अब शालू के धाराशायी होने की पराकाष्ठा थी. जिन दो प्राणियों से घबरा कर चली गई थी, वे स्वयं ही उसके सामने से दूर चले गए. पर शालू क्या स्वयं को क्षमा कर पाएगी. उसकी बोलने, समझने की शक्ति ही मानो चली गई. आज लगता है समय फिर स्थिर होकर अट्टहास कर उठा हो उसकी पराजय पर. उसकी पहुंच से दूर हो गया है.
धूप की पेबंद लगी लॉन के चारों तरफ़ ढेरों छात्र-छात्राओं का झुंड फैला हुआ था. अचानक घंटी बजते ही अधिकांश छात्र अपनी-अपनी कक्षाओं में चले गए, जो बच गए वे या तो पुस्तकालय में चले गए या वहीं पेड़ों के झुरमुट में पुस्तक लेकर बैठ गए.
तभी कॉलेज कंपाउंड में सफ़ेद फिएट कार ने प्रवेश किया. बचे खुचे छात्रों ने कार की तरफ़ देखा और कई वाक्य हवा में तैर गए, "वह आ गई मिसेज अशोक, अरे अशोक नहीं शालिनी कहो. उसे अब मिसेज अशोक कहलाना पसंद नहीं."
कंधे तक कटे बाल, हल्के हरे रंग की साड़ी हाथ में नोटबुक सम्हाले जल्दी-जल्दी क्लास की तरफ़ बढ़ी, तब तक आधा लेक्चर ख़त्म भी हो चुका था. अध्यापक उसे देखकर रुके, टोकने की इच्छा हुई फिर चुप लगा गए. आगे के कुछ छात्रों ने पीछे घूमकर देखा, कनखियों में मुस्कुराए भी. एक ने तो एक वाक्य भी हवा में उछाल दिया, "देर तो होनी ही है, वकील-कचहरी का चक्कर जो है."
शालिनी का पूरा चेहरा अपमान से तमतमा उठा. तभी पास बैठी टीना ने धीरे से उसका हाथ दबा दिया, "कीप कूल बी पेशेन्स."
क्लास छूटने के बाद का पीरिएड खाली था. शालिनी का दम घुट रहा था इस कारण उसने घर चले जाना चाहा, पर टीना ने रोक लिया, "इस तरह दब्बू बनने से काम नहीं चलता. कहां गया वह तेरा दबंग रूप?"
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कई बार शालिनी ने अपना वह रूप याद करने का प्रयास किया है, पर विचारों में शून्यता के सिवा कुछ आता ही नहीं. दो दिन पूर्व ही पुस्तकालय से निकलते हुए रंजन दिख गया था. कैसी आत्मीयता से उसने पूछा था, "कैसी है आप मिसेज अशोक?" परन्तु शालिनी को लगा था वह व्यंग्य बोल रहा है. तभी उधर से नज़रें नीची किए अशोक गुज़रा था और शालिनी ने मात्र उसी को सुनाने के लिए ज़ोर से कहा था, "मेरा एक अकेला भी नाम है मि. रंजन, वह है शालिनी."
अशोक पर इस बात की प्रतिक्रिया क्या हुई, यह नहीं जान पाई, हां महसूस ज़रूर किया. टीना ही उसे, "हमें जल्दी है." कहकर लॉन में पीछे खींच लाई थी. सहेली के कंधे पर सिर रखकर वह सिसक पड़ी.
"सच बता शीलू, तू वाकई अशोक के साथ नहीं रहना चाहती."
"सिर्फ़ उसके घरवालों के..."
"पर अशोक तो अपने घर का पर्याय है."
"हां टीना, पर मैं उस वातावरण में नहीं रह सकती." "कोशिश तो कर."
