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कहानी- सोन चिरैया (Short Story- Son Chiraiya)

“… एक हम लड़कियों की ज़िंदगी है, हर कदम पर नियम और संस्कार की दुहाई देता समाज. मैं भी उड़ना चाहती हूं मां!इस जीवन को बेड़ियों में बंध कर नहीं काटना चाहती.”

 

आज सुबह जब छत पर चिड़ियों को दाना देने गईतब एक सुनहली चिड़िया दिखी. बहुत सुंदर बहुत प्यारी. उसे देख मुझे अपनी ‘पाखी’ याद आ गई.

वो अक्सर कहती थी, “मां, चिड़ियों की ज़िंदगी भी कितनी अच्छी होती है ना!न कोई बंदिश न कोई नियम, विस्तृत आकाश की ऊंचाइयां नापना इनके लिए कितना सरल है. एक हम लड़कियों की ज़िंदगी है, हर कदम पर नियम और संस्कार की दुहाई देता समाज. मैं भी उड़ना चाहती हूं मां! इस जीवन को बेड़ियों में बंध कर नहीं काटना चाहती.”

“अरे, बेटा तू ऐसा क्यों बोल रही है! तू तो मेरी सोन चिरैया है. छोटी थी तो कभी एक जगह नहीं ठहरती थी. दिनभर पूरे घर में फुदकती रहती थी. तभी मैंने तेरा नाम ‘पाखी’ रख दिया था.”

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“तब मुझे अपने घोंसले से बाहर क्यों कर रही हो मां?

“चिड़ियों को तो अपना घोंसला छोड़ना ही होता है बेटा! एक नया घोंसला, एक नया घरौंदा, एक नया कलरव तेरा इंतज़ार कर रहा है. तेरी मीठी चहचहाहट से तेरा नया घोंसला भी चहक उठेगा.”

पर ऐसा कुछ न हुआ.

उस दिन वो बहुत रो रही थी, कह रही थी, “मां, इन लोगों ने मेरे पंख काट दिए हैं. हर समय मेरे इर्दगिर्द उपहास,‌ झूठे आरोप और फ़रमाइशों का जाल बिछा रहताहै. मैं हर बार नए हौसलों के ‘पर’ लेकर उड़ना चाहती हूं, जीना चाहती हूं. लेकिन इस पिंजरे की दीवारों से टकराकर घायल हो जाती हूं.”

और कुछ ही दिन बाद उसकी खुदखुशी की ख़बरआ गई, वो मुझे छोड़ कर चली गई, सदा सदा के लिए अनंत में विलीन हो गई.

भीगी आंखों से देखा, तो वो चिड़िया अब तक वहीं बैठी थी, कहीं नहीं जा रही थी. मुझे देख कर उड़ भी नहीं रही थी. इधर उधर फुदकती, फिर मेरे पास आकर बैठ जाती.

“पाखी!.. तू आ गई बेटा, तू मेरी सोन चिरिया ही है ना! तू तो आकाश में उड़ना चाहती थी बेटा, उड़ ख़ूब उड़… इस दुनिया के हर रंग देख!कम से कम हम इंसानों की तरह तेरे नए रूप में तेरे मादा होने की वजह से तुझे बेड़ियों में नहीं बांधा जाएगा.

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उड़ जा मेरी बिटिया, लेकिन मैं तेरे लौटने का इंतज़ार करूंगी. और तुझे वचन देती हूं अबकी तेरी मां कमज़ोर नहीं पड़ेगी और अपनी बिटिया के पंख किसी को भी कतरने नहीं देगी.

– पल्लवी विनोद

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