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कहानी- स्टेपनी (Short Story- Stepney)

सुमन बाजपेयी

सुमन बाजपेयी

“एक समय ऐसा आता है जब बच्चे हमारा इस्तेमाल एक स्टेपनी या एक्सेसरीज़ की तरह करने लगते हैं. जब ज़रूरत पड़े इस्तेमाल कर लो. जब काम हो जाए, तो एक तरफ़ रख दो. फ़ालतू नहीं बनना है हमें. हम भी अनुभवों की थाती देकर अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी कर उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचे हैं...”

वंदना आज बहुत दिनों बाद घर से निकली थीं. मजबूरी थी, इसलिए निकलना पड़ा था, वरना कहां निकल पाती हैं वह. कितना शौक था उन्हें घूमने का, लेकिन परिस्थितियों ने जैसे उनके पंख कुतर दिए थे. आस-पड़ोस में भी नहीं जातीं. यहां तक कि कभी बालकनी में बैठ चैन से कुछ पल भी नहीं बिता पातीं. बरसों हो गए उन्हें घर की चारदीवारी में चक्करघिन्नी की तरह घूमते हुए. बच्चों को संभालने और रसोई में ही सारा समय गुज़र जाता है. रिश्तेदारों के यहां भी किसी फंक्शन में गए लंबा अर्सा हो गया है. पति तो शादी के 15 वर्ष बाद ही गुज़र गए थे. छोटी-मोटी नौकरी की भी, लेकिन बच्चे छोटे थे, इसलिए घर पर रहकर ही कभी सिलाई तो कभी अचार-पापड़ बनाकर गुज़ारा करती रहीं. पति की पेंशन आती थी इसलिए सहारा था.

पहले अपने बच्चों माधव और दीपाली को पालने में ज़िंदगी गुज़र गई, फिर उनकी शादी की भागदौड़ में. दोनों बच्चे पढ़ाई में अच्छे थे, इसलिए करियर बन गया. दीपाली टीचर है और माधव एक कंपनी में सेल्स हेड. दीपाली जब मां बनी, तो उसने अपनी बेटी की देखभाल करने के लिए पुणे बुला लिया. दो साल बाद उसके बेटा हुआ, तो फिर जाना पड़ा. उनकी बहू शिवांगी तो दीपाली के पास रहने की बात से मन ही मन ख़ुश ही होती थी. माधव ही कभी-कभी आपत्ति जताता था कि मां को उनके साथ ही रहना चाहिए. वह तो माधव को जुड़वां बेटे हो गए तब शिवांगी ने ज़िद की कि वह उनके पास आकर रहें. हालांकि शिवांगी ने वंदना को न तो कभी सास की तरह सम्मान की दिया था और न ही उनकी अहमियत को समझा था. वंदना बहुत पहले ही जान गई थीं कि चाहे बेटी हो या बेटा या बहू, सब उन्हें अपनी ज़रूरत के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहते हैं.

“आपको जो भी कुछ चाहिए, हम आपको लाकर दे देंगे. आप आराम से घर पर रहिए और आराम करिए. बेकार बाहर जाकर ख़ुद को क्यों थकाना.” कहकर माधव और शिवांगी बच्चों की ज़िम्मेदारी उन पर छोड़ ख़ुद घूमने चले जाते. आराम कहां मिल पाता था उन्हें. बच्चों को संभालने में ही दिन निकल जाता. वह थक जाती हैं, यह बात वह कहना चाहकर भी नहीं कह पातीं.

उस दिन माधव टूर पर था और शिवांगी रविवार होने के बावजूद ऑफिस का ज़रूरी काम कर रही थी. उनकी बीपी की दवाई ख़त्म हो गई थी. बच्चे सो रहे थे, इसलिए उन्हें लगा वह ख़ुद ही जाकर दवाई ले आएं. वैसे भी मन न जाने क्यों उदास सा था. उनके पति होते, तो उन्हें उदास देख फौरन कहते, “चलो तुम्हें कनॉट प्लेस ले चलता हूं. जानता हूं वहां के गलियारों में चक्कर काटते ही तुम्हारे अंदर एक जोश आ जाएगा. उत्फुल्लता तुम्हारे संग चलने लगती है, जब तुम कहीं घूमने जाती हो तो.” सच ही है. उन्हें घूमना, यूं ही बेवजह चलते रहना पसंद था. उन्होंने कहां सोचा था कि उनके ही बच्चे उनके पैरों में बेड़ियां डाल देंगे.”

