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कहानी- एक परीकथा (Short Story- Ek Parikatha)

एक दिन परी ने समझाया, “ऐसे रिश्ते नही चल सकते, मुझे थोड़ा भरोसा दो कुछ अधिकार दो.” न जाने क्यों आंसू भरी आंखों को देख वो पिघल गया. 

“अब कभी ऐसा नही होगा, मैं तुमको ख़ुश रखने की पूरी कोशिश करूंगा.” 

 

वो रोज़ उससे बातें करता. घंटों, कभी चैटिंग कभी फोन पर और वो भी तो इंतज़ार करती थी कि कब सुबह हो और वो सूरज के साथ आ जाए. जिस दिन बात नही होती तो बैचेन हो जाती थी वो, आदत हो गई थी उसके साथ की.

जब उसका फोन आता तो खिल जाती थी वो फूलों सी. उसकी बातों ने जादू कर दिया था उस पर, परी समझने लगी थी वो ख़ुद को. परी जो आकाश में उड़ तो नही सकती मगर कल्पनाओं में उड़ती रहती थी उसके संग.

यूं ही बातों‌ बातों में एक दिन उसने पूछा, “मिलोगी मुझसे?”

अरमानों को पंख मिल गए, “हां, क्यो नहीं!” जगह और दिन तय हुआ.

वो डर भी रही थी कहीं उसका भ्रम टूट न जाए.

पर वो मिले और न जाने क्यों उसको देख कर परी पूरी तरह सम्मोहित हो गई. जो वो कहता परी ख़ुशी- ख़ुशी वही करती. सम्मोहन से ज़्यादा अब उसे प्यार हो गया था उससे.

बस, यहीं चूक गई वो. प्यार नही होना था, प्यार तो हक़ मांगने लगता है, थोड़ा सम्मान मांगने लगता है और दो होकर भी एक का एहसास चाहता है. परी ने बहुत बड़ी ग़लती कर दी थी, क्योकि उसे परी से प्यार नही था, वो तो केवल उसे अपने वश में रखकर ख़ुश था.

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अब उनमें रोज़ ही झगड़े होने लगे. परी अपने रूप में लौटने लगी थी, वो फूल सी खिलती नहीं थी, लेकिन मुरझाती जा रही थी. रोज़ आंखों के पानी से ख़ुद को सींचती थी.

भोली, इतना भी नही जानती थी कि खारे पानी से सिंचाई नही होती. प्यार की बेल सूखने लगी थी.

वो पूरे जतन से उसे बचाने की कोशिश करती, लेकिन वो कहीं न कहीं कैंची चला देता था. खाद -पानी के बिना सूखती बेल को देख वो परेशान थी,मगर न जाने क्यों वो बेपरवाह था. उसका पूरा ध्यान केवल परी को वश करने में था.

एक दिन परी ने समझाया, “ऐसे रिश्ते नही चल सकते, मुझे थोड़ा भरोसा दो कुछ अधिकार दो.”

न जाने क्यों आंसू भरी आंखों को देख वो पिघल गया.

“अब कभी ऐसा नही होगा, मैं तुमको ख़ुश रखने की पूरी कोशिश करूंगा.” कहते हुए उन आंसुओं से भरी पलकों को चूम लिया उसने.

परी ख़ुश होकर फिर फूल सी खिल गई, उम्मीद के जुगनू आंखों में दिप-दिप करने लगे.

मगर ये तो शुरुआत थी. इसके बाद तो लगभग रोज़ का सिलसिला बन गया.

ग़लती हो न हो पर उसके दायरे संकुचित कर दिए जाने लगे. शब्दों के कड़े मंत्रों से उसे बांध कर वश में रखने के प्रयास तेज होने लगे.

अब परी अपने चारों ओर एक अदृश्य पिंजड़ा महसूस करने लगी थी. जब कभी वो थोड़ी भी आज़ादी कहती तो वो उसे पूरी तरह आज़ाद करने की धमकी देता, ओर वो अपने प्रेम से मजबूर फिर समर्पित होने का वादा करती.

हालात, मजबूरी से बेख़बर वो उसकी मूक वेदना पर प्रसन्न था, विजयी कि आख़िर उसके मंत्र बेकार नहीं गए.

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फिर एक दिन, पिंजड़ा खाली था.

उसने हैरत से आस-पास निगाह दौड़ाई.

वो दूर खड़ी उसे ही देख रही थी, उसकी आंखों मेंभयावह सन्नाटा था. अब वो परी नही थी.

वो कौन है, उसके साथ-साथ वो भी सोच रही थी.

– मेघा राठी

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Photo Courtesy: Freepik

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