
संगीता माथुर
“अरे नहीं पापा, ऐसा कुछ नहीं है. बस थोड़ा सतर्क रहना होगा. आजकल बहुत स्कैम होने लगे हैं. बल्कि आपको तो इतनी नॉलेज है कि आप आराम से स्मार्टफोन हैंडल कर लेते हैं. इससे मैं निश्चिंत रहता हूं. सारे बिल आप ऑनलाइन जमा करवा देते हैं. सामान मंगवा लेते हैं. मेडिकल चेकअप, कैब आदि की बुकिंग करवा लेते हैं. मेरे कलीग्स बताते हैं उनके पैरेंट्स छोटी-छोटी बातों के लिए उन पर निर्भर है. जबकि मुझे लगता है कि मैं आप पर निर्भर हूं.”
स्मार्ट वॉच के अलार्म से प्रफुल्ल की नींद खुली. यंत्रवत हाथ ने अलार्म बंद किया और मोबाइल उठा लिया. व्हाट्सएप खोलते ही सबसे पहले पापा के फॉरवर्डेड मैसेजेस पर नज़र गई. सरसरी निगाह से उसने उन्हें पढ़ा और एक गहरी सांस ली.
पापा का स्क्रीन टाइम तो बढ़ता ही जा रहा है. पर बेचारे अकेले दिनभर करें भी तो क्या? बार-बार टोककर वह उन्हें शर्मिंदगी महसूस करवाना नहीं चाहता. वह ख़ुद तो उन्हें व़क्त दे नहीं पा रहा. हर पदोन्नति और इंक्रीमेंट के साथ कार्य भार बढ़ता जा रहा है. लैपटॉप स्क्रीन पर ज़्यादा समय गुज़रने लगता है. घर से ऑफिस निकलने का व़क्त और जल्दी लौटने का व़क्त तो और देर से होता चला जाता है. पापा की घर में बहू लाने की मांग थी वह पूरी नहीं कर पा रहा है. जब उनके लिए और ख़ुद के लिए ही व़क्त नहीं निकाल पा रहा, तो एक तीसरे प्राणी को और घर में लाकर उसका गुनहगार क्यों बने.
गरम-गरम पराठों की ख़ुशबू नथुनों से टकराई, तो प्रफुल्ल को ख़्याल आया, ‘उफ़, कुक ने आकर नाश्ता भी तैयार कर दिया है और उसने अभी बिस्तर भी नहीं छोड़ा है. पापा को फिर नाश्ते के लिए इंतज़ार करना पड़ेगा.’
15 मिनट में प्रफुल्ल नहा-धोकर डाइनिंग टेबल पर उपस्थित था. उसके आते ही पापा ने अपना मोबाइल रख दिया और उसकी व अपनी प्लेट में पराठा परोस दिया. नाश्ता करते-करते ही प्रफुल्ल ने ऑफिस के लिए कैब बुक करवाई. तब तक ऑफिस कॉल आ गई. ब्लूटूथ स्पीकर लगाए ही उसने कैब पकड़ी और निकल लिया.
ऑफिस पहुंचने के बाद तो सिर ऊपर करने का व़क्त भी नहीं था. लंच टाइम में प्रफुल्ल कॉमन रूम में पहुंचा, तो कलीग्स के बीच बच्चों और किशोरों में मोबाइल की बढ़ती लत पर चर्चा छिड़ी हुई थी. पैरेंट्स को चिंता थी कि इससे बच्चों की नींद, शारीरिक और मानसिक सेहत प्रभावित हो रही थी. प्रफुल्ल क्या कहता कि बच्चों की छोड़ो, अब तो बुज़ुर्ग भी टेक एडिक्ट हो रहे हैं. उन पर तो बच्चों की तरह नियंत्रण या ज़बरदस्ती भी नहीं की जा
सकती. वह पापा से स्मार्टफोन ले भी नहीं सकता. उससे वे ऑनलाइन योगा क्लास, बुक क्लब जैसी उपयोगी संस्थाओं से जुड़े हैं. गेम्स खेलते हैं, गाने सुनते हैं, परिवार से जुड़े रहते हैं. इससे अकेले होने पर भी उन्हें डिप्रेशन नहीं होता.
