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कहानी- रिश्तों के दायरे (Short Story- Rishton Ke Daayre)

सुबह के नाश्ते के लिए किचन में जाते हुए रिया को देखकर रुचि सोच रही थी कि नये रिश्ते, नये परिवेश, नये रीति-रिवाजों को अपनाने में समय तो लगता ही है. धीरज रख कर तथा प्यार और सम्मान देकर ही किसी को अपना बनाया जा सकता है. कितना अच्छा हो कि संबंधों में बंधने से पूर्व ही सबको अपने-अपने रिश्तों के दायरे का पता हो, जिससे व्यक्ति दायरे के अंदर रहकर ही अपने कर्तव्यों और अधिकारों का पालन कर सके.

नवीन का विवाह तय होते ही रुचि ख़ुशी से झूम उठी थी. वर्षों बाद एक बार फिर इस घर में शहनाइयों की आवाज़ गूंजेगी. काम अनेक थे और समय कम, क्योंकि बहू रिया के पिता अमेरिका से उसका विवाह करने भारत आए थे तथा उन्हें शीघ्र ही वापस लौटना था. रिया पली-बढ़ी तो विदेश में थी, लेकिन वह भारतीय संस्कृति से प्रभावित थी और भारत में रहकर ही भारतीय संस्कृति से संबंधित शोध कार्य करना चाहती थी, इसके लिए उसने नवीन के कहने पर स्थानीय विश्वविद्यालय में आवेदन पत्र भी दे रखा था.

रिया के पिता आनंद मोहन और नवीन के पिता सुरेन्द्र प्रकाश बहुत अच्छे मित्र थे. आनंद मोहन के अमेरिका जाने के पश्चात भी उनकी मित्रता में कोई कमी नहीं आई थी. जब रिया ने विवाह के पश्चात भारत रहने की इच्छा जाहिर की तो उन्हें सबसे पहले अपने मित्र के पुत्र नवीन का ही विचार आया. फिर जब उन्होंने रिया से इस संदर्भ में बात की तो उसने भी सहर्ष स्वीकृति दे दी थी.

नवीन और रिया बचपन में अच्छे मित्र थे. वास्तव में रिया के भारत प्रेम का कारण नवीन ही था.

रिया के मन की बात जानकर जब आनंद मोहन ने सुरेन्द्र प्रकाश से बात की तो वह ख़ुशी से झूम उठे. उन्हें भला क्या ऐतराज़ हो सकता था? वर्षों की मित्रता अब रिश्तेदारी में बदलने वाली है, यही उनके लिए ख़ुशी और संतोष की बात थी. विवाह का दिन जैसे-जैसे नज़दीक आता जा रहा था, रुचि की व्यस्तता बढ़ती जा रही थी.

विवाह का दिन भी आ गया. बेटे-बहू को स्टेज पर साथ-साथ बैठा देखकर रुचि फूली नहीं समा रही थी. दोनों की जोड़ी लग भी बहुत सुंदर रही थी.

"बहू तो आप बहुत सुंदर लाई हैं." सुजाता ने उसे बधाई देते हुए कहा.

'धन्यवाद' कहकर वह मुड़ी ही थी कि नम्रता ने ज़िंदादिली से कहा, "बहुत-बहुत बधाई रुचि सास बनने के लिए."

"अरे! क्या कह रही हो नम्रता, सास तो मैं आज से दो वर्ष पूर्व ही बन चुकी हूं." रुचि ने सहजता से कहा.

"वह तो मैं भी जानती हूं. लेकिन बहू की सास बनना तथा दामाद की सास बनने में ज़मीन-आसमान का अंतर है."

"वह कैसे..?" रुचि ने आश्चर्य से पूछा.

"दामाद तो चार दिन के लिए आता है तथा आवभगत करवा कर चला जाता है, लेकिन बहू के साथ तो निभाना पड़ता है." नम्रता ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा.

