मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 · शुक्ल दशमी, आश्विन · विजयादशमी
दशहरा अक्सर एक पुतले और उसके दहन की कहानी बनकर रह जाता है. लेकिन इस त्योहार के भीतर वैदिक ज्योतिष का एक बहुत साफ़ सूत्र छिपा है: जीत दसवें की है.
एक दिन, तीन विजय
आश्विन शुक्ल दशमी को तीन अलग-अलग विजयों के कारण याद किया जाता है, औरहर क्षेत्र अपनी परंपरा के अनुसार इसे मनाता है.
उत्तर भारत में यह श्रीराम के हाथों रावण के वध का दिन है.
वनवास, सीता हरण और लंका के युद्ध के बाद इसी तिथि पर दस सिरों वाले रावण का अंत माना जाता है.
शाम ढलते ही रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं.
पूर्वी भारत और देवी परंपरा में यह मां दुर्गा के हाथों महिषासुर के वध का दिन है.
नौ रात्रियां उस संघर्ष की हैं और दशमी उसकी जीत की.
बंगाल में इस दिन भावुक विदाई होती है.
महाभारत की परंपरा में यह पांडवों के अपने शस्त्र वापस लेने का दिन है.
बारह वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवासके बाद अर्जुन ने शमी वृक्ष पर छिपाए गए अपने धनुष गांडीव को उतारा, वृक्ष का पूजन किया और विराट की रक्षा के लिए युद्ध में उतरे.
इसी कारण दशहरे पर शमी की पूजा होती है.
कथाएं तीन हैं, पर बात एक ही है: जीत अचानक नहीं आती.
वह लंबी तैयारी, संयम और छिपी हुई शक्ति के बाद आती है, और तब एक तय दिन पर आती है. यानी जीत का भी अपना पंचांग होता है.
रावण के दस सिर क्या कहते हैं
लोक मान्यता के अनुसार ‘दशहरा’ शब्द दश (दस) और हर (हरण या अंत) से मिलकर बना माना जाता है.
रावण के दस सिर दस विकारों के प्रतीक माने गए हैं. अलग अलग विद्वान इसकी सूची थोड़ा भिन्न तरह से देतेहैं, पर प्रचलित सूची में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, मद, स्वार्थ, क्रूरता और अन्याय शामिल हैं.
रावण को सिर्फ़ खलनायक मानना अधूरी समझ है.
वह वेदों का ज्ञाता, शिव का अनन्य भक्त और संगीत का मर्मज्ञ था.
ज्योतिष की एक पुस्तक रावण संहिता का नाम भी परंपरा में उसी से जुड़ा है.
उसकी हार बुद्धि की कमी से नहीं, दसों विकारों पर अधिकार न होने से हुई.
कुंडली पढ़ते समय भी मैं यही देखती हूं: समझदार, मेहनती और प्रतिभाशाली लोग भी अक्सर अपने ही किसी एक सिर से हार जाते हैं.
इसलिए दशहरे का पुतला जलाते समय किसी व्यक्ति, समुदाय या पड़ोसी के प्रति कड़वाहट न लाएं.
पुतला एक वृत्ति का प्रतीक है, किसी इंसान का नहीं.
इस मंगलवार को पंचांग क्या कहता है?
वार
मंगलवार मंगल ग्रह का दिन है, जो साहस, पराक्रम और संघर्ष में जीत का कारक है.
यानी विजय के दिन का स्वामी वही ग्रह है, जो योद्धाओं का ग्रह कहलाता है.
तिथि
दशमी के अधिष्ठाता धर्मराज यम माने जाते हैं.
यह पूर्णा वर्ग (5, 10, 15) की तिथि है, यानी भरी हुई.
क्रम
कल महानवमी थी, जो रिक्ता (खाली) तिथि है और पूर्णता, विश्राम तथा कृतज्ञता के लिए उपयुक्त मानी जाती है. आज दशमी पूर्णा है.
नौ दिन के व्रत-नियम ने खाली किया, दसवां दिन भरता है.
पहले विश्राम, फिर विजय.
सूर्य
सूर्य इस समय तुला राशि में है, जहां वह नीचस्थ माना जाता है.
तुला न्याय और संतुलन की राशि है, इसलिए विजयादशमी का संदेश भी साफ़ है: जीत वही अच्छी है, जो न्याय से पाई गई हो.

एक और बात ध्यान देने की है…
विजयादशमी को साढ़े तीन मुहूर्तों में गिना जाता है, यानी वर्ष के उन तीन से साढ़े तीन दिनों में, जिन पर कोई नया काम शुरू करने के लिए अलग से मुहूर्त नहीं देखना पड़ता.
