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मज़ा लें, मुसीबत का (Enjoy The Trouble)

अंग्रेज़ी में एक कहावत है कि 'मुसीबत यदि टाली न जा सके, तो उसका मज़ा लेना चाहिए' नदी से पानी लेते समय सावधान रहने के बाद भी यदि पैर फिसल जाए और आप उसमें गिर ही जाएं, तो नहाने का मज़ा उठा लेने में भला क्या बुराई है!

अनिल और विवेक दोनों एक ही बैंक में अधिकारी हैं. अतः अक्सर वे इकट्ठे ही आते-जाते हैं, एक शाम बैंक से लौटते समय उनकी मोटरसाइकिल एक ट्रक से टकरा गई और दोनों के पैरों में तीन सप्ताह के लिए प्लास्टर चढ़ाया गया. अनिल ने ये तीन सप्ताह रोते, दुखी होते और घरवालों को परेशान करते निकाले, लेकिन विवेक का रवैया अनिल से ठीक विपरीत रहा. उसने सोचा कि अब तीन सप्ताह घर पर रहना ही है तो क्यों न इस समय का सदुपयोग किया जाए. उसने बैंक की नियमावली के नए आए संस्करण को घर पर मंगवा लिया और एक मित्र के घर उपयोग में न आ रहे कंप्यूटर को भी अपने घर पर रखवा लिया.

वो रोज़ सुबह उठकर बच्चों को अपने कमरे में ही बुलवा लेता. बच्चे पढ़ते रहते और कोई समस्या होती तो उससे पूछ लेते. इस बीच वो बैंक की नियमावली पढ़ता रहता. बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद वो और उसकी पत्नी दोनों कंप्यूटर पर काम करते. इस तरह कंप्यूटर सीखना भी हो जाता और दोनों को एक-दूसरे के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा भी मिल जाता. इसी बीच उसने अपनी संस्था पत्रिका के लिए एक महत्वपूर्ण लेख भी लिख लिया.

गुप्ता परिवार अपनी कार से कानपुर जा रहा था कि अचानक कार में कुछ ख़राबी आ गई, चेक करने पर ड्राइवर ने बताया कि जो पुर्ज़ा ख़राब हो गया था, वो पास के शहर से जाकर लाना पड़ेगा. गुप्ता जी ने ड्राइवर को पैसे देकर वहां से गुज़रते एक ट्रक में बैठा दिया कि वो जाकर पुर्ज़ा ले आए, इधर उनके परिवार ने कार से चटाई और खाने-पीने का सामान निकाला और वहीं सामने बरगद के एक पेड़ के नीचे बैठ वे लोग हंसी-मज़ाक कर पिकनिक मनाने लगे. ड्राइवर कब पुर्ज़ा लेकर लौट आया और कार ठीक हो गई, किसी को पता ही नहीं चला.

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मुसीबत या परेशानी तो कभी कहकर आती नहीं, कभी भी कहीं भी आ टपकती है. सूझबूझ से ऐसे में उसका हल निकालना पड़ता है और इसके लिए समय भी लगता है. अब यह आपके ऊपर है कि आप मुसीबत के समय अनिल की तरह रो-धोकर गुज़ारते‌ हैं‌ विवेक या गुप्ता जी की तरह हंसते-खेलते.

हर व्यक्ति या परिवार के लिए मुसीबत का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है और उसका सामना करने का तरीक़ा भी. अतः यह आपके ऊपर है कि आपके या परिवार के ऊपर अचानक कोई मुसीबत आ जाने पर आप उसका सामना कैसे करते हैं. हां, यह अवश्य है कि ऐसी स्थिति आ जाने पर आप अपने परिजनों या मित्रों-शुभचिंतकों के साथ बैठकर योजना बना सकते हैं.

मिश्रा जी का स्थानांतरण सागर से बरेली हो गया, वहां जाकर उन्होंने कार्यभार संभाल लिया और मकान की तलाश शुरू की तो उन्हें कार्यालय के पास ही एक नया बन रहा मकान पसंद आ गया. मकान हर तरह से उनकी आवश्यकता के अनुरूप था और मकान मालिक भी बहुत सज्जन थे, अतः मिश्रा जी ने उसी मकान को लेने का निश्चय कर लिया और एडवांस भी दे दिया. मकान में दस-बारह दिन का काम बाकी था और इतना ही समय मिश्रा जी को अपने परिवार को लाने में भी लगना ही था.

मिश्रा जी अपने परिवारसहित अपनी कार में बरेली पहुंचे और पीछे-पीछे ट्रक में सामान भी. वहां पहुंचकर पता चला कि चार दिन पहले उनके मकान मालिक को दिल का दौरा पड़ा और वो नर्सिंग होग में है. इस कारण मकान का काम बीच में बंद रहा और मकान तैयार होने में अभी तीन दिन का और काम बाकी है और काम भी ऐसा कि एक भी कमरा अभी रखने और रहने लायक नहीं है. मकान मालिक और उनका परिवार शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे, पर वो बेचारे करें भी तो क्या? ऐसे में मिश्रा जी की अक्ल ने दौड़ लगाई‌ और वो इस समस्या का समाधान खोज ही लाए. उन्होंने सारा सामान गैराज में रखवा दिया और कुछ क़ीमती चीज़ें मकान मालिक के गेस्टरूम में. उस दिन वे गेस्ट रूम में रहे, तरोताज़ा हुए और अपने कार्यालय जाकर अपने अधिकारी को स्थिति बताकर तुरंत अपनी एल.एफ.सी. स्वीकृत करा ली. अगले ही दिन मिश्राजी परिवार अपनी कार लेकर एक सप्ताह की छुट्टी मनाने नैनीताल चले गए. वहां मौज-मस्ती की और लौटे तो मकान और मकान मालिक दोनों ही उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे.

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तो देखा आपने, यह हमारे ऊपर है कि हम किसी मुसीबत के आ जाने पर ज़रूरत से ज़्यादा परेशान होकर परेशानी को और बढ़ा लेते हैं या फिर कोई ऐसा रास्ता निकाल लेते हैं कि गुसीबत अपना काम करती रहे और हम अपना.

- विजय बजाज

Trouble Maker

Photo Courtesy: Freepik

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