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कहानी- मुफ़्त हुए बदनाम ३: तुच्छ मानसिकता (Short Story- Muft Huye Badnam 3)

उनकी बात सुनते ही मुझे रोना आ गया. मुझे ग़ुस्से के साथ-साथ तरस भी आ रहा था कि कितनी तुच्छ मानसिकता है उनकी, जो उन्हें किसी का मेहनत करना, तरक्क़ी करना भी नहीं सुहाता.

बात उस समय की है जब मैं एक प्राइवेट स्कूल मेंअध्यापिका के पद पर कार्यरत थी, मैं अपने कार्यके प्रति पूरी तरह से समर्पित थी. मैं ईमानदारी, लगन एवं निष्ठा से अपने कर्त्तव्य का पालन कर रहीथी. बच्चों को मन लगाकर पढ़ाती, उनकी हर परेशानियों पर ध्यान देती, मेरी कक्षा में मोहित नाम का बड़ा ही प्यार सा बच्चा पढ़ता था, लेकिन वह पढ़ाई में काफ़ी कमज़ोर था, मैं उसे हर तरह से पढ़ाती व समझाती, लेकिन वह ठीक तरह से सीखने में सक्षम न हो पाता. उसके अभिभावक कई बार मुझे उसकी ट्यूशन लेने के लिए आग्रह करते, लेकिन मैं ट्यूशन के ख़िलाफ़ थी, इसलिए हर बार मना कर देती.

एक दिन मोहित के मम्मी पापा मोहित को लेकर मेरे घर ही आ गए और उसके भविष्य का वास्ता देकर उसे घर पर पढ़ाने की ज़िद करने लगे. आख़िरकार मुझे उनकी ज़िद के आगे झुकना पड़ा, और इस तरह मोहित हर रोज़ शाम को घर पर पढ़ने के लिए आने लगा.

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अभी उसे जाते हुए कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन मैंने शर्मा आंटी को अपनी पड़ोसन से कहते हुए सुना,”लगता है गुप्ता जी के घर खाने के लाले पड़ गए हैं, जो अपनी बेटियों की कमाई खाते हैं. यही नहींअब तो स्कूल के साथ-साथ घर पर भी कमाई चालू कर दी है.”

उनकी बात सुनते ही मुझे रोना आ गया. मुझे ग़ुस्से के साथ-साथ तरस भी आ रहा था कि कितनी तुच्छ मानसिकता है उनकी, जो उन्हें किसी का मेहनत करना, तरक्क़ी करना भी नहीं सुहाता. शायद उन्हें ऐसी पड़ोसिनों की ज़रूरत थी, जो निठल्ली रहे, इधर-उधर की निंदा-चुगली करती रहें और अपने घर-परिवार के साथ देश पर भी बोझ बनी रहे, स्वावलंबी न बने.

उन्होंने अपनी जैसी तुच्छ मानसिकता वाली स्त्रियों में तो मुझे मुफ़्त में बदनाम कर दिया. लेकिन मेरे शिक्षा कार्य, कर्तव्य के मार्ग में उनकी ओछी व छोटी मानसिकता आड़े नहीं आई और न ही कभी आ सकती है,

– अंजू गुप्ता

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