बाकी दिन हैं गुड़ी पाडवा, अक्षय तृतीया और दीपावली पाडवा (आधा).
यही वजह है कि इस दिन लोग नई दुकान खोलतेहैं, वाहन ख़रीदते हैं, कक्षाएं शुरू करते हैं और काग़ज़ों पर हस्ताक्षर करते हैं.
पूजा के लिए सबसे उपयुक्त अपराह्न काल (दोपहर के बाद का समय) और विजय मुहूर्त हर शहर मेंअलग होता है. मुंबई का सही समय किसी प्रमाणित पंचांग से पुष्ट कर लें.
दशमी और दशम भाव: इस पर्व का सबसे दिलचस्प संयोग
तिथि दसवीं है और कुंडली का दसवां भाव कर्म भाव है यानी व्यवसाय, नौकरी, प्रतिष्ठा और समाज में आपकी पहचान का स्थान.
सांसारिक जीत का भाव और जीत का पर्व, दोनों दसवें से जुड़े हैं. मैं इसे संयोग नहीं मानती.
किसी कुंडली में करियर देखते समय मैं इन बातों पर ध्यान देती हूं:
दशम भाव और उस पर पड़ी राशि.
यह बताती है कि किस तरह का काम और किस तरह की साख आपके लिए स्वाभाविक है.
दशमेश (दसवें भाव का स्वामी)
उसकी राशि, भाव और बल से पता चलता है कि कर्म की ऊर्जा किस दिशा में जा रही है.
दशम भाव में बैठे ग्रह
सूर्य, मंगल और शनि इस भाव में अक्सर अच्छा फल देते हैं.
सूर्य को दशम भाव में दिग्बल मिलता है.
दशांश (D10) कुंडली
यह विशेष रूप से करियर के लिए बनी विभाजितकुंडली है.
जन्म कुंडली साधारण दिखे और दशांश मज़बूत हो, तो करियर में अच्छे परिणाम आ सकते हैं.
कर्म के कारक ग्रह: सूर्य (अधिकार), बुध (कौशल और व्यापार), बृहस्पति (विवेक और विस्तार) और शनि (अनुशासन और लंबा परिश्रम).
चल रही दशा
करियर में बदलाव अक्सर दशमेश या दशम भाव से जुड़े ग्रहों की दशा-अंतरदशा में होता है.
एक दिलचस्प बात यह है कि मंगल मकर राशि मेंउच्च का होता है और मकर कालपुरुष की कुंडली में दसवां स्थान है.
यानी साहस का ग्रह अपनी सबसे मज़बूत अवस्था में उसी राशि में होता है जो कर्म का प्रतीक है.
कर्म में लगा हुआ साहस ही सफलता बनता है.
आज अपने आप से एक सवाल पूछिए: मेरे काम में वह कौन-सी जीत है, जिसका मैं इंतज़ार तो कर रहा हूं, पर तैयारी नहीं?
अर्जुन ने पूरा एक वर्ष भेष बदलकर बिताया, पर अभ्यास नहीं छोड़ा.
सोने का वृक्ष: आपटा और शमी
महाराष्ट्र में, और इसलिए मुंबई में भी, दशहरे पर आपटा (कांचन) के पत्ते एक-दूसरे को ‘सोना’ कहकर दिए जाते हैं. लोग एक-दूसरे से कहते हैं, “सोनं घ्या, सोन्यासारखं राहा!”यानी यह सोना लीजिए और सोने जैसे रहिए!
ददर जैसी फूल मंडियों में त्योहार से कुछ दिन पहले इन पत्तों के गठ्ठे बिकने लगते हैं।
इस रीति के पीछे कालिदास के रघुवंश में आई एक कथा है.
वरतंतु के शिष्य कौत्स ने शिक्षा पूरी करने के बाद गुरु को दक्षिणा देने का आग्रह किया.
गुरु ने मना किया, पर ज्यादा अड़ने पर ज्ञान की चौदह विद्याओं के नाम पर चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएं मांग लीं. कौत्स राजा रघु के पास पहुंचा, जो अपना सारा कोष पहले ही दान कर चुके थे. रघु ने कौत्स को लौटाया नहीं और धनपति कुबेर पर चढ़ाई की तैयारी करने लगे.
तभी कुबेर ने शमी और आपटा के वृक्षों पर स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दी. रघु ने वह सब कौत्स कोदे दिया.
