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क्या आपका टीनएजर बच्चा हाथ से निकला जा रहा है, अपनाएं ये उपाय (Is your teenage child getting out of hand? Try these steps)

हमारे भारतीय परिवारों में बच्चों की परवरिश करना एक बहुत बड़ा और चुनौती भरा टास्क है. माता-पिता और बच्चों के बीच जेनरेशन गैप के कारण घर का माहौल कई बार तनावपूर्ण हो जाता है. माता-पिता की शिकायत होती है कि बच्चे चिड़चिड़ेे और बदतमीज़ हो गए हैं. उलटे जवाब देते हैं, हाथ से निकले जा रहे हैं. उनके साथ डील करना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है. बच्चे पैरेंट्स की टोकाटाकी, उनके गुस्से और हर बात में सलाह से परेशान रहते हैं. कुछ समझने की स्थिति में नहीं रहते. इसका हल आख़िर पैरेंट्स को ही निकालना पड़ेगा.

आइए जानते हैं, टीनएजर्स से कैसा बर्ताव करें, किन उपायों को अपनाएं, जिससे पैरेंट्स की परेशानी दूर हो जाए.

Parenting Tips

प्राइवेसी दें

टीनएज में शरीर में हार्मोनल परिवर्तन होते हैं, जिससे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं. टीनएजर्स इन बदवालों को ठीक से समझ नहीं पाते. नतीजा तनाव, चिड़चिड़ापन और अजीब सी उलझन. वे शारीरिक रंग रूप को लेकर भी चिंतित रहते हैं. अकेले रहना चाहते हैं, इसलिए उन्हें समझने की ज़रूरत है. थोड़ी प्राइवेसी दें और इस मानसिक उथल-पुथल से निकलने में उनकी मदद करें.

बातचीत करते रहें

हमेशा अच्छा संवाद मज़बूत रिश्ते की नींव होता है. माना आजकल के पैरेंट्स बहुत व्यस्त होते हैं. परंतु बच्चों के लिए 15 मिनट का समय अवश्य निकालें. इस समय बस उनकी बातें सुनें. अपने सुझाव, पढ़ाई, किसी से तुलना या अन्य किसी बारे में अपना ज्ञान ना दें. सहजता से बात करें और उन्हें दिल खोलकर बात करने के लिए प्रेरित करें. कुछ अच्छी बातों पर उनकी प्रशंसा अवश्य करें.

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सही शब्दों का प्रयोग करें

टीनएजर्स कई बार ठीक से जवाब नहीं देते. गुस्सा करते हैं, लड़ते हैं. ऐसे समय पैरेंट्स भी हाइपर हो जाते हैं. आपा खो देते हैं और कई बार हाथ भी उठा देते हैं. इससे बच्चों के अहम को चोट लगती है. उन्हें लगता है, उन्हें दबाया जा रहा है. यह बात यदि अकेले में न होकर किसी के सामने होती है, तो वे ज्यादा क्रोधित हो जाते हैं, उन्हें शर्मींदगी महसूस होती है. यदि आप चाहते हैं कि बच्चे को उनकी ग़लती का एहसास हो, तो आपको शांत रहना होगा. उन्हें तुरंत ना डांटें, ना मारें, ना सजा दें. भले ही आपको कितना भी गुस्सा आ रहा हो. याद रखें टीनएजर्स की अपनी सपनों की दुनिया होती है. इस समय उनका मन बहुत कोमल होता है. किसी के ज़्यादा कुछ कहने या व्यवहार से उन्हें ठेस पहुंचती है. इसीलिए उनसे बात करते समय सावधानी रखें. बात करें तो शब्दों का प्रयोग सोच-समझकर और संभलकर करें. यदि किसी बात पर बहस हो गई हो, तो उस समय जाने दें. उनके सामान्य होने पर उन्हें समझाएं कि उन्होंने जो किया वह सही नहीं था. कई बार बच्चे समझ जाते हैं कि वह ग़लत थे. यह भी याद रखें कि यदि समस्या जटिल व प्रश्‍न लंबे हों और आप जल्दबाज़ी में हों, तब उनका जवाब देना या बात करना उचित नहीं है. बाद में बात करें.

