था.

अंधेरा घिरते ही सड़कों पर चहल-पहल तेज हो जाती. पियक्कड़ों की बकवास कानों को शर्मिन्दा कर जाती. गंदी गालियों और मारपीट की आवाज़ों से घबराकर मैं घर के खिड़की-दरवाज़े चौबीसों घंटे बंद रखती थी. सुबह के समय तो वैसे डर वाली कोई बात नहीं होती थी पर, मुझे भय होता था कि कहीं किसी शराबी में रात की शराब का असर बाकी न रह गया हो और उसकी नज़र मुझ पर या मेरी नन्ही सी बिटिया पर न पड़ जाए.

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परम की जब सुपरवाइजर के पद पर पदोन्नति हुई तो फैक्ट्री के ६-७ सुपरवाइजरों के साथ परम की भी सप्हता में एक बार ड्यूटी की शिफ्ट बदलती. जिस सप्ताह परम की नाइट ड्यूटी होती, मैं परेशान हो जाया करती और मेरा सहमा हुआ चेहरा पूरे एक सप्ताह तक परम को भी निश्चितता से काम नहीं करने देता. अपने काम के प्रति निष्ठावान रहने वाले परम को इस तनाव से मुक्त रहने के लिए यही उचित लगा कि हम घर बदल लें और तब वसई के उस इलाके से निकलकर हम मालाड के इस फ्लैट में आ गए. बीस हज़ार रुपए पगड़ी की मांग पर परम ने अपनी पूरी पूंजी को एक निश्चिंत ज़िंदगी की चाह के आगे बिना किसी मोह के बैंक से निकालकर मकान मालिक को दे दिया और हम पुराने मकान से अधिक किराए वाले इस फ्लैट में आ गए.

मालाड का यह फ्लैट तो ठीक था, पर फ्लैट के निवासियों के रहन सहन की तुलना में मैं और परम अपने को व्यवस्थित नहीं कर पा रहे थे.

एक दिन इस कॉलोनी की एक महिला मेरे पास आई और बोली, "आप इस कॉलोनी में नई आई हैं, सोचा आपसे दोस्ती कर लूं."

"जी आइए." मैने प्रफुल्लित होते हुए उनका स्वागत किया और कहा, "मेरा नाम आभा है, आप?"

"मैं सुषमा भादुड़ी हूं. आभा जी, इस कॉलोनी की सभी महिलाएं महीने में दो बार कि‌टी पार्टी का आयोजन करती हैं. कभी कभार हम लोग कुछ प्रतियोगिताएं भी रखते हैं कभी सिलाई, कभी कढ़ाई तो कभी रंगोली की. हम लोग ऐसी प्रतियोगिताओं' के आयोजन और ईनाम के लिए कुछ हर महीने जमा करते हैं. सभी अपने घर बारी-बारी से कि‌टी पार्टी का आयोजन करती हैं. एक बार यदि तुम्हारे घर पाटी हुई तो दोबारा सवा साल बाद ही तुम्हारी बारी आएगी."

"अच्छा, तो क्या कॉलोनी की सभी महिलाएं इसमें शामिल होतीं हैं."

"सभी तो नहीं पर ज़्यादातर."

"मुझे मना करना उचित नहीं लगा और बिना परम की इजाज़त लिए मैंने हामी भर दी.

जैसे ही में इस महिला मंडल की सदस्य बनी, पहली पार्टी का आयोजन मेरे ही घर होना तय हुआ और तब मुझे परम को इस पार्टी के बारे में बताना पड़ा. परम के हाथ तब बहुत तंग थे, लेकिन अपने किसी मित्र से कर्ज़ लेकर उसने मेरे लिए कि‌टी पार्टी का आयोजन कर दिया, पर रात को मुझे समझाते हुए उसने कहा था, "आभा, ख़र्च करने के पहले अच्छी तरह सोच लिया करो. यहां आने के बाद किराए के अलावा भी कितने ही ख़र्च और बढ़ गए हैं, जितनी चादर है, पैर भी उतना ही फैलाना चाहिए न."