कौत्स ने उतना ही लिया जितना उसे चाहिए था, बाकी लौटा दिया और रघु ने वह प्रजा में बांट दिया.
इस कथा के तीनों पात्र मुझे धन के बारे में एक सीख देते हैं.
शिष्य ने जितना ज़रूरत थी उतना लिया, राजा ने जो कुछ था सब दे दिया और देवता ने दोनों का सत्कार किया. आपटा के पत्तों का लेन-देन इसी उदारता की याद है.

शमी वृक्ष का संबंध परंपरा में शनि से भी जोड़ा गया है और इसके पत्ते शनि तथा गणेश जी को अर्पित किए जाते हैं. 2026 में शनि मीन राशि में है और कुंभ, मीन तथा मेष राशि वाले लोग साढ़ेसाती से गुज़र रहे हैं.
ऐसे लोगों के लिए दशहरा एक सरल उपाय देता है: शमी के कुछ पत्ते श्रद्धा से अर्पित करें, धैर्य और सुरक्षा की प्रार्थना करें और किसी एक सेवा का संकल्प लें.
शनि उसी का साथ देता है, जो धीरज रखता है और शमी उसी का वृक्ष है, जिसने इंतज़ार किया.
अपराजिता पूजा और सीमोल्लंघन
कई स्थानों पर दिन की शुरुआत अपराजिता पूजासे होती है.
अपराजिता यानी जिसे कोई हरा न सके, यह देवीका ही एक नाम है.
इसका नीला फूल (क्लितोरिया टर्नेशिया) भी समर्पित किया जाता है.
कई ग्रंथों में इस पूजा को दोपहर के बाद, उत्तर-पूर्व दिशा में आठ पंखुड़ियों वाला कमल बनाकर करने का विधान मिलता है.
दशहरे से एक पुरानी मराठा रीति भी जुड़ी है, सीमोल्लंघन, यानी सीमा पार करना. राजा इसी दिनअपने राज्य की सीमा लांघकर अभियान पर निकलते थे.
आज के संदर्भ में इसका अर्थ सरल है: अपनी सीमा पार करने का दिन.
वह आवेदन भेज दीजिए, वह वेबसाइट लाइव कर दीजिए, वह बातचीत कर लीजिए जिसे महीनों से टाल रहे थे.
वास्तु: विजय के दिन क्या करें…
पहले अपना रावण हटाइए.
शाम से पहले एक घंटे के लिए घर का अव्यवस्थित सामान हटाइए: टूटे सामान, पुराने काग़ज़ और सूखे पौधे.
वास्तु में अनावश्यक सामान का ढेर अटके हुए फैसलों का प्रतीक माना जाता है.
अपने औज़ारों की पूजा कीजिए.
लैपटॉप, किताबें, वाद्य यंत्र, औजार और वाहन की चाबी को साफ़ कपड़े पर उत्तर-पूर्व या पूर्व में रखकर एक फूल चढ़ाइए.
वाहन पूजा
कई परिवार इस दिन नई गाड़ी लेते हैं.
वास्तु में वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा गति की दिशा मानी गई है, इसलिए पार्किंग के लिए अच्छी है.
गाड़ी पर छोटा तिलक लगाइए, माला चढ़ाइए और प्रवेश द्वार को गाड़ी से न रोकिए.
दरवाज़े पर शमी
कई परिवार प्रवेश पर या बगीचे में शमी का पौधारखते हैं.
उसे साफ़ रखिए और शौचालय या कूड़े के स्थान के पास न रखिए.
प्रवेश द्वार
तोरण और रंगोली नई कर लीजिए.
अंदर आने वाली ऊर्जा सबसे पहले दहलीज़ से ही गुज़रती है.
अपराजिता का कोना
उत्तर-पूर्व में एक फूल के साथ दीपक रखिए और उस कोने को दिनभर खाली रखिए.
दुकान या दफ़्तर
उत्तर और उत्तर-पूर्व खुले रखिए और तिज़ोरी दक्षिण-पश्चिम में इस तरह रखिए कि उसका दरवाज़ा उत्तर की ओर खुले.
वास्तु सुझाव: अगर आज किसी काग़ज़ पर हस्ताक्षर करने हैं या कोई नया काम शुरू करना है, तो साफ़ मेज़ पर पूर्व या उत्तर की ओर मुंहकरके बैठिए.
यह छोटी सी बात है, पर मन को संकल्प से जोड़ने में मदद करती है.