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“मैं ही दवाई ले आती हूं.” कहकर वह शिवांगी का जवाब सुने बिना घर से बाहर निकल गईं. मेडीकल शॉप बहुत दूर नहीं थी. उन्होंने दवाई ख़रीदी, पर घर लौटने का मन नहीं कर रहा था. नज़रें आसपास देखने लगीं. कितना कुछ बदल गया था. थोड़ी ही दूर पर मॉल बन गया था.

उन्हें पता तक नहीं, यह सोच. उन्हें अपने ऊपर खीझ हुई. उनके कदम मॉल की ओर बढ़ गए. अंदर प्रवेश करने से पहले उन्होंने अपनी सूती साड़ी की प्लीट्स को ठीक किया. बालों पर हाथ फेरा. पार्लर जाने की बजाय ख़ुद ही बीच-बीच में कैंची से अपने बाल नीचे से काट लेती हैं. हाथों पर नज़र गई तो एहसास हुआ कितने रूखे हो गए हैं. अपना ध्यान रखना तो कब का छोड़ चुकी हैं. शाम को ख़रीद लेंगी’ उन्होंने सोचा.

मॉल की भव्यता उन्हें चकाचौंध कर रही थी. वह एक दुकान के सामने खड़े हो, मैनीक्वीन में लिपटी साड़ी को देखने लगीं. मैरून रंग की सतह पर सुनहरी बूटियां बनी हुई थीं. सिल्क की साड़ी थी. उन्होंने छूकर देखा. अनगिनत एहसास उनके भीतर तरंगित हो उठे. उनकी सारी सिल्क और क़ीमती साड़ियां दीपाली ले गई थी. अब तो सूती साड़ियां ही थीं उनके पास.

दीपाली ने कहा था, “तुम्हें कहां कहीं जाना होता है, जो इन साड़ियों की ज़रूरत पड़ेगी. भाभी हथिया लें, इससे तो अच्छा है मैं ही ले जाऊं.” उनकी सोच आंखों को नम करने ही लगी थीं कि तभी किसी ने उनके कंधे पर हाथ रखा, “वंदना! वंदना ही हो न?” वह क्षण भर को चुप खड़ी रहीं. बरसों बाद अपना नाम सुना था.

असमंजस के भाव वंदना के चेहरे पर शिकन बनकर तैरने लगे.

“मैंने आपको पहचाना नहीं.” वंदना ने झिझकते हुए कहा. हालांकि वह पहचानने की कोशिश कर रही थीं और एक नाम उनके दिमाग़ से टकरा रहा था.

“मैं अनुपमा... स्कूल में साथ पढ़े थे.” कुछ पल चुप खड़ी रहीं वंदना. जैसे बीते दिनों में डुबकी लगा रही हों.

“अनुपमा, कितनी मोटी हो गई है. पहचानती भी कैसे?” कहते हुए वंदना उससे लिपट गई. उसके बाद तो कितनी देर तक बातें होती रहीं.

कहानी- स्टेपनी

“इतने वर्षों बाद कैसे पहचान लिया? स्कूल के दिन तो बीते दिनों की बात हो गई है. सभी बदल जाते हैं इतने लंबे समय में और मुझे लगता है मैं तो पूरी की पूरी बदल गई हूं. न पहले की तरह मस्त रही हूं, न ही अपना ध्यान ठीक से रखती हूं.” फूड कोर्ट की ओर जाते हुए वंदना ने कहा. उनके स्वर में हैरानी के साथ-साथ एक ख़ुशी भी थी. बरसों बाद किसी सखी का मिलना!

“चाहे बरस बीत जाएं या सदियां, पहचानती कैसे नहीं. स्कूल में हम दोनों बेस्ट फ्रेंड थीं. तुझे याद नहीं, लेकिन तेरी शादी में भी मैं आई थी. हम दोनों की फोटो भी है मेरे पास. चेहरे पर बेशक थोड़ी लकीरें खिंच आई हैं, वरना बिल्कुल पहले जैसी है तू, एकदम दुबली-पतली. अपनी शादी की अलबम नहीं देखती? वरना मुझे पहचान जाती.” अनुपमा बोली.