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नम्रता तो कहकर चली गई, किंतु रुचि के लिए अंतहीन प्रश्न छोड़ गई, वह सोचने लगी- नारी रूपा सास और मां एक ही सिक्के के दो पहलू होते हुए भी किसी के लिए अच्छी और किसी के लिए बुरी क्यों हो जाती है? सास के रूप में और मां के रूप में उसके व्यवहार में इतना अंतर क्यों होता है? एक स्त्री जहां बेटियों की स्वतंत्रता की पक्षधर होती है, वहीं बहुओं को परम्परा के नाम पर सैकड़ों बेड़ियां पहनाने से नहीं चूकती. यह स्त्री की कैसी दुविधा है? वह आज तक नहीं समझ पाई थी.

विवाह की सारी रस्में निबटाते-निबटाते भी बार-बार नम्रता के कहे शब्द उसके ज़ेहन में गूंज रहे थे. बहू के साथ तो निभाना पड़ता है... यह सच है कि बहू एक अलग घर, अलग परिवेश से आती है, उसे नए घर, नए परिवेश में ढलने में समय लगता है. लेकिन बहू भी तो बेटी जैसी ही होती है. अगर सारे पूर्वाग्रह त्याग दिए जाएं तो इस रिश्ते में मधुरता आने में कोई संदेह न रहे. वह तो इक्कीसवीं सदी की गिनी-चुनी सासों में से एक है. प्रगतिशील विचारों की है. उसे भला बहू के साथ निभाने में क्या दिक्क़त आएगी?

विवाह ख़ूब धूमधाम से संपन्न हो गया, धीरे-धीरे रिश्तेदारों का जाना भी प्रारंभ हो गया. दूसरे दिन शाम तक घर खाली हो गया, लग ही नहीं रहा था कि कल ही इस घर में विवाह हुआ है.

"दीदी, बहू तो बहुत सुंवर, पढ़ी-लिखी और होशियार है, पर तुम ज़रा संभल कर रहना." घर की अंतिम मेहमान उसकी देवरानी जाते-जाते सीख दे गई थी.

वह चाह कर भी कुछ नहीं कह पाई. भला संभल कर रहने वाली क्या बात है. बहू ही तो है, कोई शेर या भेड़िया तो नहीं, जिससे संभल कर रहा जाए. शायद इसी तरह के वाक्य सास-बहू में दरार पैदा कर मनमुटाव का कारण बनते हैं. सोचते हुए उसे वितृष्णा हो आई थी.

सुबह आठ बजे बहू रिया स्लीवलेस गाउन पहने आंख मलते हुए बाहर आई तथा सोफे पर पांव रखकर बैठते हुए बोली, "हाय मॉम, हाय डैड, वेरी गुड मार्निंग, उठने में थोड़ी देर हो गई."

रिया की वेशभूषा और हावभाव देखकर बीसवीं सदी की सास का आक्रोश निकलने ही वाला था कि इक्कीसवीं सदी की प्रगतिशील सास बीसवीं सदी पर हावी होते हुए बोली, "कोई बात नहीं बेटा... चाय पीओगी?"

"नहीं मॉम, मैं चाय नहीं पीती." कहकर रिया बेतकल्लुफ़ी से टी.वी. खोलकर बैठ गई.

उसे वे दिन याद आ गए जब वह सुबह उठकर दर्जन भर लोगों के पैर छूकर आशीर्वाद लेने के पश्चात अपने दिन का‌‌ शुरुआत करती थी. रात्रि को सोने से पहले भी सास-ससुर के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेना आवश्यक था. सुरेन्द्र ने प्रथम रात्रि में ही उसे बता दिया था कि उसके घर सुबह उठकर तथा रात्रि में सोने से पूर्व घर के बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने की प्रथा है. तो क्या नवीन ने अपनी पत्नी को अपने घर के रीति-रिवाजों के बारे में कुछ नहीं बताया? वह तो अच्छा हुआ कि सारे रिश्तेदार कल ही चले गए, वरना उसके ऐसे व्यवहार को देखकर न जाने क्या सोचते?

"बहू, देखना तो सही किसने इतना तेज टी.वी. चला दिया, मेरी पूजा में विघ्न पड़ रहा है." टी.वी. की आवाज़ सुनकर अंदर से पूजा करती अम्मा जी बोलीं.

"मॉम, दादी मां से कहना कि पूजा घर का दरवाज़ा बंद करके पूजा कर लें. मेरा मनपसंद प्रोग्राम आ रहा है, अभी मैं टी.वी. बंद नहीं करूंगी." बच्चों की तरह कहकर वह टी.वी. देखने में मगन हो गई.

