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कहानी- खोया हुआ भाई (Short Story- Khoya Hua Bhai)

मारे शर्म के मैं ज़मीन में गड़ा जा रहा था. मेरी नज़रें नलिनी के सामने उठ नहीं पा रही थीं. मरे हुए लहज़े में बस मैं इतना ही कह पाया, "मुझे क्षमा कर दो नलिनी, मुझसे भूल हो गई. वासना ने मेरी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया था."

मैं जन्म से ही आलसी प्रवृत्ति का रहा हूं. ख़ासकर सुबह जागने के मामले में. मम्मी मुझे छह‌ बजे से जगाने लगती और मैं नौ बजे बिस्तर छोड़ता. वैसे भी इन दिनों में बिल्कुल फ्री था, क्योंकि बी.ए. फाइनल की परीक्षा हो चुकी थी और मैं परिणाम निकलने के इंतज़ार में था. हां, पढ़ाई के मामले में मैं बिल्कुल आलसी नहीं था.

उस दिन सुबह के छह बजे होंगे, मम्मी ने आवाज़ दी, "सुरेश उठ जाओ, देखो सूरज सिर पर चढ़ आया है." लेकिन मैं इतनी जल्दी उठने वाला थोड़े ही था. मगर अगले ही पल मुझे उठना पड़ा, क्योकि हमारे पड़ोस के खाली पड़े मकान से आती खट-खट की आवाज़ ने मेरी उत्सुकता जो बढ़ा दी थी.

मैंने ऊपर छत पर खड़े-खड़े नीचे पड़ोस के घर में झांककर देखा, जहां ट्रक में से सामान उतारा जा रहा था. शायद कोई किराएदार रहने को आया होगा, "ऐसे ही नींद की ऐसी-तैसी करके रख दी," बड़बड़ाते हुए मैं पलटने ही लगा था कि अचानक मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी, जो ट्रक में से सूटकेस निकालकर अंदर ले जा रही थी. उस लड़की को देखते ही मेरा दिल चूहे की तरह उछलने लगा. गोरा-चि‌ट्ठा रंग, नीले रंग का सलवार-कुर्ता, लंबे-लंबे कमर तक झूलते रेशमी बाल, मस्त चाल, उम्र यही कोई १६-१७ के आस-पास होगी. मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से फुदकने लगा.

लड़की हमेशा से ही मेरी कमज़ोरी रही है. जहां लड़की देखता, मेरी सि‌ट्टी-पि‌ट्टी गुम हो जाती,

मैने जल्दी-जल्दी कमीज़ पहनी और छत से उतर कर नीचे आया तो मम्मी-पापा को ये देख हैरानी हुई.

"क्या बात है? आज तो एक ही आवाज़ के साथ उठकर आ गया." मैंने उनकी बात पर ध्यान दिए बिना फटाफट चाय पीया और घर से बाहर निकल गया. घूमकर उनके दरवाज़े के सामने पहुंचा तो ट्रक से अभी सामान उतारा जा रहा था. लाख कोशिश के बावजूद वो लड़की मुझे दिखाई न दी. मैं कुछ देर तक वहां यूं ही खड़ा रहा. फिर कुछ सोचकर सीधा विजय के घर जा पहुंचा, जो मेरा सबसे अच्छा दोस्त था. हम दोनों जब भी मिलते, तो लड़कियों पर ख़ूब खुलकर चर्चा करते.

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मैं विजय के घर पहुंचा तो विजय कमरे में बैठा अख़बार पढ़ रहा था. मुझे देखते ही वह चिल्लाया. "अरे सुरेश, आज सवेरे सवेरे! क्या कोई ताज़ा ख़बर है भई?"

"आपके अख़बार में छपी ख़बरों से ज़्यादा ताज़ा ख़बर लेकर आयाक्षहूं. सुनोगे तो उछल पड़ोगे." मैंने उससे हाथ मिलाते हुए कहा.

"बताओ न यार. क्या पहेलियां बुझा रहे हो?" पूरी उत्सुकता से विजय ने पूछा.

मैंने चोर की तरह चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई और सटकर उसके पास बैठते हुए कहा, "हमारे पड़ोस वाले घर में एक बड़ा ज़बरदस्त पटाखा आया है, देखोगे तो होश खो बैठोगे."

