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कहानी- छाया (Short Story- Chhaya)

छाया पर नज़र गड़ाए मैं मुंडेर पर आ बैठा. मेरे आंगन में खड़े जायफल के पेड़ पर उंगली रख देता और उंगली रखे-रखे उस नारी काया को देखता, फिर नज़रें झुका लेता. जैसे उसकी छाया से नज़रें मिल गई हों और मैं शरमा गया होऊं.

रोज़ाना की भांति उसकी छाया का दीदार करने छत की मुंडेर पर आ बैठा. मेरे बैठने के नियत स्थान से उसकी छत की दूरी लगभग सात-आठ गज होगी. मेरे मकान और उसके मकान में एक गली का अंतराल पड़ गया, अन्यथा दीवालों से सट कर प्रेमालाप होता.

वह रोज़ सुबह धूप फैलते ही अपनी छत पर दीवारा की ओट में नहाती है और मैं उसकी छाया को देखकर अनुमान किया करता हूँ उसके मन की सतह पर उभरने वाले अरमानों का, अवसादों का, सपनों का, विचारों का... उसकी छाया में से कुछ व्यथा झलकती है. वह नारी छाया उम्र के हिसाब से उतनी चंचल नहीं है, जितनी होनी

चाहिए शांत मलिन असलाई हुई. यों तो मैंने आज तक उसका चेहरा नहीं देखा, फिर भी उसके नाक नक्श का जो अंदाज़ा मुझे है, वह इसी छाया में से हुआ.

मुझे इतना भर मालूम है कि वह उस घर की बड़ी बहू है. उसके पति गांव की एक सरकारी डिस्पेंसरी में डॉक्टर हैं. उसे वे सुषमा कहकर पुकारते हैं. उसका नाम मैंने इसी मुंडेर पर बैठे-बैठे एक दिन सुना था. पड़ोस में चर्चा के दौरान यह भी विदित हुआ कि वह इतिहास में गोल्ड मेडिलिस्ट है. उपन्यास पढ़ने का उसे बहुत चस्का है. घर गृहस्थी के काम धाम को लेकर उसके पति के डांटने-डपटने का स्वर भी सैकड़ों दफा सुनने को मिला. मेरे कान आज तक उसके स्वर से अनभिज्ञ हैं. बहुत प्रयत्न करने के बाद उसकी आवाज़ नहीं सुन पाया. इस खेद ने उसके प्रति मेरे मन में और आकर्षण सिरजा है. उसे मैं मूकमना मानता हूं. वह अपनी रौ में रमी रहना चाहती है, तो वह घर उसे रमे क्यों नहीं रहने देता? क्योंकर उसे बेवजह तंग करता है? फिर सोचता मैं कौन? उस घर के बारे में सोचने का मुझे क्या अधिकार है? वह उस घर की बहू है और मैं पड़ोसी, इस नाते भी तो कुछ नाता बनता है.

कैसा नाता..? जैसे अप्रकट में उसी ने पूछा हो. मैं हड़बड़ा सा गया उठकर पीछे हाथ बांध के अपनी छत पर इधर-उधर चक्कर काटने लगा. मन अशांत हो उठा. कैसा नाता..? इस प्रश्न में से तर्क के सहारे ढेरों उत्तर उग आते हैं, नाते उग आते हैं और मैं सोच में डूब जाता हूं. इस डूब में उसकी दिनचर्या टटोलता हूं.

अजीब-अजीब अनुमानों का स्पर्श होता है. उद्वेलित हदय पर उसकी विस्मृत छाया छा जाती. मैं फिर चेत जाता हूं फिर डूब जाता हूं. मैं अपनी दिनचर्या में उसकी दिनचर्या सोचता. कैसे ढोती होगी वह अपने बोझिल दिन-रात? और सोचते-सोचते हंस पड़ता हूं. उस महिला ने अपने प्रति इतनी विकट जिज्ञासा मुझ में कब से भर दी है.