वह समझ नहीं पाई कि किसको क्या कहे, लेकिन उसकी तेज़ आवाज़ ज़रूर अम्मा जी तक पहुंच गई होगी तभी उन्होंने कुछ नहीं कहा.

शाम को उनका पिक्चर जाने का प्रोग्राम था. जीन्स और टॉप में तैयार होकर रिया निकली तो रुचि ने रोकना चाहा... शब्द निकलने को ही थे कि उसकी मनःस्थिति समझ कर रिया पहले ही बोल उठी, "मॉम, मोटर साइकिल पर साड़ी पहनकर बैठना अच्छा भी नहीं लगता और कन्वीनियेंट भी नहीं रहता."

सास ने मुस्कुराकर जाने की इज़ाज़त दे दी. आख़िर नई-नवेली दुल्हन से तक़रार करने से क्या लाभ?

"नई-नवेली दुल्हन पायल झनकाती आये तो अच्छी बात है... मरदाने कपड़ों में बहू-बेटी अच्छी नहीं लगती है. लाड में इतनी छूट न दे कि बाद में पछताना पड़े." अम्मा जी चेतावनी भरे स्वर में बोलीं.

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अम्मा जी शायद अपनी जगह ठीक थीं, लेकिन वह यह नहीं समझ पा रही थीं कि इक्कीसवीं सदी की बहू से ज़बरदस्ती कुछ भी नहीं करवाया जा सकता और न ही उस पर अपनी इच्छा थोपी जा सकती है.

हफ़्ते भर बाद नवीन और रिया हनीमून के लिए गोवा गए, थोड़ा सुकून मिला, वरना पिछले कई दिनों से रातों की नींद और दिन का चैन छिन गया था.

जब भी रुचि खाली होती, मन में चल रहा अन्तर्द्वन्द उसको घेर लेता था. पता नहीं क्यों, उसके हृदय में बार-बार नम्रता के शब्द गूंज उठते थे. "दामाद की सास बनने में तथा बहू की सास बनने में अंतर होता है... असली सास तो तुम आज बन रही हो..."

सच उसके एक छोटे से वाक्य में ही जीवन का सारा निचोड़ समा गया था. क्या यह सच नहीं है कि बेटी-दामाद जब घर आते हैं तो वह सास के रूप में बहू के नाज़ुक कंधों पर सारे घर की ज़िम्मेदारियों का बोझ डाल कर मुक्ति पाना चाहती है, वही मां के रूप में बेटी का एक-एक काम कर ख़ुशी से फूली नहीं समाती. रुचि ने मन ही मन प्रण किया कि वह बहू को भी बेटी जैसा ही प्यार और सम्मान देगी. कभी बेवजह रोक-टोक नहीं करेगी.

वे दोनों उसके लिए ढेर सारे उपहार लेकर आए थे. उनका एक सूटकेस उपहारों से भरा था. फोटो धुलकर आये तो रिया दिखाने बैठी, "मॉम, देखो यह गोवा का मशहूर बीच है, यह गिरजाघर है. प्रत्येक दर्शनीय स्थल के अनेकों फोटोग्राफ थे किसी में वह नवीन के हाथों में हाथ डाले घूम रही थी, किसी में एक दूसरे को किस कर रहे थे, तो किसी में अपने होटल के रूम में टब में एक साथ घुसे अठखेलियां कर रहे थे. बीच पर स्विमिंग ड्रेस में रिया को सूर्यस्नान करते देखकर तो रुचि की आंखें ठगी सी रह गईं. उसका तराशा हुआ शरीर देखकर मन गर्व से भर उठा. सच जिसके पास दिखाने के लिए कुछ होगा, वही तो दिखाएगा' किसी अभिनेत्री के कहे शब्द जेहन में गूंज उठे थे. लेकिन इस समय बीसवीं सदी की सास इक्कीसवीं सदी की सास पर हावी होकर कह ही गई "यह फ़ोटोग्राफ अपने डैड को मत दिखाना, उनको इतना खुलापन पसंद नहीं है." उसकी नसीहत सुनकर रिया का चेहरा बुझ गया था. फोटो दिखाने का सारा उत्साह एक क्षण में ही समाप्त हो गया तथा बिना कुछ कहे वह अपने कमरे में चली गई.

