नन्हें बच्चों की भी कई इच्छाएं-तमन्नाएं होती हैं. ख़ासकर अपनी टीचर से तो वे ढेर सारी अपेक्षाएं रखते हैं, पर इसके विपरीत टीचर अक्सर उनके प्रति सख्त रवैया अपनाए रहती हैं.
बच्चे अपनी शिकायत या गुहार टीचर के सामने करने की हिम्मत तो नहीं जुटा पाते, लिहाज़ा वे अपनी गुहार मेरी सहेली के माध्यम से कर रहे हैं. आप भी उनकी गुहार पर गौर फरमाएं. टीचर से बच्चों को शिकायत है कि-
* आप क्लास में आते ही पढ़ाना क्यों शुरू कर देती हैं, जम्हाई लेने के लिए कम-से-कम पांच मिनट का समय तो दिया कीजिए.
* आप स्वयं तो रोज़ ऐसे आती हैं, जैसे मिस इंडिया कॉन्टेस्ट में भाग लेने आई हों, परंतु यदि हमने ग़लती से एक दिन भी बालों में रिबन न बांधा तो सीधे काट खाने को दौड़ती है, ऐसा क्यों भला?
* आप सिर्फ़ किताबी कीड़ों को ही प्यार क्यों करती हैं? कभी-कभी हम हंसोड बुद्ध बच्चों पर भी अपनी स्नेह वर्षा कर दिया कीजिए.
* आप ज़रा ज़रा-सी बात पर सज़ा दे देती हैं. क्या आपने वो कहावत नहीं सुनी 'क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात...'
* आप हर क्लास में सिर्फ़ पढ़ाई की ही बातें करके हमें सोने पर क्यों मजबूर करती हैं? क्या आप कभी शाहरुख और ऋतिक की बातें नहीं कर सकतीं?
* आप ख़ौफनाक शक्ल बनाकर हरदम हाथ में स्केल या छड़ी क्यों घुमाती रहती है? आख़िर डराने की भी एक सीमा होती है.
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* आप पढ़ाते समय प्रश्नों की बौछार क्यों लगाती हैं, चुपचाप पढ़ाकर चली क्यों नहीं जातीं? उफ़! आपकी इस आदत से कितनी तकलीफ़ होती है हमें.
* एक तो आप हमें रोज़ रोज़ इतना ज़्यादा होमवर्क दे देती हैं. ऊपर से अगर कभी होमवर्क नहीं कर पाए तो फेल होने से लेकर जीवनभर बेरोज़गार रहने तक की सारी बद्दुआएं एक साथ दे डालती हैं. इसे कहते हैं चोरी और सीनाजोरी.
* आपके कान इतने तेज कैसे हैं? हमारी भुनभुनाहट भी आप तक प्रकाश से भी अधिक तीव्र वेग से पहुंच जाती है.
* आप हमारे हर एक्सक्यूज को शक की नज़रों से क्यों देखती है? मानो आपका प्रोफेशन टीचर का नहीं, पुलिस या सीबीआई का हो.
* आप परीक्षा में नंबर देने में इतनी कंजूसी क्यों बरतती हैं? ज़्यादा नंबर देने से आप कौन-सी कंगाल हो जाएंगी? अगर आप किसी को फेल न करें तो हम आपको सौ-सौ दुआएं देंगे.
* एक तो आप जल्दी-जल्दी लेसन ख़त्म कर देती हैं और अगर हमें पाठ समझ में ना आए तो पुनः समझाने की बजाय बिना किसी विलंब के हमें उल्लू और गधे जैसी परिभाषाओं से सम्मानित कर देती हैं.
* हर छोटी-छोटी बातों पर बड़े-बड़े भाषण दे डालती हैं और फिर पूछती हैं कि आप लोगों को हरदम सिरदर्द क्यों रहता है?
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* ठंड की कड़कड़ाती सुबह में भी आप हर रोज़ हमसे ये अपेक्षा क्यों रखती हैं कि हम अपनी मधुर सपनों में खोई नींद से उठकर क्लास में आएं. एक दिन भी अनुपस्थित होने पर आप ऐसे बिगड़ती हैं, मानो हमने कोई अपराध कर दिया हो.
एक अध्याय ख़त्म करते ही आप ये घोषणा क्यों कर देती है कि कल इसको अच्छी तरह रट कर आना, मैं टेस्ट लूंगी.
* एक तरफ़ तो आप सरकार की भेदभावपूर्ण नीति पर कटुक्तियां कसती हैं, दूसरी तरफ़ यही नीति हम पर अख़्तियार करती हैं. ख़ुद तो 'टीचर्स डे' के दिन एंजॉय करती हैं और हमें 'चिल्ड्रेन्स डे' के दिन भी डांटने से नहीं चूकतीं. क्या ये आपका अन्याय नहीं है?

* आप हरदम ये धमकी दे देकर कि "फलां काम नहीं किया तो परीक्षा में देख लूंगी तुम लोगों को.." हमारे चेहरे पर बारह क्यों बजा देती है?
* आप रोज़-रोज़ सूरज निकलने की तरह स्कूल क्यों चली आती हैं? क्या आप कभी थकती नहीं? या आपके घर कभी कोई ज़रूरी काम ही नहीं होता? 'ख़ुद जियो औरों को भी जीने दो' वाली उक्ती पर कभी तो अमल कर लिया कीजिए.
* पैरेंट्स मीटिंग में आप हमारे माता-पिता को बुलाकर उनसे हमारी शिकायतें क्यों करती हैं? क्या अभिभावकों से हमें डांट सुनवाना आपको अच्छा लगता है?
* स्पोर्टस का पीरियड एक ही क्यों रखती हैं? क्या आपने कभी सोचा है कि एक पीरियड में क्या हम जी भर कर खेल पाएंगे?
* और सबसे बड़ी बात ये आप टेस्ट और परीक्षाएं लेती ही क्यों है? अगर आप हमें बिना परीक्षा लिए ही पास कर दें तो कितना अच्छा होगा न?
मासूम उम्र के निश्छल सवाल हैं ऊं हूं, नाराज होने का नहीं, बल्कि उनकी बातें सुनने, समझने और मुस्कुराने की जरूरत है.
- आराधना पांडेय

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