वंदना अपनी याददाश्त को टटोलना लगीं. “अलबम कहां कभी खोलकर देखा, पति के गुज़र जाने के बाद तो बिल्कुल भी नहीं. कहां रखी है, वह भी ध्यान नहीं.” सचमुच बदल चुकी हैं वह!

“चल तुझे भी व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़ लेती हूं्. स्कूल के साथियों का ग्रुप है हमारा. सबको ढूंढ़कर जोड़ा है मैंने. तुझे भी कब से ढूंढ़ रही थी. समझ कि यह मेरा एक जुनून है- दोस्तों को जोड़ना, उनसे संपर्क में रहना और जब संभव हो, मुलाक़ात करना. पार्टी और मौज-मस्ती करना. इस उम्र में दोस्तों की बहुत ज़रूरत पड़ती है. इस समय तक आप सारी ज़िम्मेदारियां निभा चुके होते हैं और आपके रिश्तों के लिए आप किसी बोझ से कम नहीं होते. बच्चों का अपना परिवार होता है और अगर साथी नहीं रहता तो अकेलापन कभी गर्मियों की लू की तरह तपाता है तो कभी ठंडी हवाओं की मार कंपकंपा जाती है.”

“जोड़ेगी कैसे मुझे? मेरे पास स्मार्टफोन नहीं है.” वंदना के स्वर में हिचकिचाहट थी.

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“साधारण सा फोन है. बस कॉल सुन व कर सकती हूं.” “अरे इस ज़माने में तो यह सबसे बड़ी ज़रूरत है. मेरी बिंदास सखी ने कब से समय के साथ कदम मिलाकर चलना छोड़ दिया है?” वंदना ने कोई प्रतिवाद नहीं किया. पता नहीं माधव इस बात के लिए राज़ी होगा भी कि नहीं. दो घंटे अनुपमा के साथ बिताकर और अपने मनपसंद दही वड़े और चाट खाकर जब वे लौटीं तो बहुत ख़ुश थीं. हालांकि शिवांगी ने उन्हें देख बुरा सा मुंह बनाया. बच्चे सोकर उठ चुके थे और शिवांगी से संभाले नहीं जा रहे थे. तब तक माधव आ चुका था. आज जल्दी कैसे आ गया, वह पूछने ही वाली थीं कि उन्हें याद आया कि शाम को माधव और शिवांगी को एक पार्टी में जाना है.

“मुझे स्मार्टफोन चाहिए.” अगले दिन वंदना ने माधव से कहा तो वह चौंका.

“आपको क्या ज़रूरत पड़ गई स्मार्टफोन की इस उम्र में?” उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया. उम्र वाली बात चुभी बेशक. बच्चों को क्यों लगता है कि उम्र होने से ख़ुशियां और इच्छाओं दोनों को ही किसी पुराने संदूक में बंद करके रख देना चाहिए. वह चुपचाप उसे देखने लगीं. जिस बेटे की हर ज़रूरत, हर अवांछित मांग को पूरा करते हुए वह और उनके पति निहाल हो जाते थे, वही आज उनसे सवाल कर रहा है.

माधव सकपका गया. मां ने ऐसी चुनौतीपूर्ण नज़रों से पहले कभी नहीं देखा था.

“आप मेरा फोन रख लो. कंपनी की तरफ़ से मुझे नया फोन मिल ही गया है. मैं कल ही इसमें नया सिम डलवा दूंगा.” शिवांगी के उसे घूरकर देखने के बावजूद माधव बोला. “वाई-फाई कनेक्ट कर देना और रिचार्ज ऐसा करना कि जिसमें मोबाइल डाटा भी हो.” वंदना ने आदेश सा देते हुए कहा. हमेशा दबे स्वर में बात करने वाली सास का यह अंदाज़ शिवांगी को खला, पर वह चुप ही रही, क्योंकि माधव ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी.

उसके बाद तो व्हाट्सएप मैसेज का सिलसिला चल निकला. स्कूल के दोस्तों से जुड़ते ही उनके भीतर एक नई उमंग ने जन्म ले लिया. उन्हें लगा कि जैसे वह अल्हड़ लड़की बन गई हैं. अनुपमा से तो रोज़ ही बात होने लगी. उसकी बातों और अन्य दोस्तों का हौसला और उड़ान देख वंदना का भी पंख फैलाने का मन करने लगा. अपनी इच्छाओं को मार कर जीना सीख लिया था उन्होंने, पर अब ख़ुद के लिए जीना सीख रही थीं.