"अच्छा! देखने में कैसी है?" विजय ने बेड पर उछलते हुए कहा.

मैंने उसके रंग-रूप, चाल-ढाल, कद-काठी की पता नहीं कितनी ही देर प्रशंसा की. ये बात और थी कि मैं तब तक उस लड़की की हल्की सी झलक ही देखी थी.

वो मेरे सपनों के शीशमहल में पूरी तरह फिट थी, जी चाह रहा था कि एकान्त में ले जाकर उसके होंठ चूम लूं...

विजय ने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर धीरज खोते हुए कहा, "यार जल्दी पटाओ. कहीं हम से पहले कोई और न हाथ मार जाए."

"अरे ऐसा कैसे हो सकता है, मेरे होते, मैं आज ही उस पर अपना जादू चला देता हूं." कहते हुए मैं उठ खड़ा हुआ.

"अरे सुरेश बैठो, घर आए हो चाय-पानी तो पीकर जाना." विजय ने टोकते हुए कहा.

मैंने चुटकी लेते हुए कहा, "अब कभी इकट्ठे बैठकर पार्टी का मज़ा लेंगे."

"अच्छा विजय, बाय... शाम को मिलूंगा."

"अच्छा भाई, बाय... बाय..."

विजय के घर से चलने के बाद बाज़ार के बीचों-बीच से होता हुआ मैं सीधे अपने घर के पास ही आकर रुका. लेकिन अपने घर में घुसने से पहले उसके घर में झांकना नहीं भूला, तब तक ट्रक सामान उतार कर जा चुका था. मुझे सामने कोई भी नज़र न आया. शायद वो सामान ठीक-ठाक करने में लगे होंगे. सोचकर जैसे ही मैं अपने घर में घुसा तो देखा एक बूढ़ी सी औरत मां के पास बैठी बातें कर रही थी.

मुझे देखते ही मां बोल पड़ी, "यही है मेरा बेटा सुरेश. आओ सुरेश, ये हमारे नए पड़ोसी हैं." मां ने उस बूढ़ी औरत की तरफ़ इशारा करते हुए मुझे बताया. मैं चलकर पास गया और सभ्यता दर्शाते हुए उस औरत के पांव छुए, तो उसने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "जीते रहो बेटा!"

मैं अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गया तो वे फिर एक-दूसरे से अपना-अपना पारिवारिक परिचय देने में लग गईं. मेरे कान बराबर उनकी बातों में दिलचस्पी ले रहे थे.

वो बूढ़ी औरत मम्मी से कह रही थी कि मेरा पोता भी आपके बेटे की ही उम्र का था. लेकिन होनी को कौन टाल सकता है, एक दिन मोटरसाइकिल से बाज़ार जा रहा था कि रास्ते में एक जीप से एक्सीडेंट हो गया और वहीं दम तोड़ दिया. बेटे की मौत के बाद उसकी मां के दिमाग़ में ऐसा सदमा बैठा कि वो भी कुछ दिन बाद घुट-घुट कर चल बसी. मुझ अभागिन को छोड़ दिया ये दुख देखने के लिए. क्या बताऊं बहन, अब न जिया जाता है न मरा."

वो थोड़ी देर रुकी और भीग आई आंखों को पल्लू से साफ़ कर फिर कहने लगी.

"अब तो एक पोती ही है. उसी को देख-देख कर जी रही हूं."

मैंने उनकी पोती का ज़िक्र सुना तो रहा नहीं गया और उनके पास खाली पड़ी कुर्सी पर आकर बैठ गया.

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मेरी तरफ़ देखते ही वह फिर बोल पड़ीं, "बेटा कभी-कभी हमारे भी घर जा जाया करो. तुम भी तो मेरे बेटे की तरह ही हो. अब तो आप लोगों का ही सहारा है."

