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कहानी- आज़ादी… (Short Story- Aazadi…)

“बेटा, आज तुमने बात छेड़ी तो याद आया… बहुत मुश्किल से मिली आज़ादी, लेकिन क़ैद अभी भी हैं हम… हैं ना?” अति गंभीर स्वर में मेरी ओर उछाला गया प्रश्न मेरी समझ से परे था.

इतने लोगों की भीड़ से बचते हुए, सिगरेट और माचिस बनियान में छुपाकर तेजी से बाथरूम में घुस गया!.. आंसू बहे जा रहे थे, कैसे मान लूं कि दादू नहीं रहे! कल रात ही तो आंगन में पड़ी उनकी चारपाई पर लेटा रोज़ की तरह मैं उनका माखौल उड़ा रहा था, “बताइए ना दादू, इन लोगों को… आप तो बच्चे थे तब, अंग्रेज़ को चुटकी काट ली थी ना आपने?” दोस्तों को देखते हुए मैंने आंख मारी!

“हां बेटा, फिर जो मैंने दौड़ लगाई, हा हा हा…” दादू हंसते-हंसते खांसने लगे, “लेकिन ख़ुशी हुई कि हमारा भी योगदान रहा आज़ादी की लड़ाई में!”

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दोस्तों को छोड़कर आया तो दादू आसमान ताकते हुए विचार मग्न थे. मेरी आहट सुनकर चौंके, “आओ मंटू! थोड़ी देर बैठो मेरे पास बेटा… चले गए सब दोस्त?”

मैंने सिर खुजलाते हुए ‘हां’ कहा, अब कोई लंबा-चौड़ा क़िस्सा सुनाएंगे, दोस्त सही कहते हैं… बुड्ढा बहुत पकाता है.

“बेटा, आज तुमने बात छेड़ी तो याद आया… बहुत मुश्किल से मिली आज़ादी, लेकिन क़ैद अभी भी हैं हम… हैं ना?” अति गंभीर स्वर में मेरी ओर उछाला गया प्रश्न मेरी समझ से परे था. घड़ी देखी- आधे घंटे में कोचिंग से लड़कियाें के निकलने का समय हो जाएगा.. चौराहे पर दोस्त इंतज़ार करेंगे.

“क्या कह रहे हैं आप दादू? हो तो गए आज़ाद, कहां हैं क़ैद?”

“तुम तो हो क़ैद! ये देखो… तुम्हारे हाथ से हमेशा सिगरेट की बदबू आती है, तुम्हारे बाप को तो कमाने से फ़ुर्सत नहीं, मुझे तो तुम ज़ंजीरों में जकड़े नज़र आते हो; आवारा दोस्तों और नशे की जंजीरों में… आज़ाद हो जाओ बेटा…” दादू  बुरी तरह से हांफने लगे थे, मैंने सहारा देकर उन्हें बैठाया.

इस तरह की बातें कभी उन्होंने की नहीं थीं, क्या स्वर्ग से आती पालकी उन्हें दिख रही थी?

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“मंटू कहां है?.. आवाज़ दो‌ उसको… मंटू… मंटू.”

मैंने आंसू पोंछते हुए सिगरेट रौशनदान से बाहर फेंकी, बहुत सारे फोन नंबर हटाए, बाहर आकर देखा, दादू को अंतिम यात्रा के लिए तैयार किया जा रहा था.

शांत निर्विकार चेहरा, गहरी नींद में सोए हुए… मैंने उनके पैर छुए और बुदबुदाया, “निश्चिंत होकर जाइए दादू, मैं आज़ाद हो गया हूं!”

– लकी राजीव

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