इतना ही कहा था परम ने, पर उसके अंतर की अकुलाहट को मैं बड़ी आसानी से समझ गई थी. वसई का घर छोड़कर मालाड में रहने आने का उसका निर्णय सिर्फ़ मेरे ही हित के लिए था, एवज में वह मुझसे यह उम्मीद करता था कि मैं गृहस्थी की गाड़ी खींचने में उसकी समान रूप से सहभागी बनूं. चाहती तो मैं भी यही थी, पर अब तो पूरे सवा साल बाद ही मुझे अपने घर पार्टी रखनी थी, इसीलिए परम की बात से प्रभावित होने के बाद भी अधिक गंभीरता से नहीं लिया.

कि‌टी पार्टियों में जाते ही महिलाओं की फैशनपरस्ती ने मुझमें हीनभावना भरनी शुरू कर दी. मेरा अस्तित्व उनकी बनावटी, दिखावटी जीवनशैली के आगे बौना दिखने लगा था. मैं अपने आपको उनके योग्य बनाने के प्रयास में कब जुट गई, इसका पता मुझे स्वयं भी नहीं चला. धीरे-धीरे मैं परम की कम तनख्वाह के कारण अपमानित होने लगी थी.

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कई बार मैने यह प्रयास किया कि साड़ी को बहुत ज़्यादा अहमियत न दूं, पर कि‌टी पार्टी के आयोजन की सूचना मिलते ही मेरी चाहत पुनः ज़ोर पकड़ने लगती.

पिछले हफ़्ते मैंने मचलकर परम से ज़िद की थी कि मुझे एक साड़ी ले दें और परम ने कहा था कि वेतन मिलते ही वो साड़ी ला देगा. पर आज साड़ी के स्थान पर दर्जन भर कांच की चूड़ियां देकर वह मेरा मुंह बंद कर देना चाहता था.

एक छोटे से अभाव ने मुझे विद्रोही बना दिया. क्यों मेरे ही साथ हो रहा था यह सब? या तो अच्छी सूरत मिल जाती या फिर इतना धन कि मन भर कपड़े-गहने ख़रीद पाती.

मेरी तिलमिलाहट बढ़ती जा रही थी और परम को चाय का प्याला थमाते-थमाते मैंने क्रोध से पूछ ही लिया, "तुमने तो कहा था वेतन मिलने पर साड़ी ले दोगे."

"हां, कहा तो था आभा." मेरी तरफ़ देखे बगैर शर्ट को निकालकर हैंगर में लटकाते हुए परम बोला, "पर कैसे ख़रीदता. कल ही तो बिजली का बिल आ गया. बचाए हुए रुपए इसी में चले जाएंगे, वरना किसी तरह तुम्हारे लिए साड़ी ले ही लेता."

"हमेशा तो यही सब होता है. जब भी तुम साड़ी ख़रीद देने की बात करते हो तो कोई न कोई ख़र्च सामने आ जाता है. तो क्या मुझे साड़ी कभी नहीं मिलेगी?"

परम ने एक बार मायूस नज़रों से मुझे देखा और बाथरूम में प्रवेश कर गया, पर मैं ख़ामोश नहीं हो पाई. आवाज़ थोड़ी तेज करते हुए मैं लगातार बोलती ही जा रही थी.

"लेकर देना नहीं चाहते हो न इसीलिए पैसे की भी कमी रहती है. कहते हैं न, जहां चाह वहां राह. तुम्हें तो यह चाह है ही नहीं कि मैं अच्छा पहनूं-ओढूं. तुमसे भी कम तनख्वाह वाले करोड़ों लोग हैं इस दुनिया में, क्या वे अपनी पत्नी को साड़ी नहीं लेकर देते हैं? पर मेरे तो करम ही फूटे हैं. सालों बाद तो एक साड़ी की मांग की है, वो भी मिल नहीं रही है."

परम हाथ-पैर धोकर आ गया था. कुर्ता-पायजामा पहनकर चाय का प्याला हाथ में लिए वो बालकनी में जा बैठा. उसके चेहरे पर कहीं कोई मलाल नहीं था और उसकी यही निश्चितता मुझे और अधिक आहत कर गई.

