गौरव के मूक प्रेम-निवेदन को मैंने भी स्वीकृति दे दी. यह एहसास मुझे तब हुआ जब मैं ज़्यादा से ज़्यादा उसका साथ पसंद करने लगी. पहले से अधिक बनने-संवरने का मन होने लगा. उसको देखते ही अपने में सिमटने लगी.
सत्रह-अठारह वर्ष के किशोरवय में पहले प्यार का (मैं इस ज़माने की नहीं उस ज़माने की बात कर रही हूं, जब प्यार शब्दों में नहीं, आंखों से बयान होता था) एहसास किसी परीलोक में विचरण करने जैसा मुझे तब हुआ, जब गौरव ने आंखों ही आंखों में मुझसे इसका इज़हार किया.
वह भी क़रीब-क़रीब मेरी उम्र का था. वह दिल्ली घूमने अपनी बहन, जो मेरी चाची लगती थीं, के साथ आया था और हमारे घर पर ही रुका था. तब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा थी.
दिल्ली के बारे में जानकारी होने के कारण मेरी चाची अपने भाई के साथ कहीं भी घूमने जातीं, तो मुझे अपने साथ ले जाती थीं. गौरव के मूक प्रेम-निवेदन को मैंने भी स्वीकृति दे दी. यह एहसास मुझे तब हुआ जब मैं ज़्यादा से ज़्यादा उसका साथ पसंद करने लगी. पहले से अधिक बनने-संवरने का मन होने लगा. उसको देखते ही अपने में सिमटने लगी.
जून की गर्मी में लू की तपिश भी ठंडी बयार महसूस होने लगी. पहले प्यार की ख़ुशबू पहली बरसात में मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू की तरह मेरे तन-मन में रच-बस गई थी. सच्चाई से अनजान मैं खुली आंखों से भविष्य के सपने बुनने लगी. मौन स्वीकृति का एहसास होते ही, वह भी बस से उतरते-चढ़ते, सड़क पर भीड़भाड़ में चलते समय मेरा हाथ पकड़ लेता था.
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चाची की अनुभवी आंखों ने सब भांप लिया. दस दिन बाद जाने के एक दिन पहले उसने छोटे से पेपर पर छपा हुआ अपना पता मौक़ा देखकर मेरे हाथ में पकड़ा दिया. उसका मूक संदेश मैं समझ गई थी. मैंने भी उसी रात एक पेपर पर दो-तीन फिल्मी गानों की लाइनों से अपने मन का भाव प्रकट करके उसके हाथ में खोंस दिया. साथ रहते हुए इतना जान गई थी कि उसको मेरी तरह गाने बहुत पसंद हैं.
लौटने के बाद दो-तीन पत्रों का आदान-प्रदान हुआ, जिसमें फिल्मी गानों की लाइनें मात्र थीं. फिर एकदम से उसका पत्र आना बंद हो गया. चाची ने भी संपर्क तोड़ लिया था. मैं समझ गई कि यह चाची की ही प्रतिक्रिया होगी. धीरे-धीरे यादें धूमिल हो गईं, बस एक धुंधला सा चेहरा और गौरव नाम ही मेरे ज़ेहन में रह गया था कि अचानक तीस वर्ष बाद फेसबुक पर उसका फ्रेंड रिक्वेस्ट देखकर मैं बुरी तरह चौंक गई.
दिल ज़ोर से धड़कने लगा. मन उसकी आवाज़ सुनने और उसके बारे में जानने के लिए बेचैन हो गया. मेरे एक्सेप्ट पर उंगली रखते ही उसने अपना मोबाइल नंबर लिख दिया. मूक प्रेम मुखर हो उठा. तीस वर्ष पहले की अवस्था की पुनरावृत्ति होने लगी.
कुछ समय पश्चात हमारा मिलने को भी मन मचलने लगा था. पूना में गौरव और मेरी दोनों के पहचान वालों के विवाह समारोह का निमंत्रण मिलते ही हमने जाने की योजना बना डाली. मेरे पति और चाची की उपस्थिति हम दोनों को बहुत असहज कर रही थी. सामना होते ही हम एक-दूसरे से नज़रें चुराने लगे थे. हमारे शरीर का बाहरी आवरण ही बदला था, दिल तो अभी भी पहले की तरह धड़क रहा था.
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थोड़ी देर अकेले में बात करने का भी मौक़ा नहीं मिला. भारी मन से लौटते समय उसने मुझे एक गुलाब का फूल देते हुए मोबाइल की तरफ़ इशारा किया कि उसके माध्यम से हम हमेशा जुड़े रहेंगे.
गुलाब के फूल की ख़ुशबू की तरह उसका हमेशा साथ रहने का एहसास मेरे तन-मन में बस गया. गुलज़ार ने सही लिखा है- सिर्फ़ एहसास है यह रूह से महसूस करो...
- सुधा कसेरा

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