पास बैठे नितिन ने कुहनी से टहोका लगाया, तो उसकी चेतना लौटी. नितिन को अमेरिका प्रोजेक्ट के लिए चुना गया था, पर उसकी पत्नी गर्भवती है और नौवां महीना चल रहा है. कभी भी गुड न्यूज़ मिल सकती है. इसलिए वह जाना नहीं चाह रहा था. यदि प्रफुल्ल हां करे, तो वह बॉस से उसके नाम की सिफ़ारिश कर सकता है.
“पर मैं पापा को अकेले छोड़कर?..” प्रफुल्ल मानता था यह उसके करियर के लिए सुनहरा अवसर है. पर पापा को लेकर वह हिचकिचा रहा था.
“वे तो वैसे भी पूरा दिन अकेले ही रहते हैं. तुम उन्हें कितना व़क्त दे पाते हो? मैं तो तुम्हें उपयुक्त पात्र मानकर यह सुअवसर दे रहा हूं. वरना ढेरों तैयार बैठे हैं.” नितिन थोड़ा नाराज़ हो गया था.
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“अंकल की चिंता मत करो. थोड़े ज़्यादा मैसेज फॉरवर्ड कर देंगे. टाइम किल करना उन्हें अच्छे से आता है... अपना भी और दूसरों का भी.” कपिल ने धीमे से पुछल्ला छोड़ा, तो प्रफुल्ल का चेहरा अपमान से लाल हो गया. ‘पापा भी हद करते हैं. अरे मुझे मैसेजेस फॉरवर्ड करें तो कोई बात नहीं. पर मेरे कलीग्स को?’
“उसे इग्नोर कर. उसे यह मौक़ा नहीं मिल रहा है, इसलिए चिढ़ा हुआ है. अंकल की चिंता मत कर. उन्हें पीछे से मैं संभाल लूंगा सप्ताह भर की तो बात है. आधी रात को भी कॉल करेंगे, तो मैं चला जाऊंगा.”
“सोचकर बताता हूं.”
रात में खाना खाते समय प्रफुल्ल से रहा नहीं गया. उसने पापा से पूछ लिया, “पापा आप मुझे मैसेज भेजते हैं ठीक है. पर मेरे कलीग्स को ऐसे फॉरवर्डेड मैसेज भेजने का क्या तुक है? व्यर्थ में मज़ाक बनाते हैं. आपको सबके नंबर दे रखे हैं, ताकि कभी कोई इमर्जेंसी हो तो...”
“अरे वे तो धार्मिक मैसेज होते हैं. 101 लोग पूरे करने होते हैं, इसलिए मैं सबको भेज देता हूं, ताकि किसी को पाप न चढ़े. बल्कि थोड़े एक्स्ट्रा भी भेज देता था, ताकि कुछ आगे ना भी भेजें, तो भी 101 का कोरम तो पूरा हो जाए.”
“क्या पापा इतने शिक्षित, प्रबुद्ध होते हुए भी आप ऐसी बातों में विश्वास करते हैं? लोगों के बहकावे में आते हैं? मैंने आपको पहले भी समझाया था.”
“हां, तो वे सब आजकल कहां भेजता हूं? तेरे कलीग्स को भी तभी भेजे थे. आजकल तो मैं सारी जानकारीपरक, उपयोगी सूचनाएं फॉरवर्ड करता हूं.”
