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कैसे करें बच्चों का सोशल मीडिया डिटॉक्स? (How to do social media detox for children?)

बच्चों का सोशल मीडिया को हमेशा स्क्रोल करते रहना अब आम बात हो गई है और वे इससे होनेवाले नुक़सान से भी अनजान हैं. ऐसे में पैरेंट्स यहां दिए गए स्मार्ट ट्रिक्स अपनाकर बच्चे का सोशल मीडिया डिटॉक्स कर सकते हैं.

किसी भी नई तकनीक का आविष्कार जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए किया जाता है. सोशल मीडिया ने भी मनुष्य को दूरस्थ मित्रों व रिश्तेदारों से जुड़ने में मदद की. ऑनलाइन शिक्षा आदि का लाभ भी मिला, लेकिन अति हर बात की बुरी होती है. आजकल हर बच्चा पूरे समय फोन, लैपटॉप या टैब में ही नज़रें जमाए बैठा रहता है. एक तरह से बच्चे डिवाइस के आदी बनते जा रहे हैं. वर्तमान समय में सोशल मीडिया से दूर रहना या बचना नामुमकिन सा लगता है. लगातार आनेवाले नोटिफिकेशन की भीड़ में बच्चे गुम रहते हैं. कई बार दूसरों की देखादेखी उन्हें ख़ुद को और अपनी ज़िंदगी को सोशल मीडिया पर बेहतरीन रूप में दिखाने का तनाव भी होता है. लेकिन लंबे समय तक इस तनाव में रहने के कारण बच्चों के कोमल मन मस्तिष्क पर बहुत से कुप्रभाव भी पड़ सकते हैं.

- दूसरों के चकाचौंध वाले जीवन को देखकर या ऐसी रील्स देखकर भले ही वह झूठ हो, अधिकांश बच्चे ईर्ष्या का अनुभव करते हैं. यह ईर्ष्या अधिक समय तक रही, तो कुंठा और अंत में कुंठा अवसाद में बदल सकती है.

- अधिक समय तक सोशल मीडिया पर रहने से फोन या टेबलेट की रौशनी बच्चे की नींद को प्रभावित करती है, क्योंकि इस रौशनी से मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन में बाधा उत्पन्न होती है और बच्चे अनिद्रा का शिकार हो सकते हैं.

- सोशल मीडिया पर आनेवाले नोटिफिकेशन को देखने की लत में बच्चे परिवार के साथ होने पर या बाहर घूमने जाने पर भी फोन से ही चिपके रहते हैं.

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- बच्चा को डूम स्क्रॉलिंग की लत लग सकती है, जो बहुत ही ख़तरनाक है. इसमें बच्चे लगातार सोशल मीडिया पर नकारात्मक ख़बरें और फीड्स देखने के आदी हो जाते हैं. इससे वे भावनात्मक रूप से डर, चिंता और तनाव में घिरने लगते हैं.

- बच्चा टाइम मैनेजमेंट नहीं कर पाता, क्योंकि एक बार फोन हाथ मे लेने के बाद घंटों कहां बीत जाते हैं, यह समझने की उसकी क्षमता ही ख़त्म हो जाती है. इससे न वह ठीक से सो पाता है, न आराम करता है और पढ़ाई में भी पिछड़ जाता है.

- खाने-पीने के स्वाद में भी कोई रुचि नहीं रहती, बल्कि उनकी तस्वीरों को सोशल मीडिया पर अपलोड करके लाइक्स और कमेंट्स पाने में अधिक मज़ा आता है.

- बच्चे की सेहत पर असर पड़ता है, क्योंकि वह समय पर खाता-पीता नहीं है और जो खाता है, वह भी मन लगाकर नहीं खाता. कई बार तो बच्चे घंटों तक पानी पीना भी भूल जाते हैं.

- सोशल मीडिया पर ज़्यादा समय बिताने वाले बच्चे अक्सर मूड स्विंग का शिकार होते हैं. उनका भावनात्मक स्वास्थ्य कमज़ोर होने लगता है, जिससे उनमें चिड़चिड़ापन और धैर्य की कमी जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं. सिरदर्द, दृष्टि कमज़ोर होना, पीठदर्द, अकेलापन भी हो सकता है.

यदि आपके बच्चे के व्यवहार में भी इनमें से कोई लक्षण दिखाई देने लगा है, तो यही समय है उसके डिजिटल डिटॉक्स या सोशल मीडिया डिटॉक्स का. बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन पर रहने के दुष्प्रभावों के बारे में बताएं. उन्हें बताएं कि सोशल मीडिया डिटॉक्स कोई सज़ा नहीं, बल्कि उनके अच्छे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है.