"कैसे हो जी तुम? ज़रा भी नहीं पसीजता है तुम्हारा मन श. चेहरे के भाव से तो ऐसा लग रहा है जैसे पत्थर के बने हो. मैं सचमुच तंग आ गई हूं. कब तक भोगती रहूंगी इस अभाव भरी ज़िंदगी को. यदि एक बेटी की ज़िम्मेदारी न होती तो चौथी मंज़िल से छलांग लगा देती."

"छी आभा, कितनी स्वार्थी हो तुम. तुम्हें तो सिर्फ़ अपनी साड़ी की चिंता है और एक साड़ी के लिए तुम आत्महत्या जैसा पाप भी कर सकती हो, है ना..." परम के चेहरे पर मेरे लिए घृणा के भाव थे.

"तुम्हारा ध्यान कभी मेरे जूतों की तरफ़ गया है जो घिस गए. उन्हें पहनकर चलने से पैरों में दर्द होता है और आजकल मैं चप्पल पहनकर दफ़्तर जाता हूं." मैं चकित होकर सच्चाई उगलते परम को देखे जा रही थी.

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"इस बार जब पिंकी का स्कूल खुला तो उसके लिए स्कूल बैग नहीं ख़रीद पाया था. पुराने बैग का रंग निकल गया है. पैसों का अभाव नहीं होता तो उस नन्ही सी बच्ची को बदरंग बस्ते में किताबें न ढोनी पड़ती. कौन पति नहीं चाहेगा कि पत्नी को अच्छा पहनाए-ओढ़ाए, पर परिस्थिति भी तो अच्छी होनी चाहिए."

मेरी आंखों से आंसू बह चले, परम ने जिस सच्चाई को अभिव्यक्त किया था, उसकी शर्म थी या परम को दुख पहुंचाने का पछतावा, मैं जान नहीं पाई और चुपचाप सिर झुकाए खड़ी रही.

"विभा, इन ऊंची सोसायटी वाली महिलाओं से अपनी तुलना मत करो. तुम किसी बड़े अधिकारी की पत्नी नहीं, बल्कि एक सुपरवाइजर की पत्नी हो. मैंने तुमसे पहले भी कहा था और फिर कहता हूं- चादर देखकर पैर फैलाना चाहिए, अन्यथा दिखावे के चक्कर में पड़कर या तो हम ग़लत काम करने लगेंगे या फैशनपरस्ती के लिए लोगों से उधार मांगकर उनके कर्ज़दार हो जाएंगे."

मेरी बहती आंखों को देखने के बाद भी उसने मेरे आंसुओं को पोंछने का कोई प्रयास नहीं किया और तेजी से बाहर निकल गया. परम ने जिस सच्चाई का बयान किया था उसने मेरी मन की आंखों को खोल दी. अब परम के टूटे जूते ही नहीं, उसके पुराने शर्ट-पैंट्स भी जांखों के आगे नाचने लगे.

परम गया तो मैं वहीं बालकनी में बैठकर देर तक सुबकती रही. लगा था मुझसे नाराज़ होकर परम टहलते हुए कहीं चला गया होगा और जल्दी लौट आएगा. अस्त-व्यस्त मन से रसोई के पूरे काम निबटाकर जब मैंने घड़ी की ओर देखा तो चकित रह गई. रात के नौ बज गए थे.

मन किसी तनाव में उलझा हुआ हो, तो समय कटने का पता भी नहीं चलता. पर परम आख़िर गया कहां होगा, मैं सोच में पड़ गई.

परम की दुखी कर देने के तनाव से मैं इतनी अधिक ग्रस्त थी कि पल भर के लिए पिंकी की तरफ़ भी ध्यान नहीं गया था. बस इतना भर याद है कि कई बार वो मेरे पास आकर कुछ पूछती रही थी और हर बार मैंने उसे झिड़ककर अपने से दूर कर दिया था.