वो बूढ़ी औरत आगे और कुछ बोलती, इससे पहले ही मैं बोल उठा, "क्यों' नहीं? मैं आज ही आपके घर आऊंगा," और खड़ा हो जल्दी से अपने कमरे में जा नया सूट निकाला जो कुछ ही दिन पहले सिलवाया था. सूट पहनने के बाद ख़ुद को हैंडसम दिखाने के लिए गले में टाई पहनी, कपड़ों पर सेन्ट छिड़का और काफ़ी देर तक शीशे के सामने खड़ा-खड़ा ख़ुद को निहारने के बाद कमरे से बाहर निकला. तब तक वो बुढ़िया जा चुकी थी. जब मां ने मुझे सजे-संवरे देखा तो पूछा, "अब कहां जाने का इरादा है?"

"बस... यहीं... पड़ोस तक मां..." हिचकिचाहट में इतना ही कह पाया.

"अच्छा अच्छा हो आओ. बेचारी बूढ़ी औरत कितने आदर से कह रही थी."

अन्धा क्या चाहिए दो आंखें, मैं दौड़-सा पड़ा.

उनके घर में दाख़िल हुआ तो देखा, वो लड़की बैठी सब्ज़ी काट रही थी. उसे मेरे आने की कोई ख़बर न हुई, लेकिन उस बुढ़िया ने मुझे अंदर आते देख लिया था.

"आओ बेटा, आगे आ जाओ. शरमाते क्यों हो?" उस बुढ़िया ने पुकारा तो उस लड़की ने हैरत भरे अंदाज़ में मेरी तरफ़ देखा कि अचानक कौन आ गया? जैसे ही एक दूसरे से हमारी आंखें मिलीं, मैं उसकी गहरी नीली आंखों में डूबता सा गया. जी चाहा, आगे बढ़कर इन आंखों को चूम लू, उसने शरमाते हुए आंखें झुका ली.

बुढ़िया ने आंगन में पड़ी चारपाई पर बैठने का इशारा किया तो मैं चारपाई पर गिर सा पड़ा, वो चारपाई से थोड़ी ही दूर बैठी थी.

"ये हमारे पड़ोसी प्रभुदयाल जी के बेटे हैं, बेटी." मेरा परिचय कराते हुए उस बुढ़िया ने कहा,

हल्की सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर उभरी, मैंने जल्दी से कहा, "हेलो."

उसने शरमाते हुए जवाब दिया, "नमस्ते." शायद हिंदी भाषा को पूरा सम्मान दे रही थी. मुझे अपने अंग्रेज़ी बोलने पर ग्लानि सी हुई. मैंने बात ज़ारी रखने के इरादे से पूछा, "आप क्या करती हैं?"

"अभी सेकन्ड इयर के पेपर दिए हैं." उसने सुरीली आवाज़ में उत्तर दिया.

"आगे क्या इरादा है?" मैंने पूरी निकटता बढ़ाने के इरादे से एक और सवाल कर दिया.

"मेरा इरादा तो पढ़ने का है, लेकिन दादी जी व पिताजी मना कर रहे हैं." उसने गर्दन झुकाए-झुकाए ही जवाब दिया.

"अरे, दादी जी पढ़ने दीजिए न इन्हें." मैने उसका साथ देते हुए कहा, "आजकल तो पढ़ाई का ही महत्व रह गया है. बिना पढ़ाई तो आदमी पशु समान होता है. फिर पढ़ाई की कोई सीमा थोड़े ही होती है. जितना ज्ञान ले लिया जाए, कम ही है. फिर इनकी अभी उम्र ही क्या है?" पता नहीं मैंने कितनी ही देर शिक्षा पर भाषण दिया. मैं तो और भी बोलता जाता, अगर उसने बीच में टोककर पूछा न होता, "आप क्या काम करते है?"

मैंने चेहरे पर पूरी मुस्कुराहट लाते हुए कहा, "बी.ए. फाइनल का एग्जाम दे रखा है, बस परिणाम निकल आए, फिर आगे की सोचूंगा."

वो आगे कुछ न बोली तो मैंने फिर बात करने के लिहाज़ से पूछा, "आपने अपना नाम नहीं बताया?"

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"मेरा नाम नलिनी है."

"जी, मेरा नाम सुरेश है." मैंने बिना पूछे ही फटाक से अपना नाम बता दिया.

अभी हम बातें कर ही रहे थे कि उनकी दादी जी चाय बनाकर ले आईं, "लो बेटा चाय."

