कुछ चेहरे जीवन में थोड़े से समय के लिए आकर भी मन में बस जाते हैं. ये पहली नज़र का प्यार है या कुछ और, नहीं जानती.
हल्की बूंदाबांदी हो रही थी दो दिन से लगातार. मैं पिताजी के साथ मुंबई आई थी यूएस वीसा के इंटरव्यू के लिए. पहली बार मुंबई महानगर आई थी. मन में डर भी था और मुंबई को लेकर एक अजीब सा रोमांच भी था. टैक्सी से हम जुहू पहुंचे उस बिल्डिंग तक जहां इंटरव्यू होना था. भीतर न फोन ले जाने की अनुमति थी, न पिताजी को साथ आने की.
मैंने फोन पिताजी को दिया और धड़कते दिल से डॉक्यूमेंट की फाइल लेकर बिल्डिंग के अंदर चली गई. जब तक मेरा नंबर आया और इंटरव्यू आदि हुआ तब तक दो घंटे बीत चुके थे. मैं बाहर आई तब तक बारिश तेज़ हो चुकी थी. आसपास देखा तो पिताजी कहीं दिखाई नहीं दिए. थोड़ा आगे बढ़ी, तो बारिश में भीगने लगी. पास में फोन भी नहीं था कि उन्हें फोन कर लेती. सीढ़ियों पर ही फुहारों में भीगती, डॉक्यूमेंट की फाइल को पानी से बचाती खड़ी रही.
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अनजान शहर में प्रतीक्षा के कुछ पल भी कितने लंबे लगते हैं, यह उस दिन पहली बार जाना. मैं बहुत बैचेनी से इधर-उधर देख रही थी. आख़िर फिर से सीढ़ियां उतरकर थोड़ी दूर तक जाकर पिताजी को ढूंढ़ने लगी. पानी की बौछारों में भीग ही रही थी कि एक गंभीर लेकिन मृदु स्वर सुनाई दिया, “सुनिए यहां छाते में आ जाइए, नहीं तो भीग जाएंगी आप.”
पहले मुझे लगा कोई किसी और को पुकार रहा होगा, मगर तभी मेरी बगल में एक लड़का आकर खड़ा हो गया और मुस्कुराते हुए अपना छाता मेरे सिर पर करते हुए बोला, “किसी का इंतज़ार कर रही हैं न, मैं भी अपनी बहन का इंतज़ार कर रहा हूं, वो इंटरव्यू के लिए गई है.”
अब मैंने उसे देखा. घुंघराले बाल, गोरापन लिए हुए गेहुंआ रंग, प्यारी सी मुस्कान, मन में उतर जाने वाली आवाज़ और मुस्कुराते हुए बाएं गाल में पड़ता हल्का सा डिंपल. आजकल के मॉडर्न लड़कों की तरह डैशिंग या हाईफाई नहीं, मगर बहुत अपना सा, प्यारा सा आकर्षक चेहरा था उसका. दिखने में और बात करने के लहजे से दक्षिण भारतीय लग रहा था. बात भी उतने ही अपनेपन से, सहजता से कर रहा था जैसे बहुत समय की पहचान हो.
“जी मेरे पिताजी साथ आए हैं. उन्हीं को ढूंढ़ रही हूं.” मैंने बताया.
“आइए आपके पिताजी को ढूंढ़ते हैं.” कहते हुए वो मेरे सिर पर छाता ताने साथ में चलने लगा. हम पांच मिनट तक इधर-उधर घूमते हुए पिताजी को ढूंढ़ते रहे. इस दौरान उससे औपचारिक बातें होती रहीं कि यूएस क्यों जा रही हूं. उसकी बहन तो पढ़ाई के लिए जा रही है आदि. बारिश की फुहारें, भीगा-भीगा समा और एक नवयुवक के साथ एक ही छाते में साथ-साथ. संकोच और रोमांच के मिले-जुले भाव में मन डूब रहा था. उसके व्यवहार व बातों की सादगी मन को छू रही थी.
फिर एक पेड़ के नीचे खड़े होकर उसने अपना फोन मुझे दिया, “आप अपने पिताजी को फोन लगा लीजिए.”
मैंने पिताजी को फोन लगाया. हमेशा की तरह उनका फोन व्यस्त था. वे किसी बिज़नेस कॉल में बिजी थे. सात-आठ मिनट बाद उनका फोन लगा. मैंने बता दिया कि मैं बाहर आ गई हूं. दो मिनट बाद ही पिताजी पार्किंग में खड़ी कारों के बीच से आते दिखे.
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मैंने उस लड़के को धन्यवाद दिया. बदले में मीठी मुस्कान और एक गहरी नज़र से देखते हुए उसने मुझे कहा, “टेक केयर!”
मैं पिताजी के साथ वापस चली आई. न उसका नाम पूछा न अपना बताया. कुल दस-बारह मिनट का साथ रहा. लेकिन कुछ चेहरे जीवन में थोड़े से समय के लिए आकर भी मन में बस जाते हैं. ये पहली नज़र का प्यार है या कुछ और, नहीं जानती. मगर पांच बरस बाद आज भी बरसती बूंदों के बीच नीले फूलों वाली छतरी से झांकता उसका हंसता हुआ प्यारा सा चेहरा, गालों का डिंपल याद आ जाता है और सांसें चंदन की ख़ुशबू से भर जाती हैं.
– विनीता राहुरीकर