"मॉम, दादी मां से कहना कि पूजा घर का दरवाज़ा बंद करके पूजा कर लें, मेरा मनपसंद प्रोग्राम आ रहा है, अभी मैं टी.वी. बंद नहीं करूंगी." बच्चों की तरह कहकर वह टी.वी. देखने में मगन हो गई.

रुचि के मन में अपने हनीमून के दृश्य चलचित्र की भांति घूमने लगे. कश्मीर की खूबसूरत वादियों में हाथों में हाथ डालकर घूमते हुए उन्होंने भी अपने अंतरंग क्षणों के कुछ फोटो अपने आटोमैटिक कैमरे से खींचे थे, लेकिन सुरेन्द्र ने उन्हें एलबम में लगाने नहीं दिया था. उनके अनुसार जीवन के कुछ क्षण नितांत अपने होते हैं, जिन्हें किसी के साथ भी शेयर करना अपनी गोपनीयता में अनाधिकृत प्रवेश देना है, जो उन्हें पसंद नहीं था. वह बोलते भी बहुत कम थे. उनकी ही आदत नवीन ने पाई थी और माजी के कठोर अनुशासन में रह कर वह भी अपना चुलबुलापन खो बैठी थी.

बहू के आने पर उसने सोचा था कि वह अपनी कुछ दमित इच्छाओं को पूरा कर पाएगी. वह भी मांजी की तरह एक ही जगह बैठे-बैठे किसी को तो अधिकारयुक्त शब्दों में आदेश दे पाएगी. कभी तो वह भी किसी के हाथ की बनी एक प्याला चाय आराम से पी पाएगी, किंतु पिछले कुछ दिनों के रिया के व्यवहार ने उसे जतला दिया था कि अगर घर में शांति रखनी है तो उसे ही समझौता करना होगा.

रुचि सुबह उठकर मांजी के पैर छूकर मुड़ी ही थी कि रिया ने पूछा, "मॉम, आप रोज सुबह-सुबह ग्रांड मॉम के पैर क्यों छूती हो?"

"बेटा, जिस तरह तुम लोग 'गुड मार्निंग या गुड नाइट' कहकर बड़ों का आशीर्वाद लेते हो, वैसे ही हम लोग बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं."

"नवीन, पापा जी और मैं तो रोज पैर नहीं छूते, फिर क्या उनका आशीर्वाद हमारे साथ नहीं रहेगा?" उसने मासूमियत से पूछा.

"नहीं बेटी, मेरा आशीर्वाद तो तुम सबके साथ है, यह तो हमारी परंपरा है कि घर की बहू सुबह उठकर बड़ों के पैर छूकर घर का काम प्रारंभकरती है. तुम भी अपने सास-ससुर के पैर छुओगी, तो सदा सुखी रहोगी." अम्मा जी ने कहा था.

"ग्रांड मॉम, विदेशों में पैर छूने की प्रथा नहीं है, तो क्या वहां के लोग सुखी और समृद्ध नहीं है? मॉम की तो कमर में दर्द रहता है, डॉक्टर ने उन्हें झुकने से भी मना किया है, फिर रोज आपके पैर छूकर क्या वह अपनी बीमारी को बढ़ा नहीं रही हैं? पैर छूना, आशीर्वाद यह सब बेकार की बातें हैं, जिनमें हम अपना समय नष्ट करते 意

"बेटा, यह तो अपने-अपने सोचने की बात है. हो सकता है जिसे तुम अच्छा कह रही हो, वह यहां के परिवेश के उपयुक्त न हो." बात आगे बढ़ती, इससे पहले ही रुचि ने इस व्यर्थ के टकराव को रोक दिया था. लेकिन उसे अच्छा लगा था कि रिया ने उसके कमर दर्द की ओर ध्यान दिया था, पहली बार घर में किसी ने दर्द रहने पर उसे इस तरह झुकने के लिए मना किया था.

मांजी रिया की बात सुनकर चुप रह गई थीं. शायद नई पीढ़ी को अपने तर्कों द्वारा समझाने की असमर्थता उन्हें दंश दे गई थी. लेकिन रुचि के कथन ने उनका मान रख लिया था.