प्रफुल्ल के दिमाग़ में पापा के फॉरवर्डेड मैसेजेस घूमने लगे, जिनमें बेहद सामान्य सलाहें होती हैं- प्रकृति से जुड़ो, दोस्तों से बातें करो, जिज्ञासु बनो. पर उनका अंदाज़ ऐसा होता है जैसे कोई विशेषज्ञ बोल रहा हो. पापा नहीं जानते असल में ये सलाहें अब लोगों को थकाने लगी हैं. ये कंटेंट कोई समाधान नहीं दे रहे, बल्कि लोगों की उलझन बढ़ा रहे हैं. एक तरह का सलाह प्रदूषण फैला रहे हैं. यह आधुनिक मानसिक समस्या है, जिसमें व्यक्ति को हर तरफ़ से अनचाही, असंगत या अत्यधिक सलाहें मिलती रहती हैं. चाहे वह सोशल मीडिया हो, रिश्तेदार हो या ऑफिस के सहकर्मी. इससे मानसिक थकावट और भ्रम बढ़ रहा है. आपकी स्थिति को जाने बिना हर कोई आपको बताने लग जाए कि आपको क्या करना है, तो दिमाग़ थकेगा ही. पापा को अलर्ट होने की ज़रूरत है. सोशल मीडिया पर
सलाहों की बाढ़ से बचने की ज़रूरत है. सलाह सुनना, पढ़ना ठीक है, पर अपनाना, फॉरवर्ड करना आपकी मर्ज़ी होनी चाहिए. स़िर्फ प्रामाणिक लोगों और स्रोतों पर ही भरोसा करना चाहिए. ये कंटेंट अब मज़ा नहीं देते, दबाव बनाते हैं. जब लोग उलझन में होते हैं, तो ऐसी सलाहें उन्हें आकर्षित करती है. पर बार-बार इन्हें पढ़ने के बाद भी समाधान नहीं मिलता. उल्टा भ्रम बढ़ता है. यूज़र्स समझने लग गए हैं कि जीवन की जटिलताओं का हल रील्स या टिप्स में नहीं है. पर पापा इनके आदी हो गए हैं. कई बार फर्ज़ी चीज़ें भी फॉरवर्ड कर देते हैं. कहीं किसी स्कैम का शिकार ना हो जाएं?
बेटे को चिंतित मुद्रा में सोच में डूबा देख पापा अपराधबोध से भर उठे.
“अब से नहीं करूंगा फॉरवर्ड. तुझे भी नहीं.”
“अरे नहीं पापा, ऐसा कुछ नहीं है. बस थोड़ा सतर्क रहना होगा. आजकल बहुत स्कैम होने लगे हैं. बल्कि आपको तो इतनी नॉलेज है कि आप आराम से स्मार्टफोन हैंडल कर लेते हैं. इससे मैं निश्चिंत रहता हूं. सारे बिल आप ऑनलाइन जमा करवा देते हैं. सामान मंगवा लेते हैं. मेडिकल चेकअप, कैब आदि की बुकिंग करवा लेते हैं. मेरे कलीग्स बताते हैं उनके पैरेंट्स छोटी-छोटी बातों के लिए उन पर निर्भर हैं, जबकि मुझे लगता है कि मैं आप पर निर्भर हूं.” अपनी तारीफ़ सुनकर और बेटे की अपने प्रति चिंता जानकर पापा का चेहरा खिल उठा. पत्नी दया के जाने के बाद की गई अपनी सिंगल पैरेंटिंग पर उन्हें गर्व हो उठा था.
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प्रफुल्ल ने जब अमेरिका टूर को लेकर अपनी हिचकिचाहट दर्शाई, तो वे तुरंत उसे मनाने में जुट गए.
“मेरी चिंता मत कर! मेरा व़क्त आराम से बीतता है. समाचार पत्र, टीवी, गार्डनिंग, दोस्ता-रिश्तेदारों से फोन और सोशल मीडिया पर बातें, नौकरों से काम करवाने आदि में मुझे व़क्त का पता ही नहीं चलता. तूने चेता दिया है, तो थोड़ा और सतर्क रहूंगा. तू बेफ़िक्र होकर जा.”
प्रफुल्ल को अमेरिका आए चार दिन हो गए थे. एक दिन तो जेट लेग में ही गुज़र गया. फिर प्रोजेक्ट का काम संभाला, तो आदतन खाना-पीना भूल उसी में लग गया. फ्री होने पर पापा से बात करने की सुध आती, तो ध्यान आता वहां तो कब की रात हो गई होगी. पापा तो इस व़क्त गहरी नींद में होंगे.