"कोशिश..." शालिनी क्रोध में फुफकार उठी, "टीना मैंने तो पूरे तीन माह उस घर में बिताए हैं, पर तू एक दिन भी उस घर में नहीं रह सकती है. जहां सूखी मरियल कुत्तों सी टांगों पर तुझे तेल लगाने को कहा जाए, जिनके पास बैठने मात्र से बदबू के मारे जी मिचलाने लगे, बोल रह सकेगी तू ऐसे वातावरण में."
"मेरे रहने की बात मेरे निर्णय पर टिकी है, तूने फिर विवाह का निर्णय कैसे ले लिया था?"
"बस तेरे इसी प्रश्न का उत्तर शायद मैं न दे सकूं, क्योंकि अशोक से मुझे अभी भी कोई शिकायत नहीं है."
घर लौटते ही बाहर गार्डन में वकील अंकल और पापा दिख गए. कॉफी की चुस्कियों के बीच राजनीति की नमकीन बहस शुरू हुई थी.
"कम, माई चाइल्ड."
"थैंक्स डैडी. मैं आराम करूंगी."
"ओके ओके... थक गई होगी हमारी बेटी." वकील की धीमी हंसी के साथ ही उसने सुना, "पंकज आ जाए तो बेचारी का अकेलापन कुछ कम हो."
कमरे में आते ही वह धम्म से पलंग पर गिर पड़ी. आलमारी में रखी अशोक की तस्वीर देखने की इच्छा हुई. सामने का कार्निस कितना खाली-खाली लग रहा है फोटो बिना, पर मन का खालीपन कैसे भरे? रात की ख़ामोशी में अशोक के चौड़े वक्ष पर सिर रखकर वह मस्त नींद कितनी याद आती है, उसका सौम्य चेहरा, धीमे-धीमे बात करने का ढंग... सब कुछ कितना प्यारा है. पर वकील अंकल ने कितने झूठे आरोप लगाए है अशोक पर. कहते हैं, यदि झूठ नहीं बोले तो तलाक़ मिलना मुश्किल हो जाएगा. पर तलाक़ के लिए वह अशोक पर कैसे झूठ आरोप लगा दें? उसने तो तलाक़ चाहा भी नहीं है. जाने क्यों डैडी ही हाथ धोकर पीछे पड़े हैं. शायद पंकज की ख़ातिर जो विदेश से अगले हफ़्ते भारत वापस आ रहा है.
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अशोक से विवाह का निर्णय कितना रोमांचकारी था. सबने तब कितना समझाया था. कहां वह एक ऊंचे बिज़नेसमैन की बेटी, कहां कॉलेज का पुस्तकालयाध्यक्ष अशोक, हरिजन जाति का. मां एवं बहन का अकेला पालनकर्ता, पर अशोक के मोहक व्यक्तित्व एवं प्रेस रिपोर्टरों की वाह-वाह में वह सब कुछ भूल बैठी थी. शादी के समय डैडी लंदन में थे, वरना शायद शादी हो भी नहीं पाती. दोस्तों ने ही शादी और बाद में एक पार्टी का आयोजन किया था.
लन्दन से लौटकर डैडी उससे मिलने भी नहीं आए, पर धीरे-धीरे बेटी का मोह उन्हें बेचैन करने लगा तो बेटी को बुलवाया था. पर अशोक को नहीं. पिता से मिलने की उत्सुकता एवं ख़ुशी में शालिनी ने ध्यान भी नहीं दिया और अशोक को साथ ज़रूर ले गई. बड़ी कोठी और वर्दीधारी नौकरों की फौज के बीच ढेरों भोज्य सामग्री में अशोक क्या खाए क्या नहीं, की स्थिति में अकुला उठा. डैडी ने अपनी विलासिता एवं वैभव का आज खुला प्रदर्शन किया है यह उससे छुपा नहीं रह सका. चलते समय डैडी ने प्रश्न किया, "यहां कब आ रही हो?
"क्यों डैडी?"
"क्या तुम उस घर में ख़ुश हो? वैसे यहां भी रह सकती हो, मैं तो ज़्यादातर बाहर ही रहता हूं. नौकरों के ऊपर कोई तो होगा."
