वासंती हवा में लहराता उसका पीले फूलों वाला दुपट्टा जब मेरे कंधे से लिपट गया तो वह सकुचा गई. उसके नत नयनों में कितने अनकहे भाव तैर गए थे.
उस बार सेन फ्रांसिस्को से छुट्टियों में भारत आया, तो बड़े मामा के बहुत आग्रह करने पर गांव चला आया. शहर की सीमा से बाहर निकलते ही प्रकृति अपनी स्वाभाविक सुंदरता में निखरने लगी थी. हरे-भरे पेड़ों से भरे वन क्षेत्र. कहीं खपरैल और फूस की छतों के कच्चे घरों के आसपास दूर-दूर तक फैले खेत. सड़क के दोनों किनारों पर अमलतास के पीले फूलों के बीच-बीच में दहकता पलाश खिल रहा था.
दूसरे दिन सुबह-सुबह मामाजी के साथ खेत देखने निकल पड़ा. खेतों में गेहूं की फसल लहरा रही थी. बीच-बीच में सरसों के पीले फूल कौतूहल से झांक रहे थे. बेरों की झाड़ियां फलों के भार से झुक रही थीं. संतरे के बागों की सुगंध हवा में गमक रही थी. एक ओर के खेत में सूरजमुखी पूरब दिशा की ओर तक रहे थे मुंह उठाए. मैंने मामाजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि ये खेत उनका नहीं है, गांव के मुखिया जी का है.
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मामाजी खेत पर काम कर रहे एक आदमी के साथ एक तरफ़ निकल गए और मैं टहलते हुए मुखिया जी के खेत के सूरजमुखी देखने लगा. कुछ दूर जाने पर जींस-टॉप पहने बालों को क्लचर में बांधे एक लड़की सूरजमुखी के पेड़ों के बीच दिखाई पड़ी मानो पीले सूरजमुखियों के बीच एक गुलाबी गुलाब खिला हुआ था. वह मिट्टी को भी इतने प्यार से छू रही थी जैसे कोई मां अपने बच्चे को दुलारती है. वसंती हवा के झोंकों से उसके गालों पर बालों की लटें अठखेलियां कर रही थीं.
उस साल जैसे समूचा वसंत खेत की मुंडेर पर उतर आया था. फूलों को प्यार से छूती सहलाती वह उनका ही एक हिस्सा लग रही थी. मुंडेर पर उगे जंगली पौधों को भी वह उतने ही प्यार से देख सहला रही थी. चारों तरफ़ हराभरा, रंगबिरंगी जीवन खिल रहा था और जीवन से भरपूर वह लड़की मानो वसंत का उत्सव लग रही थी. सेन फ्रांसिस्को में कभी वसंत को इतने नज़दीक से न देखा, न महसूसा था कभी. खेत की मुंडेर से वसंत मेरे दिल में उतर गया था. फूलों के कुछ बीज इकट्ठा करके वह खेत में बने एक आधुनिक तरह के ग्रीनहाउस में चली गई. गांव में ऐसा ग्रीनहाउस देख कर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ.
मामाजी ने बताया कि वह अमेरिका से खेती की आधुनिक तकनीक सीख कर आई है. गांव के किसानों को भी सिखाती है और मिट्टी और बीजों की पैदावार बढ़ाने के लिए कुछ न कुछ प्रयोग करती रहती है. सुनकर उस वासंती मूरत के प्रति मन आदर से भी भर उठा.
मैं हफ़्ते भर तक उस साल गांव में ही रह गया था. देखता रहता था उसे अपनी मिट्टी से प्यार करते, किसानों को सिखाते, फसलों को सहलाते, गांव की प्रगति के लिए मेहनत करते. देश और किसानों की प्रगति के प्रति उसकी भावनाओं से मैं बहुत प्रभावित था.
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खेतों की मुंडेर पर कभी क्यारियों में घूमते हुए हम खेत, खलिहान, वसंत की बातें करते. वह स्वयं भी तो इस ऋतु की तरह ही थी उमंग और ताज़गी से भरी. वासंती हवा में लहराता उसका पीले फूलों वाला दुपट्टा जब मेरे कंधे से लिपट गया तो वह सकुचा गई. उसके नत नयनों में कितने अनकहे भाव तैर गए थे. क्षण भर को ऐसा लगा जैसे वसंत हमारा गठबंधन कर रहा हो या कोई संकेत दे रहा हो भविष्य का.
फिर मैं शहर चला आया और फिर सेन फ्रांसिस्को वापस लौट आया, लेकिन चार साल पहले का वह वसंत आज भी खेत की उस मुंडेर पर ही ठिठका हुआ है, सूरजमुखी के बीच खिले गुलाब सी रंगत वाली उस वासंतिक मूरत में.
- विनीता राहुरीकर

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