"अरे तू यहां कहां आ गई." वर्मा अंकल से विदा ले पिताजी पास आते हुए बोले. "आज बहुत देर हो गई आप आए नहीं तो मैं आपको ढूंढ़ने आ गई." पिता की आंखों में हल्की सी नमी तैर गई.
जब शाम गहरा कर रात की चादर ओढ़ने की तैयारी करने लगी तब बहुत देर से पिताजी के लौटने की राह तकती बेटी को चिंता होने लगी. रोज़ तो पिताजी अंधेरा होने से पहले ही घर आ जाते हैं. आजकल उनका ब्लड प्रेशर भी अधिक रहने लगा है. कहीं चक्कर तो नहीं आ गया.
"मां मैं पिताजी को ढूंढ़कर आती हूं. बहुत देर हो गई आज तो." बेटी पैर में चप्पल पहनते हुए बोली.
"अरे किसी दोस्त से बातें करने लगे होंगे. आ जाएंगे. अब तू कहां ढूंढ़ती फिरेगी." मां रसोईघर से बोली.
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मगर तब तक बेटी बाहर निकल चुकी थी. मोड़ तक पहुंचकर देखा पुलिया पर भी नहीं थे. कुछ दूर जाकर देखा वर्मा अंकल से बातें करते खड़े थे तब उसकी जान में जान आई.
"पिताजी..." उसने आवाज़ लगाई.
"अरे तू यहां कहां आ गई." वर्मा अंकल से विदा ले पिताजी पास आते हुए बोले.
"आज बहुत देर हो गई आप आए नहीं तो मैं आपको ढूंढ़ने आ गई."
पिता की आंखों में हल्की सी नमी तैर गई.
"याद है तुझे तू बचपन में शाम को जब खेलकर देर तक वापस नहीं आती थी तो मैं रोज़ तुझे ऐसे ही ढूंढ़ने निकलता था."
"हां याद है. और मैं कहीं भी होती, किसी के भी घर होती आप मुझे ढूंढ़ ही लेते."
"समय कितनी जल्दी बीत जाता है. आज तू कितनी बड़ी हो गई कि मुझे ढूंढ़ने निकल पड़ी." पिता भावुक होते हुए बोले.
"जैसे आपके ढूंढ़ने पर मैं हमेशा ही आपको मिल जाती थी वैसे ही मैं किसी भी उम्र में जीवन के किसी मुश्किल मोड़ पर ढूंढू आपको तो आप भी जल्दी से मिल जाएंगे न मुझे पिताजी." बेटी पिता की बांह पकड़कर बोली.
"हमेशा." पिता बेटी के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोले.
बेटी आश्वस्त हो गई. घर आ गया था. दोनों घर के भीतर चले गए.

विनीता राहुरीकर
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