अभी वह उस हादसे से उबर भी नहीं पाई थीं कि एक छु‌ट्टी के दिन मांजी को पूजा करते देखकर वह उनके सामने पालथी मार कर बैठ गई तथा बोली, "मांजी, आप घंटों इनके सामने बैठकर हाथ में माला लेकर क्या करती रहती हो?"

"अधनंगी पोशाक में घर की बहू-बेटियां अच्छी नहीं लगती, जा पहले नहा-धोकर ढंग के कपड़े पहनकर आ, तब मैं बताऊंगी." मांजी ने उसकी ड्रेस देखकर मुंह बनाते हुए उत्तर दिया.

"आपकी ये देवियां तो मुझसे भी कम कपडे पहने हुए हैं, इन्हें तो आप कुछ नहीं कहतीं." रिया ने मांजी के सामने रखी एक धार्मिक पुस्तक में शिवजी की समाधि को भंग करने का प्रयास करती अप्सराओं की ओर इंगित करते हुए कहा.

"बहस करना तो कोई तुम लोगों से सीखे. तुम क्या औरों से अलग हो, जब दूसरी लड़कियां ढंग से कपड़े पहन सकती है तो तुम क्यों नहीं?" अम्मा जी ने तीखी आवाज़ में कहा था.

अम्मा जी की तीखी आवाज़ सुनकर बहस कहीं कटुता का रूप न लेले, सोचकर रुचि ने रिया को आवाज़ देकर बुला लिया था.

"अम्मा पता नहीं क्यों तिल का ताड़ बना लेती हैं. अरे बच्चे हैं, जो चाहे पहनें... जो चाहें करें, उन्हें इस सबसे क्या मतलब है? उनका जमाना गया जब बहुएं सिर ढंक कर रहा करती थीं और फिर रिया तो विदेश में पली-बढ़ी है. आधुनिक परिवेश की है, कुछ तो असर वहां की संस्कृति का आएगा ही. यह सब तो उसे घर की बहू बनाने से पहले सोचना था. तुम भी सुन लो, यदि तुम भी स्वयं को नहीं बदल पाई, ज़माने के साथ नहीं चल सकी, तो तुम स्वयं भी दुखी रहोगी और बच्चों को भी दुखी रखोगी." रात में सोते हुए सुरेन्द्र ने सीख दी थी. शायद उन्होंने अम्मा जी की बातें सुन ली थीं.

उसे स्वयं सुरेन्द्र की बात सुनकर आश्चर्य हुआ था. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये विचार उस आदमी के हैं, जो अपनी मां के विरुद्ध एक शब्द भी सुनकर आगबबूला हो उठता था, जिसके लिए उसकी मां ही सब कुछ थी. उसके प्यार का, उसकी इच्छाओं का गला घोंटते हुए जब तब कह उठता था, "किसी भी इंसान की मां तो एक ही होती है जबकि पत्नी तो कई हो सकती हैं. मां की सेवा करना हमारा कर्तव्य ही नहीं, हमारा धर्म भी हैं."

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समय गुज़र रहा था और वह नई-पुरानी पीढ़ी में संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही थी कि एक दिन सुबह सोकर उठी तो सामने दीवार पर चिपका 'हैपी मदर्स डे' का बैनर देखकर आश्चर्यचकित रह गई. कमरा गुब्बारों से सजा था. अभी वह कुछ कहती या पूछती कि सामने से रिया और नवीन ने उसके हाथ में सुंदर गुलदस्ते के साथ गिफ्ट पैक पकड़ाया, पैकेट पर चिपकाए काग़ज़ पर रंग-बिरंगे अक्षरों में लिखा था 'यू आर द बेस्ट एण्ड लवली मदर ऑफ दिस यूनिवर्स... वी बोथ प्राउड ऑफ यू.'

आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे. पता नहीं प्रकृति का यह कैसा नियम है कि ख़ुशी हो या ग़म, यह आंसू पीछा नहीं छोड़ते. भावनाओं पर काबू पाते हुए पूछा, "तुम दोनों अम्मा जी के लिए भी कुछ लाए हो, उनका स्थान मुझसे पहले है, वह हम सबकी मां हैं."