मैं अपने को हमेशा दीवार की ओट में खड़ी उस स्त्री की छाया से जड़ा पाता हूं और कुछ प्रत्यक्ष में हो पाया हो, ऐसा याद नहीं पड़ता, सिर्फ़ उसकी छाया का अस्तित्व मेरी आंखो में हैं.

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पड़ोस में वह किसी के घर नहीं जाती और ना ही वह किसी से बोलने बतियाने में रूचि रखती है. उनके घर कोई महिला बैठने-उठने जाती, तो उसका वह विरोध करती. पड़ोसिनें उसे घमंडिन, मूर्ख बधिरा आदि-आदि संबोधनों से अपनी टोली में कोसा करतीं. उसकी शादी को पांच वर्ष हो गए अभी तक बच्चा नहीं जना उसने, ऐसी अभागिन औरत को किस तरह रखे हैं. ऐसी बेहूदी बातें महिलाओं के श्रीमुख से मुझे आते जाते सुनने को मिला करतीं.

इस तरह यहां बैठे-बैठे में आदमी औरत के अंतरालों पर सोचा करता हूं, आंखें उसकी छत पर चली जातीं लौट आतीं, अब तक आना नहीं हुआ आज! घड़ी देखी आठ बज चुके हैं फिर कुछ अशांत होकर टहलने लगा.

वह आ गई... हां, आ तो गई. पीठ पीछे हाथ किए ब्लाउज़ के बटन खोल रही है. केश उसके कपोलों पर बिखरे हैं. धूप में उसकी काया का साया पड़ रहा है.

छाया पर नज़र गड़ाए मैं मुंडेर पर आ बैठा. मेरे आंगन में खड़े जायफल के पेड़ पर उंगली रख देता और उंगली रखे-रखे उस नारी काया को देखता, फिर नज़रें झुका लेता. जैसे उसकी छाया से नज़रें मिल गई हों और मैं शरमा गया होऊं.

छाया में उसका चेहरा फैल गया है. उसके बालों की लटें हवा में लहरातीं, तो दूर तक एक लकीर सी खिंच जातीं. मेरा मन इस लकीर पर लिखने लगता- अपनी अनुभूतियां और मैं इन अनुभू-तियों के आस्वादन में अंर्तमुखी हो जाता.

तोतों का कलरव मुझे चेत कराता. तब तक वह नहा चुकी होती. कमर से झुकी वह दोनों हाथों से गीले बाल झटकार रही है. उसका वक्षस्थल, जिसकी छाया पर मेरी आंखे केंद्रित हो जातीं धूप में पड़ती छाया में से उरोजों का हिलना-डुलना मुझे तब तक बांधे रहा, जब तक उसने ब्लाउज़ नहीं पहन लिया. बाल पीठ पीछे कमर तक लटके हैं.

नितंबों का उभार धूप में इतनी आकर्षित छाया में उभरा है कि मुझे 'सम्भोग' शब्द की अनुभूति हो आई थी. सचमुच औरत आदमी की वासना की प्रतिच्छाया होती है. उससे नज़रें मिलते ही प्रकृति का यह अद्भुत सत्य... हृदय में गुदगुदी पैदा कर देता है. मन के भीतर रिश्ते दरकते हैं, तो दरक जाने देते हैं लोग. सुंदर औरत आदमी को मोहित ही नहीं वशीभूत भी कर लेती है, लेकिन मैं! और यह छाया! इसे क्या कहूं...?

साड़ी पहनकर और बालों का जुड़ा बनाक्षके वह जाने को उद्वत हुई, तो ऐसा भाव उठा कि वह देर तक शून्य आकाश को देखती खड़ी रहे और मैं उसकी शांत छाया में से रहस्य उकेलता रहूं. पर ऐसा नहीं हो सका. वह चली गई थी और उसके साथ उसकी छाया भी. उस छत की धूप मुझे दिलकश मालूम पड़ती और कुछ देर पहले जब वहां उसकी छाया लेटी थी उसकी सुखद कल्पना और भी अधिक दिलकश लग रही थी. औरत की छाया भी मन को लुभाती है यह सोचकर मुझे हंसी आ गई. मैं मुडेर से उठा और टहलने लगा.

