यदि हम ख़ुद अपना आत्म-निरीक्षण करें, तभी हमें पता चलेगा कि हम में कितनी कमियां या कमज़ोरियां हैं. ठीक इसी तरह जब हम दूसरों के बारे में ग़लत सोचते हैं, तो हो सकता है कि वह व्यक्ति ग़लत न हो और हमारे विचार ही उसके प्रति ग़लत हों.
आत्म-निरीक्षण का मतलब है अपने आपको जानना समझना, विचार-विमर्श करना, जांच करना और अपने गुण-दोषों को परखकर ख़ुद के बारे में जानने का प्रयत्न करना.
लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो अपना सही आत्म-निरीक्षण करते हैं. हम हमेशा बहिर्मुखी प्रवृत्ति रखते हैं, अंतर्मुखी नहीं. इसीलिए अपने आपसे अंजान रहते हैं.
परंतु हम इस ग़लतफ़हमी में ज़रूर रहते हैं कि हम अपने आपको अच्छी तरह जानते पहचानते हैं और दूसरों को भी हम अपने बारे में ग़लत जानकारियां देते हैं. यानी हम जैसे होते हैं, वैसा दूसरों को दिखाते नहीं, क्योंकि हमारी इच्छा तो यही होती है कि लोग हमें अच्छा समझें.
पर यदि हम अपने असली रूप को ही नहीं जानते, तो यह भी कैसे जान सकेंगे कि हम क्या हैं और किसलिए हैं? और ख़ुद में सुधार के लिए हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?
ऐसे में यदि हम ख़ुद अपना आत्म-निरीक्षण करें, तभी हमें पता चलेगा कि हम में कितनी कमियां या कमज़ोरियां हैं. ठीक इसी तरह जब हम दूसरों के बारे में ग़लत सोचते हैं, तो हो सकता है कि वह व्यक्ति ग़लत न हो और हमारे विचार ही उसके प्रति ग़लत हों.
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हम जिस व्यक्ति के प्रति ग़लत विचार रखते हैं, उसे तो पता ही नहीं चलता कि हमारे विचार उसके प्रति कैसे हैं.
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम जिस व्यक्ति से ईर्ष्या करते हैं, वही व्यक्ति बुरे वक़्त में हमारे काम आता है. अतः यदि एकान्त में बैठकर हम अपना आत्म-निरीक्षण करें और अपनी बुराइयों को देखें-परखें व उन्हें दूर करने की कोशिश करें तो सकारात्मक परिणाम ज़रूर मिलेंगे.
कोई व्यक्ति अगर हमसे कुछ ग़लत बात करता है या ग़ुस्से से कुछ बोल देता है तो हमें बुरा लगता है. ठीक वैसे ही जब हम उन्हें बुरा-भला कहते हैं तो उनको भी बुरा लगता होगा. हम सभी में यह विचारधारा होनी बेहद ज़रूरी है.
इससे पहले कि कोई हमारी कमज़ोरियां बताए, हम ख़ुद ही उन्हें समझ लें और दूर करने की कोशिश करें तो समस्या ख़ुद-ब-ख़ुद हल हो जाएगी. तभी हम एक सफल नागरिक, सफल इंसान बन सकेंगे.
– सुधा रंजन

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