मोबाइल संभालता, तो पता लगता गुड नाइट का मैसेज डाले ही दो घंटे हो गए हैं. पापा के फूल पत्ती, भगवान की तस्वीर, चाय के कप वाले जिन गुड मॉर्निंग, गुड नाइट मैसेजेस से पहले उसे चिढ़ होती थी, अभी वे ही जीने का सहारा बन गए थे. उसे महसूस हो रहा था कि वाकई पिता वह ख़ामोश स्याही हैं, जो संतान की ख़ुशियों की लकीर खींचने में ख़ुद को ख़र्च कर देती है.
हूं... मैसेज फॉरवर्ड कर रहे हैं, ऑनलाइन आ-जा रहे हैं मतलब ज़िंदा है, कुशल हैं... फ़िलहाल इतना जानना ही पर्याप्त है उसके लिए. पापा ने सचमुच कितना कुछ किया है उसके लिए. और अभी भी कर रहे हैं. और एक वह है ना वहां उनका ध्यान रख पाता है और ना यहां आने के बाद एक बार भी उनसे बात कर सका है. अब तो दो तारीख यानी जाने का दिन आ रहा है. आज अलार्म लगाकर सोता हूं. इंडियन टाइम के अनुसार उठूंगा और वीडियो कॉल कर पापा को प्लेज़ेंट सरप्राइज़ दूंगा.
अलार्म ने प्रफुल्ल को समय पर उठा दिया था. नींद से भरी आंखें लेकर पापा को गुड
मॉर्निंग कहना ठीक नहीं होगा. सोचकर वह फ्रेश हो लिया. आज पापा ऑनलाइन ही नहीं हो रहे. ख़ूब गहरी नींद सो रहे दिखते हैं. प्रफुल्ल को उबासियां आने लगीं. फिर नींद घेरने लगी तो उसने कॉफी बना ली.
लो, कॉफी भी ख़त्म हो गई. पापा अभी तक सो रहे हैं! प्रफुल्ल का दिल किसी अनहोनी की आशंका से तेज़ी से धड़कने लगा. पापा ने नेट बंद कर रखा है. लास्ट सीन बंद कर रखा है. क्यों? ऐसा तो वे कभी नहीं करते या शायद करते हों. उसने आज ही ध्यान दिया है. अपनी बेपरवाही पर प्रफुल्ल मन ही मन ख़ुद को ही लताड़ने लगा. तभी ऑनलाइन का साइन उभरा. प्रफुल्ल की डूबती सांसें लौट आईं. उसने तुरंत वीडियो कॉल लगा दिया. लंबी रिंग जाने के बाद उधर से पापा का चेहरा दिखाई दिया, तो प्रफुल्ल का चेहरा खिल उठा.
“कहां थे आप इतनी देर? फोन उठाने में इतना व़क्त कौन लगाता है? नेट क्यों बंद कर रखा था? आपकी तबीयत तो ठीक है?” प्रफुल्ल ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी. आप इतने थके, उदास, सहमे से क्यों लग रहे हैं? सब ठीक तो है वहां?” प्रफुल्ल व्यग्र था.
उसका धैर्य चुकने लगा था. पापा कुछ बोलने की बजाय उसे एकटक देखे जा रहे थे मानो पहचानने का प्रयास कर रहे हों.
“मैं ठीक हूं. गहरी नींद से उठा हूं ना इसलिए...तू ठीक है? कब आ रहा है? वहां खाना तो पसंद का मिल रहा है ना?” प्रफुल्ल अंदर तक भीग गया. कितने दिनों बाद पापा को देख-सुन पा रहा है!
“हां पापा! परसों यानी 2 तारीख़ को रात में पहुंच जाऊंगा.” खाना ठीक-ठाक है. अब तो घर पहुंच कर ही आराम से खाऊंगा.”
“क्या बनवा कर रखूं? तेरी पसंदीदा कटहल की सब्ज़ी बनवा दूं?”
“हैं!!” प्रफुल्ल हैरानी से पापा को देखने लगा. नहीं, पापा बिल्कुल भी मज़ाक नहीं कर रहे. पूरी तरह सीरियस हैं, बल्कि अभी भी चिंतित और व्यग्र ही लग रहे हैं. कुछ तो गड़बड़ है.