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धूप तो मेरी छत पर भी है. पर उस छत की धूप में ऐसा क्या है कि मन वहीं जा गिरता है?

अचानक मुझे ऐसा लगा, जैसे उसने मेरी पीठ पर हल्का धौल मारा हो, मैं चौंका. अगले ही पल मेरा मन बदलने लगा. सीढ़ियां उतरकर नीचे आया. अपने को इस संकल्प में बांध कर कि अब से कभी उस औरत को नही देखूंगा वह संयम ढीला करती है.

अपने लेखन कक्ष में आकर अस्त-व्यस्त कागज़ों की तह करने लगा. पत्नी आकर बोली, "सारिका' में तुम्हारी वो वाली कहानी छप गई, अब लगता है कुछ विवाद होगा. तुमने नाम घटना सब यथावत दे दी, क्या सोचतें होंगे जज साहब!" पत्नी से बतियाने को राज़ी न था. सो अनमनस्क भाव से विषय बदल दिया, "तुम कॉफी पिला सकती हो?"

"क्यों नहीं! अभी या कुछ ठहरकर?"

"अभी ही."

पत्नी मेरे आदेश पर तुरंत चली गई. मैं सोचने लगा, उसके बच्चा नहीं होता. शादी को पांच वर्ष हो गए, घरवालों को वह मनहूस लगती होगी. पति के चित्त से भी शायद उतर गई हो.

क्या पता. हो सकता है मातृत्व की उदासीनता ने उसके मन को जीवन के प्रति निरर्थक कर दिया हो. उसके भीतर वह आग्रह ही शेष न हो, जो पति के लिए एक पत्नी में होता है. तब संसार के रागों में भला वह कैसे रमती होगी? दूर-दूर घर गृहस्थी से उचाट बने रहने में ही उसे कुछ तस्कीन मिलती हो. जो भी हो, उसे अपने में धैर्य बढ़ाना चाहिए. शादी को पांच वर्ष ही तो हुए हैं. मैंने दस-बीस वर्षों की तपस्या के'बाद लोगों को शिशु लाभ भोगते देखा है.

लेकिन... पति को सब्र न हो तो ऐसे में उस नारी के मन में और अविश्वास घर कर जाता है. मगर... यह तो कोई सोच नहीं हुआ मेरा. मैं अनुमान की दुनिया में उलझता क्यों हूं. मैं आदमी हूं तो क्या इसी नाते उस अबला में मातृत्व हीनता का अनुमान लगाया?

सहसा पत्नी कॉफी का प्याला लिए उपस्थित हुई. मैंने प्याला थामा और एक सिप लेते हुए पूछा "रानी तुम्हारा तो सुषमा से बोलना-चालना होता होगा?"

पत्नी दाहिने हाथ से प्लेट पकड़ते हुए बोली, "होती तो है, मगर उतनी नहीं, जिंतनी तुम्हें ज़रुरत है."

उसने इस 'ज़रुरत' शब्द को कुछ ऐसी ध्वनि में उच्चारित किया कि मेरे अंतस में दबी जिज्ञासा कांप उठी. स्वर में ज़रा दबाव देकर कहा, "ज़रुरत! क्या सोचकर कह दिया तुमने."

"यही सोचकर कि तुमने उस अभागिन को कहानी के प्लाट में रखकर देखा है. कहानी की दुनिया से हटकर दीन-दुनिया को देखा करो. लेखक हो, तो क्या इसीलिए कि हर किसी का रंज लिखो."

पत्नी बहस के मूड में थी. सो मैंने बहस की.

आख़िरकार वह हारकर मुझसे परिहास करने लगी. उसके विलास को अपनी जिज्ञासा का उपयुक्त अवसर मान मैंने सुषमा के बारे में जानकारियां बटोरी.

