याद करने की शिकायत पर मैं चुटकी ले बैठती हूं, “सोचती हूं बोरिया बिस्तर बांधकर पूरे मार्च के लिए तेरे यहां आ जाऊं. देखती हूं कितने दिन में तेरी शिकायत दूर होती है और तू मुझे भगाती है.” वो मेरे मज़ाक में छिपी उदासी पढ़ लेती है और अपनी सोसायटी में हुआ जो करिश्मा दिखाती है, मेरी आंखें खुली रह जाती हैं.
‘उफ़! फिर ये पत्तियां जलने से उठने वाला धुंआ! इतनी जल्दी? ओह! मार्च चल रहा है. मार्च में तो ये धुंआ हर तीसरे-चौथे झेलना पड़ता है’ तभी बेटी के खांसने की आवाज़ सुनाई देने के साथ डॉक्टर की चेतावनी दिमाग़ में घूम गई, “आप स्टीराइड्स से परेशान हैं? ये तो शुरुआत है, सीवियर अस्थमा है आपकी बेटी को. अगर अगली बार धुंए का इतना इनटेक हुआ तो एडमिट करके ऑक्सीजन पर रखना पड़ेगा.” मेरे दिमाग़ की नसे चिंता, ग़ुस्से और बेबसी से फूल गईं.
दीवाली में एक पटाखा नहीं जलाने देते हम अपने बच्चे को. और यहां पत्तियों के जलने से होने वाले धुंएं के कारण बेचारी...
आनन-फानन में मैं बेटी को लेकर अपनी घनिष्ठ सहेली के यहां निकल जाती हूं, जिसकी बेटी मेरी बेटी की सहेली है. हंसी ठहाकों के बीच उसके कई महीने बाद याद करने की शिकायत पर मैं चुटकी ले बैठती हूं, “सोचती हूं बोरिया बिस्तर बांधकर पूरे मार्च के लिए तेरे यहां आ जाऊं. देखती हूं कितने दिन में तेरी शिकायत दूर होती है और तू मुझे भगाती है.” वो मेरे मज़ाक में छिपी उदासी पढ़ लेती है और अपनी सोसायटी में हुआ जो करिश्मा दिखाती है, मेरी आंखें खुली रह जाती हैं.
"अपने आर.डब्लू.ए. में मैं भी मुख्य मेंबर्स में से एक हूं. तो मीटिंग बुलाने में ख़ास दिक्क़त नहीं हुई. मैं मीटिंग अपने घर रखती हूं. बड़े उत्साह के साथ सहेली की सोसायटी में कम्पोस्ट बनाने का पूरा वीडियो दिखाती हूं. यू ट्यूब पर पड़े इस वीडियो पर लाखों व्यूज़ हैं, जिनमें सूखी पत्तियों के कलेक्शन से लेकर खाद बनने तक का पूरा प्रॉसेस, ख़र्चा, प्रैक्टिकल प्रॉब्लम्स और सॉल्यूशन बताए गए हैं. पर लोगों के रिएक्शन पर दंग रह जाती हूं."
“आपने मीटिंग बुलाते समय ग्रुप पर एजेंडा क्यों नहीं लिखा?” कोल्ड-ड्रिंक के आख़िरी घूंट के साथ घड़ी देखते हुए सेक्रेटरी ने ऐसे पूछा जैसे दिमाग़ ठंडा होने के बाद याद आया हो समय कितना क़ीमती है.
“अब तो विस्तार से बता दिया.” मैंने मुस्कुराते हुए कोल्ड ड्रिंक का दूसरा ग्लास आगे कर दिया.
“अपने यहां के लोग कम्पोस्टिंग मशीन लगवाएंगे? मंथली कलेक्शन के लिए लगता है भिखारी हो गए हैं.” ट्रेज़रार ने नगेट्स ख़त्म करते हुए भड़ास निकाली.
स्नैक्स और ड्रिंक्स गड़पकर प्रैक्टिकल बनने और और फ़ालतू की बातें दिमाग़ में न आए इसलिए बिज़ी रहने का उपदेश थमाकर सब चले गए और मैं सोचती ही रह गई कि कैसे होते होंगे वो लीडरशिप की प्रतिभा से सम्पन्न लोग, जिन्होंने अपनी सोसायटी में ये इम्प्लिमेंट कराया है.