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तुरंत प्रतिक्रिया न दें

कई बार टीनएजर्स किसी चीज़ की मांग करते हैं और हम उन्हें ना कह देते हैं. कुछ देर रुकने के बाद हमें एहसास होता है कि यह इतनी बड़ी या बुरी डिमांड नहीं थी. इसे हां कहा जा सकता था. परंतु तीर कमान से निकल चुका होता है. इसलिए तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचें. कुछ देर रुकें. बात को समझें, सोचें और फिर प्रतिक्रिया दें.

धैर्य रखें

याद रखें टीनएजर्स को शॉर्टकट बातें ही भाती हैं. इसलिए उनसे लंबी और उबाऊ बातें ना करें. कई बार बच्चे चीज़ें मन में रख लेते हैं, जिससे पैरेंट्स उन्हें समझ नहीं पाते. इसलिए बच्चों की भावनाओं को, विचारों को, परेशानियों को गंभीरता से सुने. हो सकता है, आपको गुस्सा आ जाए. परंतु शांत रहें. धैर्य रखें. आपको शांत, सहज देखकर वह खुलकर बोल सकेंगे और आपकी आपसी बॉन्डिंग बढ़ेगी.

थोड़ी ढील दें

टीनएजर्स माता-पिता से ज़्यादा आज़ादी चाहते हैं. उन्हें लगता है कि वह बड़े और समझदार हो गए हैं और स्वयं निर्णय ले सकते हैं. इस बात पर पैरेंट्स से उनके मतभेद हो जाते हैं. पैरेंट्स याद रखें कि यह सब हार्मोनल परिवर्तन के कारण होता है. इसके कारण आज़ादी की चाहत, स्वयं पर विश्‍वास व मूड स्विंग्स होते हैं. इस दौरान दिमाग का विकास होता है, जिससे निर्णायक क्षमता बढ़ती है और बेहतर होती है. इसलिए मिल-जुल कर निर्णय लें. बच्चे को कस कर पकड़ने की बजाय थोड़ी ढील दें.

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अनुशासन ही नहीं इमोशनल ज़रूरतें पहचानें बच्चों में बेसिक नियम जैसे सोने उठने का समय, स्क्रीन टाइम, बड़ों का आदर, बातचीत का लहज़ा पहले से ही स्पष्ट होना चाहिए. इन नियमों के टूटने पर परिणाम भी बताए जाने चाहिए. याद रहे, आजकल सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम और रील के ज़माने में बच्चों की इमोशनल जरूरतें बदल गई हैं. पुराने ज़माने में बच्चे अनुशासन में पलते थे. इमोशंस बाद में आते थे. आजकल हालात उल्टे हैं. टीनएजर्स को इमोशनली हैंडल करना पड़ता है, वरना वे माता-पिता से दूर हो जाते हैं.

कंट्रोल नहीं कनेक्शन बनाएं

आजकल के बच्चे पैंरेंट्स की बातें नहीं मानते. ज़्यादा बहस कज़के कहा जाए कि तुम्हारे लिए यही सही है, तो उन्हें लगता है उन्हें कंट्रोल किया जा रहा है. इसलिए बेहतर है कि मिल-जुल कर उनके स्तर पर, दोस्त की तरह बातें की जाएं और कहा जाए कि चलो मिलकर तय करते हैं. यदि फिर भी बात ना बने, तो बीच का रास्ता अपनाएं, पर इसे अपनी हार ना समझें, बल्कि इससे आपका और बच्चे का जुड़ाव बढ़ेगा और बच्चा भी ख़ुश होगा. यदि उपरोक्त बातों का नियमपूर्वक पालन करेंगे, तो कुछ ही दिनों में आपको खुद ही टीनएजर में बदलाव दिखने लगेंगे. आपका और बच्चे का रैपो बन जाएगा और चीज़ें आसान होकर सुलझने लगेंगी.

- डॉ. सुषमा श्रीराव

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