"अरे दादी जी, आपने ये तकलीफ़ ख्वाहमख्वाह की, मैं कोई गैर थोड़े ही हूं, मैं तो घर का सदस्य हूं." मैंने नलिनी से पूरी नज़दीकी बनाने के इरादे से कहा.

"अरे फिर क्या हुआ? घर के सदस्य क्या चाय नहीं पीते बेटा?" बुढ़िया ने कहा तो मैंने चाय की प्याली उनके हाथ से पकड़ ली और चुस्की लेते हुए चाय पीने लगा. साथ ही नलिनी को बराबर निहार रहा था, वो मेरे सपनों के शीशमहल में पूरी तरह फिट थी. जी चाह रहा था कि एकान्त में ले जाकर उसके होंठ चूम लू, लेकिन अगले ही पल मन ने सचेत कर दिया, ज़ल्दबाज़ी ठीक नहीं होती.

चाय की प्याली खाली कर नीचे रखी और खड़ा होता हुआ बोला, "अच्छा दादी जी अब चलूंगा." लेकिन मेरा ध्यान नलिनी पर ही था.

"अच्छा बेटा, आते-जाते रहा करो. तुम्हारा अपना ही घर है." बुढ़िया ने कहा,

"हां... हां इसमें क्या शक है. आप भी नलिनी जी कभी हमारे घर आइएगा." मैंने उसके चेहरे पर नज़र गड़ाते हुए कहा.

"कभी ज़रूर आऊंगी." उसने हल्की सी मुस्कुराहट लाते हुए कहा तो मेरा मन झूम उठा.

शाम को विजय से मुलाक़ात हुई तो सारी कहानी विजय को बता दी. विजय ने मेरा हाथ दबाते हुए कहा, "भैया तुमने तो आख़िर जगह पक्की कर ही ली. कभी हमें भी मिलवाइए उससे."

"मौक़ा मिला तो..." मैंने गर्व से उत्तर दिया.

"लेकिन ध्यान रखना, बदमाशी नहीं चलेगी, कहीं मेरा काम तुम बिगाड़ न देना."

"अरे नहीं यार." विजय हंस पड़ा.

मेरी घनिष्ठता नलिनी के साथ ख़ूब बढ़ गई. कभी वो हमारे घर आती, कभी मैं उनके घर चला जाता. कभी-कभी तो खाना भी हम साथ ही खाते. यानी हम दोनों का परिवार एक-दूसरे से ख़ूब घुल-मिल गया. कभी-कभी बातों-बातों में मैं उसको छू देता तो वह बिल्कुल भी बुरा न मानती. मेरा हौसला बढ़ जाता. कई बार नलिनी को मैंने दिल की बात कहनी भी चाही, लेकिन ये सोचकर रुक गया कि कभी अकेली होगी, तब कहूंगा.

एक दिन नलिनी के पिता जी व दादी जी को किसी रिश्तेदार से मिलने दूसरे गांव जाना था. जाने से पहले वे मम्मी को बोल गए थे कि हम शाम को लौटेंगे, अपनी रिश्तेदारी में मिलने जा रहे हैं. घर का ध्यान रखिएगा, नलिनी घर पर अकेली ही है.

मैं स्नानघर में नहा रहा था, मैंने भी सुन लिया. मैं इसी सुनहरे मौक़े की ताक में था. मेरा मन ये सोचकर ख़ुश था कि आज नलिनी घर पर अकेली ही है. मेरा मन कल्पना की ऊंची उड़ानें भरने लगा.

दोपहर का समय था, गर्मी अपनी पूरी जवानी पर थी. सूरज देवता लगातार आग बरसाए जा रहे थे. लोग अपने-अपने घरों में ठंडी छांव का आसरा लिए सो रहे थे, लेकिन मेरी आंखों में नींद कहां, मुझे तो बस नलिनी ही दिखाई दे रही थी.

मम्मी भी सोई पड़ी थी. मैं कांपते दिल से उठा और नलिनी के घर में घुस गया. नलिनी कमरे में सोई पड़ी थी. छत पर पंखा चल रहा था, नलिनी को शायद नींद नहीं आ रही थी. आंखें बंद किए पड़ी थी, तभी तो मेरे पदचापों की आहट सुन चौंक पड़ी, "अरे सुरेश तुम? मैं तो डर ही गई थी."

