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गीत- बचपन (Geet- Bachpan)

वो शीत गई बरसात गई

खिलौनों और कहानी में

जाने कब बचपन बीत गया

जीवन की खींचातानी में

अभी तो कल ही हम हंसते थे

बिना वजह बेकार के

इतने सारे नियम ना थे

जीवन में शिष्टाचार के

क़द छोटे थे आंखें छोटी

पर सपने बड़े सजाते थे

खेल कल्पना में हम साथी

उन सबको जीत जाते थे

मीठे अनुभव गांठे थे

उत्साह से विस्तार में

इच्छा पूरी ना होने पर

रोते भी थे दुलार में

खिलखिलाहट कब बदल गई

वजह ढूंढ़ मुस्कानों में

जाने कब बचपन बीत गया

जीवन की खींचातानी में

वे काग़ज़ की कश्ती डूब रही

जीवन लहरों की मार से

वाणी की मिश्री बिखर गई

कड़वे शब्दों की धार से

चहरे पर चेहरे कितने है

अनुमान लगाना मुश्किल है

जीवन की अंतिम मंज़िल का

अब पता बताना मुश्किल है

तब कितनी सच्चाई थी ना

बातों और विचारों में

सबको अपना लेते थे हम

अपने सीमित संसार में

वो अच्छाई कहां खो गई

कपट और बेईमानी में

जाने कब बचपन बीत गया

जीवन की खींचातानी में

समय की गति तो नियत है

हम ही तेजी से भाग रहे

रुकने की फ़ुर्सत किसको है

सब ठोकर खाकर जाग रहे

बचपन जैसे अपनेपन का अब

इतिहास बनाना मुश्किल है

साथ में रहते स्वजन का

अंदाज़ बताना मुश्किल है

वो पल वो सुन्दर सपना

स्नेह ममता का प्यारा लम्हा

बस बाकी है याद निशानी में

जाने कब बचपन बीत गया

जीवन की खींचातानी में

वो लम्हे मुझको आकर

अगर कोई लौटा देगा

उन अगणित अद्भुत सपनों को

मेरी आंखों में छिपा देगा

वादा है मेरा कुछ भी करके

मैं उसका कर्ज़ चूका लूंगी

बाकी का जीवन गिरवी रखके

बचपन को गले लगा लूंगी…

– डॉ ज्योति श्रीवास्तव

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Photo Courtesy: Freepik

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