पिंकी का ख़्याल आते ही तुरंत में उसके स्टडी टेबल की तरफ़ दौड़ गई. देखा वो पढ़ते-पढ़ते किताब पर सिर रखकर सो गई थी. कुछ खाया भी नहीं था पिंकी ने. पिंकी बिना खाए ही सो गई है, यह जानते ही परम की नाराज़गी दुगुनी हो जाएगी, इस बात से भली-भांति परिचित होने के बाद भी मुझे पिंकी को पुनः जगाने की इच्छा नहीं हुई और मैंने उसे उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया.

किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था. बार-बार बालकनी में जाकर में सड़क पर देखती रहती कि शायद परम आता हुआ दिख जाए, पर परम दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहा था.

बार-बार यह सोच मुझे तहस-नहस किए जा रही थी कि कहीं मुझसे मायूस होकर परम कोई ग़लत कदम न उठा ले.

अपने द्वारा कहे गए हर शब्द के लिए अब मेरे मन में शर्मिन्दगी थी. मैंने मन ही मन निर्णय ले लिया था कि परम के आते ही उसके कदमों पर अपना सिर रखकर उससे हर ग़लती के लिए माफ़ी मांग लूंगी. बस, एक बार परम सही सलामत घर लौट आए.

मैं पुनः बालकनी में जा खड़ी हुई. देखा एक स्कूटर चला आ रहा है. हो न हो यह परम ही है. मैं धड़कते हृदय से देखती रही और स्कूटर आगे निकल गया, मेरा ध्यान स्कूटर सवार पर गया तो देखा कि वे पुरोहित जी थे. लोग कहते हैं, अपनी पत्नी के कड़वे ज़ुबान और दुर्व्यवहार के कारण ही वे रोज़ नशे में धुत्त रात में देर से घर लौटते

हैं.

यह याद आते ही पुनः हृदय ज़ोरों से धड़कने लगा. कहीं मुझसे अपमानित परम भी पीना शुरू न कर दें. इस ख़्याल से ही मेरी आंखें छलक आई. जी चाह रहा था कि इतनी ज़ोर से परम को आवाज़ दूं कि वो जहां कहीं भी हो, मेरी आवाज़ सुन ले और तुरंत घर लौट आए. डर और भावुकता से भरे हृदय के भावों ने मानो मुझे बेहद असहज बना दिया था. सोचने-समझने की शक्ति भी जैसे ख़त्म होती जा रही थी.

लड़खड़ाते कदमों से ड्रॉइंगरूम में प्रवेश करते ही ज़ोरों से बजे कॉलबेल की आवाज़ सुनते ही मानो जान में जान आ गई. भागते हुए मैंने दरवाज़ा खोला तो माथे पर पसीने की बूंदों को सजाए परम खड़ा था. मुझे देखते ही उसने मुझे खींचकर अपने सीने से लगा लिया,

"आभा, मुझे माफ़ कर दो, आज पहली बार तुम्हें बिना बताए कहीं चला गया था."

"माफ़ी तो मैं मांगना चाहती हूं. तुम्हें कितना जलील कर दिया था, पर तुम गए कहां थे?"

"आभा, आज नवीन की शादी की २५वीं सालगिरह थी, हम दोनों को पार्टी में बुलाया था. पर तुम्हारी बातों से नाराज़ होकर मैं तुम्हें साथ नहीं ले गया. वहां सभी पूछ रहे थे तुम्हें. मेरे लिए तो पल-पल भारी हो रहा था यह सोचकर कि तुम कितनी परेशान हो रही होगी. तुम्हें बिना बताए जो चला गया था. उफ़्फ़... जैसे-तैसे उनसे जान छुड़ाकर जल्दी ही वहां से निकल भागा." परम की बांहों का बंधन थोड़ा सा और कस गया था.

मुझे लग रहा था कि ख़ुशी से झूमकर नाच उठूं. परम के प्यार की गहराई के आगे साड़ी की इच्छा कितनी तुच्छ थी. मैने निर्णय लिया कि जो ख़ुशी इस समय मुझे मिल रही है, उससे भी दुगुनी ख़ुशी मैं हमेशा परम को देती रहूंगी.

- निर्मला सुरेंद्रन

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