घर पर विजयादशमी कैसे मनाएं
सुबह स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनिए. अगर आपने नवरात्रि में कलश स्थापित किया था तो अपनी परंपरा के अनुसार विसर्जन कीजिए.
दोपहर बाद अपराह्न काल में उत्तर-पूर्व की ओर मुख करके दीपक जलाएं. अपराजिता देवी को फूल चढ़ाइए (नीला अपराजिता मिले तो उत्तम) और ‘ॐ अपराजितायै नमः’ मंत्र का 108 बार जाप कीजिए.
कुछ शमी पत्ते श्रद्धा से अर्पित करके अपने अंदर की कमज़ोरी पर जीत की प्रार्थना कीजिए.
आपटा के पत्ते या मिठाई लेकर पड़ोसियों और रिश्तेदारों से मिलिए और हर व्यक्ति से उसकी एक अच्छी बात कहिए.
एक काग़ज़ पर अपने दस सिरों में से उस सिर का नाम लिखिए, जिससे आप सबसे अधिक परेशान रहते हैं और उसे सुरक्षित तरीक़े से जला दीजिए या फाड़ दीजिए.
इस हफ़्ते का एक ऐसा काम तय करके शुरू कर दीजिए, जो लंबे समय से अटका है.
शाम को अगर रावण दहन देखने जाएं तो बच्चों को समझाइए कि दस सिर दस बुराइयां हैं और पूछिए कि वे किसे जलाना चाहेंगे.
विजय का हिसाब: तीन सवाल
आज काग़ज़ लेकर इन तीन सवालों के सीधे और ईमानदार जवाब लिखिए.
नवरात्रि ने मुझे क्या छोड़ने को कहा? यही आपका रावण है.
कौन-सी तैयारी मैं चुपचाप कर रहा हूं, जिसकी अब तारीख़ तय होनी चाहिए? यही आपका गांडीव है.
इस हफ़्ते मैं कौन-सी सीमा पार करूंगा? यही आपका सीमोल्लंघन है.
यह भी पढ़ें: काव्य- महानवमी+विजय दशमी की शुभकामनाएं! (Poetry- Happy Mahanavmi+Vijayadashami)
आम तौर पर पूछे जाने वाले सवाल
क्या दशहरे पर नया काम शुरू करने के लिए अलग मुहूर्त देखना ज़रूरी है?
विजयादशमी साढ़े तीन मुहूर्तों में आती है, इसलिए आम शुभ कामों के लिए अलग मुहूर्त की ज़रूरत नहीं पड़ती.
लेकिन विवाह या बड़े निवेश जैसे बड़े फ़ैसलों के लिए अपनी कुंडली की दशा और गोचर देख लेनासमझदारी है.
क्या आज गाड़ी ख़रीदना ठीक रहेगा?
बहुत से परिवार ऐसा करते हैं और यह परंपरा से शुभ माना जाता है.
बस ख़र्च का हिसाब पहले से लगा लें.
मैं नवरात्रि का व्रत पूरा नहीं कर पाया, तो क्या दशहरा पूजा पर इसका असर पड़ेगा?
बिल्कुल नहीं. दशहरा अलग पर्व है.
जो बन सका, उसके लिए कृतज्ञता प्रकट करें और आगे बढ़ें.
क्या रावण की कुंडली के बारे में कुछ पता है?
लोक कथाओं में काफ़ी कहानियां हैं, जैसे यह कि रावण ने अपने पुत्र के जन्म के समय ग्रहों को अनुकूल स्थिति में रहने का आदेश दिया था. ये कथाएं हैं, प्रमाणित कुंडलियां नहीं.
मैं इन्हें एक ऐसे व्यक्ति का प्रतीक मानती हूं जिसने सब कुछ जीता, पर ख़ुद को नहीं.
क्या बच्चों को रावण दहन दिखाना ठीक है?
हां. यह उन्हें दस सिरों का मतलब सरल शब्दों में समझाने का अच्छा मौक़ा है.
नौ रात्रियां घर को साफ़ करती हैं, मन को स्थिर करती हैं और देवी के अलग-अलग रूपों से हमारा परिचय कराती हैं.
दसवां दिन हमसे सिर्फ़ एक सवाल पूछता है: इसका करना क्या है?
तीनों कथाओं में जीत उसी की हुई जिसने धैर्य केसाथ तैयारी की, अपना छिपा हुआ बल वापस लिया और सही दिन कदम उठाया.
अगर आप लंबे समय से तैयारी कर रहे हैं, तो आज वह दिन है.
– ऋचा पाठक, ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु विशेषज्ञ, ज्योतिष धाम
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