पर बात मेरे दिमाग़ में घुस चुकी थी. मैंने लेडीज़ की किटी पार्टी में ये मुद्दा उठाया. आख़िर पत्तियों के जलने से होने वाले धुएं की झल्लाहट तो साझी थी."
“तू न कोई राजनीतिक पार्टी ज्वाइन कर ले.”
“नहीं एक नई पार्टी खड़ी कर. नाम रख पत्ती बचाओ पार्टी.” सीमा हंसी.
“नहीं, पत्रकार बन जा.” रीना ने हाउज़ी का पेपर गोल करके माइक प्रैटेंड किया, “नेशन वांट्स टु नो. आख़िर इन पत्तियों का क्या कसूर था, जो इन्हें आग में झोंक दिया गया.”
"उस दिन चटोरी गपशप का टॉपिक मेरे दिमाग़ी फितूर की खिल्ली उड़ाना बनने के बाद भी मैंने हिम्मत नहीं हारी. हरित जीवन संस्था की संस्थापक, जो मेरी सहेली और ऐसी क़रीब बत्तीस सोसायटीज़ में सारी व्यवस्था करवा चुकी थीं, उन्होंने बताया था कि उन्होंने शुरुआत कैसे की थी.
मेरे सिर पर जुनून सवार हो चुका था. मैंने उन्हीं का तरीक़ा अपनाया. झाड़ू उठाई और अपने घर के आसपास की सड़क पर बिखरी पत्तियां ख़ुद रोज पंच किए हुए पॉलीबैग में समेटकर छत पर रखने लगी. सड़क, कॉरीडोर और लिफ्ट में लोगों की नज़रें मुझे ऐसे घूरतीं जैसे मैं पागलखाने से सीधे भागकर आ रही हूं. कुछ लोग तो मुझे वापस भेजने को भी उत्सुक दिखते.
एक दिन शाम को कामवाली आई तो मुझे अजीब नज़रों से देख रही थी."
“अब तुझे क्या हुआ?” के उत्तर में वो बोली, "सामने चालीस नंबर वाली पूछ रही थीं तुम्हारी मैडम का दिमाग़ कुछ खिसका हुआ है क्या? सड़क पर झाड़ू लगाती दिखती हैं.”
एक पल को तो मेरी पूरी चेतना कसमसा उठी. सार्थक और सृष्टि की रक्षा का काम करने वाले लोग ही क्यों लोगों को खिसके हुए लगते हैं? पर मैंने उससे कहा, "चल अपने लिए चाय बनाकर चिप्स तल ले फिर बैठते हैं."
वो समझ गई मुझे कुछ कहना है.
उसे पूरी बात बताई तो उसकी आंखों में चमक आ गई. कारण पूछने पर उत्साह में वो मुझे बाहर ले गई.
“देखो दीदी, वहां से वहां तक की पत्तियां आपके घर के आगे जलाई जाती हैं. अगर कोई इतनी दूर की पत्तियां रोज़ बटोर कर बोरी में भरकर छत पर रख दे तो रोज़ का पचास रुपए दोगी? मेरी बेटी की पढ़ाई का ख़र्च निकल आएगा.”
यह भी पढ़ें: जीने की कला- सीखें कहने और सुनने की कला… (The art of living – learn the art of speaking and listening…)
कम से कम मेरे घर के सामने और थोड़ी दूर तक पत्तियां जलनी बंद हो गईं. साल भर बाद मेरे हाथ में ‘काला सोना' कहलाई जाने वाली पत्तियों की खाद थी. जिसमें मैं पौधे रोपने जा रही थी.
माना कि सोसायटी में कम्पोस्टिंग मशीन लग जाने जितना बड़ा कदम उठाने को राज़ी करने की प्रतिभा मुझमें नहीं थी. अफ़सोस था इस बात का पर इस बात की तसल्ली भी कि अपने स्तर पर एक छोटा कदम उठाने में मैं कामयाब रही थी.
एक बेटी की सेहत दूसरी बेटी की पढ़ाई के काम आ जाना एक प्यारा सा बोनस भी था. एक बोनस और मिला जब सबने मेरी खाद को ललचाई और ईर्ष्या भरी नज़र से देखा.
“क्या आप थोड़ी खाद मुझे देंगी?”
डेकोरेटिव प्लांट्स की शौकीन शमाया ने पूछा तो मेरे मन में उम्मीदो की नई किरणे फूट पड़ी...

भावना प्रकाश

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES
Photo Courtesy: Freepik