"हां मॉम, आपको सरप्राइज़ देना था, इसलिए कुछ नहीं बताया. डैड को पता है. यह दादी अम्मा का उपहार है." नवीन ने उसके हाथ में एक गिफ्ट पैक देते हुए कहा.

"चलो, उनके कमरे में जाकर उन्हें विश कर दें." रुचि के कहने पर अंदर जाने के लिए मुड़े ही थे कि देखा सामने अम्मा जी खड़ी थीं. सबकी आवाज़ सुनकर वह बाहर आ गई थीं. शायद उन्होंने उनकी बातें सुन ली थीं. उनके हाथ में उपहार देने के पश्चात जब रुचि उनके पैर छूने के लिए झुकी तो उन्होंने उसे हाथ पकड़ कर उठाते हुए गदगद स्वर में कहा, "बस बेटी बस, मेरा आशीर्वाद तो तुम सबके साथ हमेशा ही है. तू भी अब पैर छूना छोड़कर रिया की तरह बस 'गुड मार्निंग' ही कह दिया कर, आख़िर कब तक बेमतलब की परंपराओं में उलझी रहेगी? बहू के रूप में तू मेरी बेटी ही है. जितनी सेवा तूने मेरी की है, उतनी तो मेरी कोख जाई अपनी बेटी भी न करती."

अम्मा जी के मुंह से अपने लिए बेटी संबोधन सुनकर रुचि ख़ुशी से भर उठी थी. इसी एक शब्द की तो उसे वर्षों से प्रतीक्षा थी. वह 'बेड टी' बनाने के लिए किचन में जाने के लिए मुड़ी तो रिया ने हाथ पकड़कर उसे सोफे पर बैठाते हुए कहा, 'मॉम, आज 'मदर्स डे' है, मां को समर्पित है आज का दिन. आज आप कोई काम नहीं करोगी. आप हमारी मां हैं, पूरे साल आप हमारी देखभाल करती हैं, तो क्या एक दिन हम बच्चे आपका काम नहीं कर सकते. आज हम दोनों ही सब काम करेंगे, आज मैंने और नवीन ने छुट्टी ले ली है. लंच घर में करके शाम को हम सब बाहर घूमने जाएंगे तथा डिनर बाहर ही करेंगे." कहकर रिया किचन में चली गई. काश! वक़्त यहीं ठहर जाए, कौन कहता है कि पाश्चात्य देशों में प्यार और लगाव नहीं है. उसे याद है, विवाह के पश्चात पहली बार जब सुरेन्द्र का जन्मदिन आया तो उसने बड़े मन से केक बनाया था तथा देने के लिए उपहार भी ख़रीदा था. लेकिन जब अम्मा जी को पता चला तो वह उस पर ख़ूब बिगड़ी थीं.

"कुछ करने से पहले पूछ तो लिया करो, हमारे यहां किसी का जन्मदिन नहीं मनाया जाता. वैसे भी क्या फ़ायदा जन्मदिन मनाने से. प्रत्येक जन्मदिन यही एहसास दिला जाता है कि जीवन का एक वर्ष और कम हो गया है."

"मॉम, चाय.... कितनी शक्कर लेंगी आप चाय में." रिया ने पूछा तो वह अतीत से वर्तमान में आई, देखा सुघड़ गृहिणी की तरह रिया उससे चाय में शक्कर पूछ रही है. और उसके निर्देशानुसार चाय में आधा चम्मच चीनी डालकर कप उसे पकड़ा दिया.

सुबह के नाश्ते के लिए किचन में जाते हुए रिया को देखकर रुचि सोच रही थी कि नये रिश्ते, नये परिवेश, नये रीति-रिवाजों को अपनाने में समय तो लगता ही है. धीरज रख कर तथा प्यार और सम्मान देकर ही किसी को अपना बनाया जा सकता है. कितना अच्छा हो कि संबंधों में बंधने से पूर्व ही सबको अपने-अपने रिश्तों के दायरे का पता हो, जिससे व्यक्ति दायरे के अंदर रहकर ही अपने कर्तव्यों और अधिकारों का पालन कर सके. न कोई किसी के अधिकार का अतिक्रमण करे और न ही किसी को बेमतलब के कर्तव्यों के चक्रव्यूह में फंसाकर पंगु बनाए.

- सुधा आदेश

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