उसने अशोक की प्रतिक्रिया के लिए उसकी तरफ़ देखना चाहा तब तक वह टहलता हुआ गेट तक पहुंच चुका था, शायद जान-बूझकर ताकि बाप-बेटी के वार्तालाप के मध्य वह न रहे.
"देखेंगे." कहती हुई शालू भी गेट की तरफ़ बढ़ गई. उस दिन अशोक काफ़ी गुमसुम था. शालू का आज का अध्याय उसकी ज़िन्दगी की किताब में कहीं दीमक न लगा दे.
दूसरे दिन अशोक ने ही बताया था, गांव से मां एवं बहन राधा आ रही हैं. अब वे यहीं रहेंगी, हमारे साथ.
"यहां! इस छोटे से घर में." शालू को आश्चर्य हुआ.
"इस घर में दो कमरे हैं शालू."
"पर वहां गांव में उन्हें क्या दिक्क़त है?"
"वहां कोई उन्हें देखने वाला नहीं है. मां अक्सर बीमार रहती हैं. जवान बहन, फिर अब मेरी शादी हो गई है. अकेला था तो और बात थी. अब हमारी भी उनके लिए कोई ज़िम्मेदारी है." अशोक ने शालू को काफ़ी समझाया, पर निरुत्तरित शालू कुछ समझी नही़ की स्थिति में जड़वत् बनी रही.
मां उसे देखकर आशीर्वादों की झड़ी लगा दी, "अहा! पूरे गांव ऐसी सुन्दर बहू क्या किसी की होगी."
राधा तो उससे लिपट ही गई, "कैसी चांद की तरह हो... तुम्हारे हाथ कितने नाज़ुक हैं और तुम ख़ुद कितनी प्यारी हो भाभी."

शालू इस दुलार अपनत्व के बीच सांस रोके खड़ी रही. शरीर से अजीब तरह की उठती गन्ध से उसका दिमाग़ चकरा रहा था. मैले कपड़ों में काली डंडियों पर सूखी खाल चढ़ाए मां के कुशकाय शरीर से उसे घृणा हो आई. उफ् कैसे सहेगी वह इन दो प्राणियों को सारे समय एक ही घर में.
वह दिनभर कमरे में पड़ी रहती. राधा ने भी भाभी का रूख समझकर उसके पास जाना कम कर दिया. दोनों मां-बेटी अपने ही घर में परायों सी सहमी-सहमी पड़ी रहतीं. अशोक अजीब असमंजस में था. उधर शालू का जब-तब अपने डैडी के पास जाना भी शुरू हो गया था.
कुछ ही दिनों बाद उसने अशोक से कह दिया था, "इन्हें यहां बुलाने की क्या ज़रूरत थी. वहां गांव में क्या बुरी थीं."
शर्ट पहनते अशोक के हाथ रुक गए, "कैसी बात करती हो शालू, बेटे की शादी हो गई है. वहां गांव में अकेली रहकर क्या करेंगी, इसी से मैंने बुलाया है. फिर वे तो तुम्हें कुछ नहीं कहतीं. चलो नाश्ता लाओ, मुझे देर हो रही है."
"नाश्ता तैयार है भइया." अशोक की बहन ने कमरे में आते हुए कहा, "अरे वाह, मक्के की रोटी और मट्ठा वाह, राधा तूने तो कमाल ही कर दिया. आज तो जैसे तूने मुझे अपने गांव की मिट्टी में पहुंचा दिया." उस दिन सबके लाख कहने के बावजूद शालू ने नाश्ता नहीं किया. स्वप्र में भी मक्के की रोटी न देखने वाली भला उसे खाती कैसे? थोड़ी देर में ही राधा भाभी के लिए चाय और टोस्ट का नाश्ता लेकर आ गई. एक घूंट पीते ही शालू ने वह चाय उठाकर बाहर फेंक दी थी. "उफ यह चाय है या कड़वी दवा छीः क्या लोग हैं?”