विदित हुआ वह बच्चा पैदा करने में असमर्थ है. एक तरह से उसमें बच्चेदानी नहीं है. पति उसे छोड़ना तो नहीं चाहते, पर विकल्प की तलाश है उन्हें. उनकी दृष्टि में विकल्प दूसरी शादी है, मगर उसकी उदासीनता तो इससे कम न होगी, बल्कि बढ़ जाएगी, अपने भीतर की कमी से और अधिक झुलसेगी वह. पत्नी ने बताया था वह इस पर राज़ी है और क्या विकल्प हो सकता है तुम्हीं कुछ सोचो. मुझे महसूस होने लगा कि उसे समझौता ही करना पड़ेगा. विधाता ने ही जब उसके जीवन में यह दर्द भर दिया है, तो क्या हम तुम और क्या दुनिया उसे ख़ुशी दे पाएगी?

उसे जितना अधिक जाना-समझा, मन उतना अधिक व्यथित होता गया. अब सुबह मुंडेर पर बैठकर उसकी छाया देखने को जी नहीं होता. उसके प्रति दया करुणा भर आई और अब अनुराग का स्वरूप बदल गया है. आज समझा मैं क्यों उसका दिल तन्हाई पसंद करता है? क्यों वह सबसे कटी-कटी और अपने में खोई रहती है?

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विधाता का यह क्रूर उपहास उसकी आंखों में पानी भर देता होगा. यह पहाड़ सी ज़िंदगी पता नहीं कैसे काटेगी. मैं अकेला होते ही उसका अकेलापन सोचने लगता हूं कि कहीं वह किसी दिन अंधेरी गलियों की ओर कूच न कर‌ दे. कोई रोके तो रुक सकती है. मैं रोकूंगा उसे, मैं विकल्प खोजूंगा.

क्या यह विज्ञान उस दुखिया को विकल्प नहीं दे पाएगा? और अगर दे सकता है तो कैसे?

इसी माथापच्ची में एक दिन मैंने पत्नी से कहा- "रानी, तुम अपनी बच्चादानी उसे दे सकोगी? तुम्हारे इतने से त्याग से उस अबला की ज़िंदगी में ख़ुशी आ सकंती है. उसके बुझे मातृत्व में चिराग़ जल उठेगा. मैं समझता हूं सिर्फ़ तुम ही एकमात्र विकल्प हो उसके दुख का."

पत्नी मुझसे यह सुनने की आशा नहीं रखती थी. वह अवाक सी मुझे देखती रह गई. उसकी आंखें छलछला आईं. बोली, "ऐसा हो सकता है क्या?"

"मैं प्रयत्न करूंगा, करने से क्या नहीं हो सकता."

'देखो जी में मां हूं और मां बनने की अकुलाहट स्त्री में कितनी 'तीव्र होती है, जानती हूं. यह पुण्य कार्य अगर मेरे द्वारा होता हो तो मैं अपना सौभाग्य मानूंगी, मगर संशय यह होता है कि उसके पति इस विकल्प को स्वीकार करेंगे भी. मेरे राज़ी होने से क्या?"

"मैंने कहा न, वह ज़िम्मेदारी मेरी है. भावनाएं कितनी जल्दी मुड़ती हैं यह तुम नहीं जानतीं."

हम दोनों देर तक बुत बने एक दूसरे में डूबे रहे. मन में यह संकल्प लेकर कि मैं उसके पति को परखनली शिशु का बाप बनाउंगा. रानी को दुलार कर अपनी बांहों में समेट लिया. उसके होंठों पर अपने होंठों का हस्ताक्षर कर दिया. आलिंगन से अलग हुआ तो मैं अपने हृदय में शांति महसूस कर रहा था. वह नीची निगाहें किए हंस रही थी. कुछ पल बाद पत्नी ने आंचल से गीली आंखें पोंछी और "मैं कॉफी बनाती हूं..." कहकर चली गई. मैं दालान तक तर आंखो से उसे जाते हुए देखता रहा.

- जगदीश रसिक

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