‘उम्र हो गई है तो क्या इच्छाओं को मार लेना चाहिए?’ कोई मैसेज लिखता.

‘कभी नहीं... मैं तो खुलकर जीता हूं.’

‘मैंने तो दूसरी शादी कर ली. बच्चों ने बहुत हो-हल्ला किया, पर साथी की ज़रूरत तो इस समय ज़्यादा महसूस होती है.’ रमन ने लिखा जिसकी पत्नी का देहांत हुए दो साल हो चुके थे. वंदना को याद आया रमन उनकी क्लास का सबसे पढ़ाकू छात्र था.

‘साठ साल भी कोई उम्र होती है भला! मैं तो बढ़िया कपड़े ख़रीदती हूं, ख़ूब घूमती और क्लब जाती हूं. एंजॉय करो लाइफ यार.’

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वंदना घूमने जाने लगी थीं. कभी किसी पार्टी में तो कभी लंच, डिनर करने. सूती साड़ियों की जगह फैंसी साड़ियों ने ले ली थी. पति की पेंशन अब माधव के हाथ में नहीं रखती थीं. शिवांगी चिढ़कर कहती, “माधव तुम्हारी मां को इस उम्र में बनाव-श्रृंगार सूझ रहा है. घर पर टिकती नहीं. कह रही थीं फुल टाइम मेड रख लो. कोई कोर्स करने की बात कर रही थीं. सारे दिन फोन पर लगी रहती हैं. और दो उन्हें स्मार्टफोन.”

वंदना सुनतीं और ऐसे जतातीं कि कुछ सुना ही नहीं. जीना जो सीख लिया था उन्होंने. अपने लिए कोशिश ही तो करनी होती है, फिर बहुत मुश्किल नहीं होता खुले आसमान को टकटकी लगाए देखना बिना किसी गिल्ट के. ठीक ही कहा था अनुपमा ने कि स्टेपनी नहीं बनना है.

कॉफी पीते हुए जब वह उसे बता रही थीं कि शिवांगी नाराज़ रहने लगी है तो अनुपमा ने कहा था, “एक समय ऐसा आता है जब बच्चे हमारा इस्तेमाल एक स्टेपनी या एक्सेसरीज़ की तरह करने लगते हैं. जब ज़रूरत पड़े इस्तेमाल कर लो. जब काम हो जाए तो एक तरफ़ रख दो. फालतू नहीं बनना है हमें. हम भी अनुभवों की थाती देकर अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी कर उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचे हैं. अगर वे हमारी कद्र न करें, तो हमें अपना आत्मसम्मान बचाए रखते हुए ख़ुद की कद्र करना सीखना होगा. अपने लिए जीना होगा. बस तुझे भी वही करना है वंदना. अपने लिए जीना होगा. उन्हें बुरा लगेगा तेरा बदलना, क्योंकि उन्हें इसकी आदत नहीं है. तेरे बच्चों को तुझे अपनी इच्छा के अनुसार चलाने की आदत जो हो गई है, पर कोशिश करते रहना. स्टेपनी नहीं बनना, यह याद रखना. अपनी ज़िंदगी का स्टेयरिंग अपने हाथ में रखना ज़रूरी है, वरना बच्चे तो यहां से वहां लुढ़काते रहेंगे. आज उनके बच्चे छोटे हैं, तो वे तुझे अपने पास रख रहे हैं. कल जब उनके बच्चे बड़े हो जाएंगे तब क्या होगा? ज़रूरत ख़त्म तो...” कहते-कहते वह चुप हो गई थी.

“जानती है नीरा को उसके बच्चों ने वृद्धाश्रम में भेज दिया था. हम सब दोस्तों ने उसे किराए का एक घर लेकर दिया है. अब वह बच्चों का टयूशन लेकर अपना ख़र्च चलाने लगी है. वह बिल्कुल टूट गई थी.”

बदल गई हैं वंदना या पुरानी वंदना को क़ैद से बाहर निकाल पंख दे दिए हैं. स्टेपनी कैसे बन सकती हैं वह? जीएंगी वह अपने तरी़के से अब!

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