"चाय अच्छी नहीं थी तो मत पीती कप क्यों फेंक दिया?" अशोक ने शान्त स्वर में पूछा.
"अपने घर में मैं क़ीमती बर्तनों को भी फेंक देती थी."
"यह तुम्हारा करोड़ों की सम्पत्तीवाला मायका नहीं अठारह सौ रुपए वेतन पाने वाले एक लाइब्रेरियन का घर है, उम्मीद है आइन्दा ध्यान रखोगी."
क्रोध से फुफकारती हुई शालू उस समय अशोक के प्रति अपना प्यार और नीति-अनीति की सभी बातें भूल गई थी. सिर्फ़ डैडी की ही बातें याद रह गई थी, "यहां कब आ रही हो?"
शाम को घर वापस लौटने पर अशोक को पता चला कि शालू अपने मायके चली गई है. मां-बेटी अपराधियों सी आंगन में मुंह गाड़े बैठी थीं. अशोक ने शालू को बुलाने का प्रयास भी नहीं किया. मां और राधा भी दो-चार दिन शान्त वातावरण में सांस ले सकेगी. तब तक शालू का ग़ुस्सा भी उतर जाएगा. आख़िर उसने उससे प्रेमविवाह किया है. अपनी करोड़ों की सम्पति और ऐशोआराम को छोड़कर उसके पास आई है. थोड़ा ग़ुस्सा, ज़िद्दीपन तो होगा ही. एकदम से सम्भ्रान्त परिवार का वैभव कैसे समाप्त हो जाएगा.
लेकिन शालू के स्थान पर अशोक को मिली थी उसकी चिट्ठी- एक भयानक शर्त पर वापस लौटने का अनुबन्ध, तुम्हें अलग मेरे साथ घर बसाना होगा.
आज शालू सोच रही है, क्या अशोक के घर से वह मात्र अच्छी चाय न मिल पाने के झगड़े के कारण आई है या उसका स्वार्थ व अहंकार यहां तक खींच लाया है. अशोक पर किसी और का अधिकार वह बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी. उसने अशोक से प्यार किया था, उसे जी जान से चाहा था, पर अपना एकछत्र अधिकार रखकर ठीक उस खिलौने की तरह जिसे बचपन में एक बार ख़रीद लेने के बाद किसी और के हाथ में वह उसे नहीं देख पाती थी.
समय लगता तो गतिवान है, पर कभी-कभी क्या ऐसा नहीं लगता कि समय ठहर सा गया है. मन का उद्वेग, चंचलता और आवेग सब कुछ मानो ठहर कर बांध बन जाते हैं. शालू को भी लगता है अशोक से दूर होने के बाद मानो समय ठहर गया है. घड़ी की चलती सुई उसे स्थिर ही नज़र आती है. इस सुई को गतिवान बनाने के लिए ही उसने दुबारा कॉलेज में दाखिला ले लिया है. उसे याद आया अशोक ने भी उसे एक बार यही राय दी थी.
उस दिन मौसम बड़ा ख़ुशनुमा था. राधा को बुखार आ रहा था. खाना मां ने ही बनाया था.
शालू हाथ बंटाने गई तो वापस कर दिया, "जा बेटी, अभी अशोक घर में है जा, वहीं बैठ."
"आज आउटिंग पर चलते हैं मेरा तो दम घुट रहा है."
"तुम अपनी पढ़ाई क्यों नहीं चालू रखतीं. दिल भी बहल जाएगा." शेव बनाता अशोक बोला. बेबसी से बिस्तर पर करवट बदलते हुए बार-बार अशोक का ध्यान आ जाता. बन्द आंखों के सामने उसका मुस्कुराता सौम्य चेहरा उसके बदन पर हौले-हौले हाथ फेरता अशोक, मानो मन्दिर की किसी प्रतिमा को स्नान करा रहा हो.