कैसे करें डिटॉक्स?

* शुरुआत में दिनभर में छोटे-छोटे डिजिटल ब्रेक रखें. बच्चे को सोने से पहले और उठने के बाद कुछ समय के लिए फोन से दूर रखें. स्कूल से आने के बाद भी उन्हें आधे घंटे तक फोन न दें.

* डिनर के समय सभी सदस्य अपना फोन बंद रखें. यही वह समय रहता है जब पूरा परिवार साथ होता है. इस समय आप अपने बच्चों से बातचीत करें, जिससे वो भी फोन से दूर रह सकेगा.

* घर में स्क्रीन मुक्त ज़ोन बनाएं, जैसे- डायनिंग टेबल, स्टडी रूम, किचन आदि. बच्चों के कमरे में कंप्यूटर, लैपटॉप आदि न रखें. कंप्यूटर ऐसी जगह रखें, जहां बच्चे स़िर्फ पढ़ाई के लिए उसका उपयोग कर सकें और आपकी नज़रों के सामने रहें.

* परिवार के साथ डिजिटल डिटॉक्स रिट्रीट का आनंद लें. इसमें हफ़्ते में कम से कम एक बार बाहर आउटिंग पर जाएं, आउटडोर गेम्स खेलें, प्रकृति के साथ रहें. आपस में ख़ूब बातचीत और मस्ती करें. इससे परिवार के रिश्ते भी आपस में मज़बूत होंगे.

* अकेलेपन से बचने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेने की बजाय बच्चों को दोस्तों से बात करने, घरवालों के साथ समय बिताने, घर के कामों में हाथ बंटाने, व्यायाम करने, बगीचे में काम करने, कोई अच्छी पुस्तक पढ़ने या अपनी हॉबीज़ को पूरा करने के लिए प्रेरित करें.

* मोबाइल का पुश नोटिफिकेशन बंद कर दें. नोटिफिकेशन नहीं आएंगे, तो बच्चा बार-बार फोन भी चेक नहीं करेगा. फोन या डिवाइस को अपनी नज़र से दूर किसी मेज़ पर, दराज में या केबिनेट में रख दें. घर में हर कमरे में घड़ी लगाएं. इससे समय देखने के लिए फोन उठाने की आदत ख़त्म हो जाएगी. सुबह उठने के लिए भी बच्चे के कमरे में अलार्म घड़ी रखें.

* बच्चों को साइक्लिगं या आउटडोर गेम्स खेलने के लिए रोज़ कम से कम एक से डेढ़ घंटे के लिए बाहर खुली हवा में भेजें. उनकी ऑफलाइन गतिविधियों का समय बढ़ाते जाएं. सोने से एक घंटा पहले से घर में डिजिटल कर्फ्यू लगा दें अर्थात कोई भी सदस्य किसी भी डिवाइस को हाथ नहीं लगाएगा. ज़्यादातर स्मार्टफोन में बिल्ट इन फीचर होते हैं, जो कुछ ख़ास ऐप्स पर बिताए जानेेवाले समय को सीमित करने की सुविधा देते हैं. बच्चों द्वारा सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किए जानेवाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए इसके द्वारा समय सीमा तय कर दें.

* कुछ एप्स को ख़ुद ही अनइंस्टॉल कर दें. जब बच्चे आभासी दुनिया से दूर होने लगते हैं, तब वे वास्तविक दुनिया और रिश्तों के क़रीब होने लगते हैं. उनका आत्मविश्‍वास बढ़ता है, एकाग्रता बढ़ती है और बेकार की सूचनाओं और रील्स में उलझना बंद करने से उनका तनाव कम होता है. मस्तिष्क और आंखों को आराम मिलता है. दूसरों के साथ व्यर्थ की तुलना न होने से बच्चे के आत्मसम्मान में वृद्धि होती है.

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अतः अपने बच्चों के साथ सोशल मीडिया के बारे में खुलकर और ईमानदारी से बातचीत करें. संभावित जोखिमों और लाभों पर चर्चा करें. स्पष्ट अपेक्षाएं निर्धारित करें और अपनी चिंताओं को समझाएं. उन्हें अपने अनुभव, चुनौतियां और प्रश्‍न साझा करने के लिए प्रोत्साहित करें. सोशल मीडिया के उपयोग के संबंध में स्पष्ट नियम बनाएं, जिसमें यह भी शामिल हो कि इसे कब और कितनी देर तक इस्तेमाल करने की अनुमति है और ज़िम्मेदार डिजिटल व्यवहार का प्रदर्शन करें.

- विनीता राहुरीकर

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