“मैं कटहल कहां खाता हूं पापा?”
“तो फिर बता क्या बनवाऊं?”
“कुछ भी.”
“नहीं, तू बता.”
“अच्छा, मटर पनीर और फ्रूट रायता बनवा देना.”
पापा के चेहरे पर अचानक मुस्कान खिल उठी थी.
“इंडियन स्वीट्स मिस नहीं कर रहा?”
“घेवर और दाल का हलवा मंगवा लेना, पर नाथू हलवाई से. अरोड़ा स्वीट से ऑर्डर मत करना. अपने लिए शुगर फ्री कलाकंद मंगवाना मत भूलना... अरे आप रो क्यों रहे हैं?”
“ख़ुशी के आंसू हैं. तू वापस आ रहा है न इसलिए.” पापा फटाफट आंसू पोंछने लगे थे.
“पापा, आप कुछ छुपा रहे हैं. आपको मेरी क़सम! सच-सच बताइए क्या हुआ?”
कुछ रिश्तों की ख़ुशबू ख़ुद में ही चंदन जैसी होती है. ज़रा सा अपनापन घिसने पर ही रिश्ते दिल से महक जाते हैं. पापा भावुक हो गए थे.
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“कल एक अनजान नंबर से कॉल आया था, हूबहू तेरी आवाज़ में. तू बहुत घबराया हुआ था. कह रहा था मैं यहां फंस गया हूं. इन्होंने मुझे जेल में डाल दिया है. मैं आपको इनका अकाउंट नंबर भेज रहा हूं. उसमें तुरंत पांच लाख डाल दीजिए.”
“हैं? फिर? आपने डाल दिए? मैंने तो कोई कॉल नहीं किया था.”
“तुरंत ही एक अकाउंट नंबर भी आ गया था. मैं पैसे ट्रांसफर करने वाला था कि तेरी स्कैम वाली चेतावनी याद आ गई. मैं सोचने लग गया क्या करूं? तभी फिर कॉल आ गया. “पापा, जल्दी करो ये लोग मुझे मार डालेंगे.”
मैंने कहा, “नहीं बेटा मैं डाल रहा हूं पैसे. जल्दी से पैसे देकर इनसे पीछा छुड़ा और घर लौट आ. तुझे भूखा तो नहीं रख रहे? कब से कुछ नहीं खाया तूने? मैंने तो आज सुबह ही
तुझे याद किया था. तेरी पसंदीदा कटहल की सब्ज़ी बनी थी.”
“लौटकर खाऊंगा पापा. अभी आप पैसे डालिए.”
“हां वही कर रहा हूं. ले, डाल दिए! पहुंचने में थोड़ा वक़्त तो लगेगा. तो तू चार तारीख़ को सुबह ही आ रहा है ना?”
“हां.”
“या बनवाकर रखूं तेरे लिए?”
“पैसे आ क्यों नहीं रहे?”
“आ जाएंगे. हां बता, क्या बनवाकर रखूं चार तारीख़ को तेरे लिए?”
“अरे वही कटहल ही बनवा देना. कितनी देर और लगेगी?”
मैंने फोन काट दिया था. नेट भी बंद कर दिया था. एकबारगी तो सोचा तुझे कॉल करूं. पर एक तो वहां आधी रात थी. दूसरे मुझे लगा मेरी तरह तू भी घबरा जाएगा. थोड़ा रुक जाता हूं. पूरा दिन, पूरी रात आंखों में काटे. अभी डरत-डरते ऑनलाइन हुआ तो तेरा वीडियो कॉल आ गया. मैं घबरा गया, उठाऊं या नहीं? मुझे लगा अभी तक तो वे एआई से तेरी आवाज़ ही निकाल रहे थे. अब तेरा नंबर भी ले आए हैं. शक्ल भी बना ली होगी. इसलिए हिम्मत जुटाकर क्रॉस चेक कर रहा था...
प्रफुल्ल भौंचक्का था. जब जज्बातों पर काबू पाया तो उसके मुंह से बस इतना ही निकल सका, “ग्रेट पापा!”

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