सुना कहीं- होता प्रभात
मेरे आगे, काली रात
प्रतिदिन देखूं
सूरज ढलते
असहाय, अशक्त, विवश, निर्बल
मृत्यु के रक्त सने हाथों में
लाल जिह्वा, तपे अंगारे सी
इस में दम है दिन भर चलने का?
नहीं मानती
मगर सुना है…
जग में दुख सुख कब बंट कर आते?
भोर भई, पक्षीगण चहके
कुसुम मुस्काए
मेरा जब भी दामन फैला
तपते अंगारे झर झर आते
कुछ पल को मेरा सुहाग
सती रोज़ हुई सूरज के साथ
मैं संध्या हूं...
- उषा वधवा

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Photo Courtesy: Freepik
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