"इसमें डरने की क्या बात है?" मैने तीखी नज़रें नलिनी के सारे बदन पर घुमाते हुए कहा.

"आओ सुरेश, बैठो. मैं सुबह से अकेली ही पड़ी बोर हो रही थी. अच्छा हुआ, तुम आ गए." नलिनी ने कहा तो मेरा हौसला बढ़ गया.

मैं उसी बेड पर बैठ गया, जिस पर नलिनी लेटी हुई थी. नलिनी ने नीले रंग का गाउन पहन रखा था. वह मुझे आज हमेशा से ज़्यादा अच्छी लग रही थी. मेरा मन बेकाबू होने लगा. मेरी आंखों में वासना के लाल डोरे तैरने लगे. मैं एकटक नलिनी को खा जाने वाली नज़रों से देखने लगा. शायद नलिनी मेरी बिगड़ी नियत को ताड़ गई, तभी तो उसने उठकर बैठते हुए कहा.

"ऐसे क्या देख रहे हो सुरेश?"

"नलिनी, तुम नहीं जानती मैं तुमसे कितना प्यार करता हूं. मैंने तुम्हें जिस दिन से देखा है, न नींद आती है न चैन मिलता है. नलिनी आज तो मेरी प्यास बुझा दो." मैंने धीरज खोते हुए कह दिया.

नलिनी को जैसे बिजली का शॉक लगा, झटके से खड़े होते हुए कहा, "सुरेशा मैंने ये कभी भी नहीं सोचा था कि तुम इतने गिरे हुए इंसान हो. मैंने तुममें हमेशा अपना खोया हुआ भाई देखा है.‌ हमेशा भाई की तरह प्यार किया है और तुमने उस प्यार का ग़लत मतलब निकाल लिया. क्या तुम्हारी नज़र में औरत सिर्फ़ वासना पूर्ति का ही नाम है? उसमें मां या बहन का कोई स्थान नहीं? आज तुम जैसे लोगों की वजह से ही भाई-बहन का रिश्ता भी बदनाम हो चुका है. आज तक तुम्हें मुझमें सिर्फ़ वासना ही दिखाई दी है और इसी उम्मीद के सहारे तुमने मुझसे निकटता बढ़ाई है. तो लो मेरा जिस्म हाज़िर है. कर लो अपनी वासना पूरी." कहते हुए नलिनी ने गाउन के बटन खोल दिए.

मारे शर्म के मैं ज़मीन में गड़ा जा रहा था. मेरी नज़रें नलिनी के सामने उठ नहीं पा रही थीं. मरे हुए लहज़े में बस मैं इतना ही कह पाया, "मुझे, क्षमा कर दो नलिनी, मुझसे भूल हो गई. वासना ने मेरी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया था."

नलिनी अपना गाउन ठीक करते हुए उठकर मेरे पास आई. मेरा झुका चेहरा अपने हाथों से ऊपर उठाया और बोली, "मैं जानती हूं सुरेश, तुम एक अच्छे लड़के हो. लेकिन वासना ने तुम्हारी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया था. मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया. ये बात हम दोनों के बीच ही रहेगी. वादा करो, आज के बाद हर लड़की को आदर की दृष्टि से देखोगे."

मैंने अश्रुपूरित नयन ऊपर उठाए तो नलिनी ने अपने हाथों से आंसू पोंछते हुए कहा, "आदमी कभी-कभी भटक जाता है सुरेश. ग़लत लोगों की संगत से, ग़लत फिल्में देखने से जो मैल तुम्हारे मन पर जम चुका था, वो इन पश्चाताप के आंसुओं से धुलकर बाहर निकल गया है. वादा करो, हर रक्षाबंधन के दिन अपनी इस बहन से राखी बंधवाने ज़रूर आओगे, चाहे मैं कहीं भी होऊ."

"दीदी!" कहते हुए मैं नलिनी से लिपट गया, तो नलिनी की भी आंखें भर आईं. आज वास्तव में उसे खोया हुआ भाई मिल गया था.

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