शालू को अशोक ने काफ़ी समझाया था. ऊंच-नीच समझाई थी. अपने प्यार का वास्ता दिया था, पर शालू अपनी ज़िद पूरी न होने के कारण नहीं लौटी थी और अशोक मां-बहन से दूर होने की सोच भी नहीं सकता था. इसी समय वक़्त की नाज़ुकता को देख आधात किया था डैडी ने. यही अवसर है जब शालू को अशोक के चंगुल से छुड़ाया जा सकता है. वकील मित्र के विदेशी प्रवासी बेटे पर उनकी शुरू से नज़र थी. उसी के प्रकरण में उन्होंने तलाक़ का मुक़दमा ठोक दिया. तलाक़ के बाद दोनों अपने तरीक़े से जीने के लिए आज़ाद हो जाएंगे. कैसा क़ानून है, कैसा न्याय है यह, अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरों का ब्याह का बन्धन भी अदालत में तलाक़ मिल जाने पर ख़त्म हो जाता है.
इधर शायद स्थिर होने के बाद भी समय गतिवान हो गया है शालू ने सोचा, जब अंकल ने बताया कि कल उसे अशोक से तलाक़ मिल जाएगा. कैसे ख़ुश हो रहे थे पापा और अंकल... और शालू... वह ख़ुश है या दुखी, स्वयं वही नहीं समझ पा रही है.
कैसा रोमांचकारी अनुभव होगा जब वादी और प्रतिवादी एक साथ कार में जाएंगे, साथ उतरेंगे और अदालत में प्रवेश करेंगे. पत्रकारों को तो अच्छा-ख़ासा मसाला मिल जाएगा.
शालू ने वही किया. आज कोर्ट वह अशोक को लेकर साथ जाएगी. एक लम्बा समय बीत गया उसकी बात सुने हुए फिर तो दोनों के रास्ते अलग हो जाएंगे. वह अपनी आंखों से देख तो ले कि अशोक उसके बगैर कैसे जी रहा है? पर शालू स्वयं सोचने लगी अशोक का सामना... अलगाव की स्थिति में क्या वह झेल पाएगी?
घर से थोड़ी दूर पर ही कार रोक कर शालू पैदल ही चल पड़ी. देखा घर के चबूतरे से अशोक उतर रहा है.
"तुम आज यहां?"
"क्यों कोर्ट नहीं जाना क्या?"
"तुम जाओ मैं नहीं जा सकता मैंने वकील को कह दिया है- मैं अभी गांव जा रहा हूं."

अशोक की लाल आंखें, उड़ा-उड़ा सा चेहरा, रूखे बाल शालू का दिल मचल उठा शायद उसका अलगाव अशोक झेल नहीं पा रहा.
"खैरियत तो है अशोक?"
"कल रात मां गुज़र गई. अभी तार आया है."
"मां गांव में थी?"
"तुम्हारे जाने के दो दिन बाद ही गांव चली गई थीं कि मेरे कारण बहू गई है उसे बुला लो मैं चली जाती हूं."
शालू के ऊपर मानो आसमान आ गिरा. अशोक चलने को हुआ तो शालू ने कांपते शब्दों में साहस करके पूछ लिया, "राधा भी गांव चली गई क्या?"
"उसकी पिछले माह शादी हो गई. अपने ससुराल में है वह."
अब शालू के धाराशायी होने की पराकाष्ठा थी. जिन दो प्राणियों से घबरा कर चली गई थी, वे स्वयं ही उसके सामने से दूर चले गए. पर शालू क्या स्वयं को क्षमा कर पाएगी. उसकी बोलने, समझने की शक्ति ही मानो चली गई. आज लगता है समय फिर स्थिर होकर अट्टहास कर उठा हो उसकी पराजय पर. उसकी पहुंच से दूर हो गया है.
अशोक जा चुका था. दरवाज़े पर लगा ताला उसे मुंह चिढ़ा रहा था.
- साधना राकेश
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