फिर मुस्कुराकर बोलीं, "याद रखिए... जिस पत्थर को छेनी-हथौड़ी की चोट सहने का साहस नहीं होता, वह कभी मंदिर की प्रतिमा नहीं बनता." मंजुला ने गहरी सांस ली. "आज से मैं भी 'कैट मदर' नहीं, 'मंकी मदर' बनने का प्रयास करूंगी." दोनों हंस पड़ीं.
रोहित का देश के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में चयन हो गया था. घर में मानो दीपावली उतर आई थी. रिश्तेदारों के फोन, मिठाइयों के डिब्बे और बधाइयों का तांता लगा हुआ था. सब कहते, "बेटा बहुत होनहार है।"
वह सच भी था. रोहित पढ़ाई में असाधारण था. लेकिन उसकी एक और पहचान थी- वह अपने जीवन के लगभग हर छोटे-बड़े काम के लिए अपनी मां पर निर्भर था.
स्कूल बैग से लेकर टिफिन तक, यूनिफॉर्म से लेकर रुमाल तक... हर चीज़ उसकी मां मंजुला के हाथों से होकर गुज़रती थी. सुबह उसे जगाना, कपड़े निकालना, टिफिन रखना, शाम को बैग खोलना- यह सब मंजुला का रोज़ का क्रम था. कब यह ममता आदत बन गई और आदत निर्भरता में बदल गई, उन्हें स्वयं भी पता नहीं चला.
अब वही रोहित घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर रहने जा रहा था. कॉलेज जाने से पहले मंजुला शायद सौ बार पूछ चुकी थीं, "दवाइयां रख लीं?...चार्जर रखा?... तौलिया?.. फाइल?.. दस्तावेज़?.."
रोहित हर बार मुस्कुराकर कहता, "मां... सब रख लिया है."
लेकिन मंजुला का मन मानता ही नहीं था. कॉलेज पहुंचने पर माता-पिता ने देखा कि पूरा परिसर नए विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों से भरा हुआ था. मंजुला की नज़र एक महिला पर जाकर ठहर गई. वे निश्चिंत भाव से कभी कैंपस की तस्वीरें ले रही थीं, कभी किसी से कॉलेज की जानकारी पूछ रही थीं.
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उनकी बेटी नताशा अपने नए साथियों के बीच पूरे आत्मविश्वास के साथ घुल-मिल रही थी. महिला ने बेटी से बस इतना कहा, "कोई परेशानी हो तो फोन कर देना. मैं यहीं हूं."
बस, न कोई हिदायत, न दस बार की चिंता. मंजुला से रहा नहीं गया, "बहन जी... आपको बिल्कुल चिंता नहीं हो रही?" महिला मुस्कुराईं.
"हो रही है... लेकिन चिंता और भरोसा दोनों साथ-साथ रह सकते हैं." बातों-बातों में परिचय हुआ. उनका नाम नेहा था.
कुछ देर बाद नेहा हंसते हुए बोलीं, "जानती हैं, मैं अपनी बेटी की मंकी मदर हूं."
मंजुला चौंक गईं.
"यह भी कोई बात हुई?"
नेहा ने पास के पेड़ पर खेलते बंदरों की ओर इशारा किया.
"देखिए... बंदरिया का बच्चा अपनी मां से ख़ुद चिपककर चलता है. मां उसे उठाकर नहीं चलती. उसकी पकड़ ढीली पड़े तो मां संभालती है, लेकिन पकड़ बच्चे को ही बनानी पड़ती है. मैंने भी नताशा की परवरिश इसी तरह की है.
बचपन से उसे कहा- जहां अटक जाओ, मुझे आवाज़ देना. मैं तुम्हारे साथ हूं. लेकिन तुम्हारी जगह मैं नहीं चलूंगी."
मंजुला चुपचाप सुनती रहीं.
नेहा आगे बोलीं, "हममें से बहुत सी मांएं बच्चों का हर काम प्रेम में कर देती हैं. उन्हें लगता है कि वे उन्हें सुविधा दे रही हैं, जबकि धीरे-धीरे हम उनका आत्मविश्वास उनसे छीन लेते हैं."
कुछ क्षण रुककर उन्होंने कहा, "बच्चों को हमारी उपस्थिति चाहिए, हमारी परछाई नहीं."
यह वाक्य मंजुला के भीतर कहीं गहरे उतर गया. उन्हें याद आने लगा- रोहित ने कभी अपना बैग तक ठीक से नहीं लगाया था. कभी अपने कपड़े नहीं समेटे थे. उन्होंने उसे पढ़ाई में आगे तो बढ़ाया, लेकिन जीवन की छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियों से बचाए रखा.
मंजुला की आंखें भीग गईं.
धीरे से बोलीं, "शायद... मैंने बेटे को सक्षम बनाने की बजाय सुविधाभोगी बना दिया."
नेहा ने स्नेह से उनका हाथ थाम लिया.
"गलती नहीं... यह हर मां का स्वाभाविक प्रेम है. बस समय रहते प्रेम का रूप बदलना पड़ता है."
फिर मुस्कुराकर बोलीं, "याद रखिए... जिस पत्थर को छेनी-हथौड़ी की चोट सहने का साहस नहीं होता, वह कभी मंदिर की प्रतिमा नहीं बनता." मंजुला ने गहरी सांस ली. "आज से मैं भी 'कैट मदर' नहीं, 'मंकी मदर' बनने का प्रयास करूंगी." दोनों हंस पड़ीं.
उधर दोनों बच्चे अपने नए जीवन की शुरुआत कर रहे थे और इधर दो मांएं अपने मातृत्व की नई परिभाषा सीख रही थीं.
कुछ देर बाद दोनों ने अपने-अपने बच्चों को एक ही संदेश भेजा, "हम यहीं कैंपस के गार्डन में हैं. ज़रूरत पड़े तो बस एक फोन कर देना." उस दिन बच्चों ने केवल कॉलेज में प्रवेश नहीं लिया था... दो मांओं ने भी अपने बच्चों के भविष्य में विश्वास करना सीख लिया था.
-. प्रज्ञा पाण्डेय 'मनु'
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