अगले दिन न चाहते हुए भी कदम गनहिल की तरफ़ बढ़ गए. और वहां जाकर देखा, तो वह लड़का जैसे अपनी निश्चित जगह पर बैठा मेरा ही इंतज़ार कर रहा था. मानो उसे मेरे आने का पूरा-पूरा यक़ीन था.
आज फिर १८ जनवरी है यानी मेरी सगाई की तारीख़! भला कैसे भूल सकती हूं इस दिन को. मोहब्बत के मायने इसी तारीख़ ने तो बताए थे मुझे. पता ही नहीं चला कि कब और कैसे बंध गई इस अनकहे रिश्ते की डोर, जिसे न तो कोई नाम दे पाई मैं और न ही भूल सकी हूं आज तक.
बहुत ही फक्कड़ और तेज-तर्रार लड़की थी मैं. सारा कॉलेज टॉम बॉय के नाम से बुलाता था. इश्क़-मोहब्बत जैसे अल्फ़ाज़ तो पास भी नहीं फटक पाए थे कभी.
लेकिन छुट्टियों में मसूरी घूमने गई थी उसी दौरान चाचाजी की सिफ़ारिश पर मम्मी-पापा ने मुझे अविनाश को अपना जीवनसाथी बनाने के लिए राज़ी कर लिया और सगाई की तारीख़ भी पक्की कर ली.
बहुत ख़ुश तो नहीं थी मैं, लेकिन कोई शिकायत भी नहीं थी किसी से.
फिर एक शाम जब चाचाजी और मैं शाम को गनहिल की तरफ़ घूमने निकले तो मैंने और चाचाजी ने महसूस किया कि एक लड़का लगातार मुझे निहारे जा रहा है. मैं अनदेखा करती रही, लेकिन चाचाजी मुझे चिढ़ाने लगे, “देखो कशिश, तुम्हारे हुस्न ने बेचारे अविनाश को तो घायल कर ही दिया, अब देखें इन जनाब की दीवानगी क्या रंग लाती है.”
इस पर मैं बौखला उठी और उन पर बरस पड़ी, “देखिए चाचाजी, मुझे इस तरह का मज़ाक बिल्कुल पसंद नहीं. मैं तो बस मम्मी-पापा के प्रति अपना फ़र्ज़ समझकर शादी कर रही हूं, वरना इश्क़-मोहब्बत जैसी बातों के लिए मेरे पास वक़्त नहीं, मुझे अभी जीवन में बहुत कुछ करना है.”
“अच्छा-अच्छा, दार्शनिक बातें बहुत हो चुकीं. अब घर चलिए.”
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मैं घर तो आ गई, लेकिन आंखें जैसे गनहिल में ही छूट गईं. बार-बार उसका चेहरा याद आ जाता और चाचाजी की बातें भी.
अगले दिन न चाहते हुए भी कदम गनहिल की तरफ़ बढ़ गए. और वहां जाकर देखा, तो वह लड़का जैसे अपनी निश्चित जगह पर बैठा मेरा ही इंतज़ार कर रहा था. मानो उसे मेरे आने का पूरा-पूरा यक़ीन था. लेकिन दूसरे ही पल अविनाश का ख़्याल आया और मम्मी-पापा का भी. अब तो सगाई के कार्ड भी बंट चुके थे.
“नहीं-नहीं, मैं ऐसा सोच भी कैसे सकती हूं.” और मैं पलटकर घर की तरफ़ दौड़ पड़ी. लेकिन लाख कोशिश के बाद भी मैं वो चेहरा भुला नहीं पा रही थी.
फिर सगाई का दिन भी आ गया और में अपने मन को ढीठ बनाने की हर नाकाम कोशिश करने लगी. लेकिन मेरी तक़दीर शायद बार-बार उसी चेहरे के आस-पास मंडराना चाहती थी. सगाई में अविनाश के साथ वो लड़का भी खड़ा मिला. “अरे तुम!” अनायास ही हम दोनों के मुंह से निकल पड़ा. इस पर अविनाश बोला, “क्या तुम दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते हो?” मेरे पास तो कोई जवाब नहीं था, लेकिन उसने बात को संभाल लिया, “हां भैया, एक-दो बार यूं ही भाभी जी से मुलाक़ात कर ली थी, यह जानने के लिए कि कहीं भाभी जी हमारे भैया की टक्कर में कम तो नहीं हैं. लेकिन जब देखा, तो अपनी सोच से भी ज़्यादा पाया इनको.” अविनाश तो मारे ख़ुशी के हंसने लगे थे.
अंगूठी पहनाने की रस्म के दौरान भी मैंने यही महसूस किया कि मैं अविनाश के साथ छल कर रही हूं. शायद चाचाजी ने भी मेरी हालत को महसूस किया था. कहने लगे, “कशिश, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा, मैं सब कुछ संभाल लूंगा.”
मन तो किया झट से ‘हां’ कह दूं. लेकिन फिर मम्मी-पापा की तरफ़ नजर गई, तो हिम्मत नहीं हुई कुछ कहने की और मैंने ‘ना’ में सिर हिला दिया.
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हमारी शादी हो गई. शायद अंशुल यह बर्दाश्त नहीं कर पाए और दिल्ली चले गए और हमेशा के लिए वहीं बस गए, आज तक उन्होंने शादी नहीं की है, जिसका कारण यक़ीनन मैं ही हूं. और मेरी हालत यह है कि मैं किसी से कुछ कह भी नहीं सकतीं. और अंशुल को भी यूं घुट-घुट कर जीते भी नहीं देख सकतीं. अब तो बस यही दुआ है कि गनहिल वाली घटना एक फिर अंशुल के साथ घटे और अबकी बार उसकी ज़िंदगी को सतरंगी रंगों की बहार दे दे.
– रेषा

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