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कहानी: एकालाप- आज फिर वही मौसम है… ( Short Story: Ekalap- Aaj Phir Vahi Mausam Hai…)

तुम्हारी आंखों में चाहत बारिश के पानी के साथ ही बरस रही थी और मुझे भिगोती जा रही थी फिर न जाने कैसा भावनाओं का सैलाब आया कि तुम मेरी तरफ़ कुछ कहने के लिए झुके थे. मैं बाहर से संयत थी , मगर अंदर से घबरा गई थी  क्या तुम्हारे इस सैलाब को संभाल पाऊंगी मैं!

सुनो… आज फिर बरसात का मौसम है. वही कालेबादलों के साये और रिमझिम पड़ती फुहार.

याद है न तुमको… उस दिन भी बिल्कुल यही मौसम था.

हवा से बात कर रही थीं मेरी ज़ुल्फ़े मगर तुमने हटाने की ज़रूरत नहीं समझी. मैं जानती हूं, तुम्हें फ़ुर्सत कहां थी! तुम्हारी नज़रें मुझे कुछ इस तरह देख रही थीं जैसे तुम मेरे हर अंदाज़ को अपनी आंखों में हमेशा के लिए क़ैद कर लेना चाहते थे जैसे पता नही दोबारा ये पल मिले न मिलें.

होंठ बार बार लरजते थे मगर बात ज़ुबां तक आकर भी रुक रही थी. सिर्फ़ तुम्हारे ही नहीं मेरे साथ भी तो यही हो रहा था मगर फ़र्क़ था, तुम जानते थे कि तुम्हें क्या कहना है और मैं समझ नहीं पा रही थी कि तुम्हारे उन अनकहे जज़्बातों के लिए मुझे क्या कहना चाहिए.

बहुत कोशिश कर रही थी कि तुम को न देखूं, मगर निगाहें न जाने किस चुंबक से बढ़ गईं थी, जो तुम्हारे चेहरे से हटने का नाम नहीं ले रही थीं.

कुछ मौसम का सुरूर था या फिर तुम्हारा अंदाज़.. हां अब समझ चुकी हूं..ये तुम्हारा अंदाज़ ही है, जब तुम कुछ कह नहीं पाते हो तो गाने गुनगुना कर अपने एहसास को सामने वाले को समझाने की कोशिश करते हो. उस दिन भी तो यही कर रहे थे तुम! बस एक ही गाना था जिसे उस दो घंटे के समय में तुम गाते रहे थे.

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बातें भी की थीं हमने मगर निगाहों से.

तुम्हें याद है वो पल जब बारिश अचानक तेज़ हो गई थी और तुम मुझे लेकर एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए थे. मुझे नहीं पता कि मैंने पर्स से मोबाइल क्यों निकालना चाहा था.

तुमने रोक दिया था मुझे पर्स खोलने से. वो पहलास्पर्श था तुम्हारा. मेरी कलाई को थामे तुम एकटक मुझे देख रहे थे.

तुम्हारी आंखों में चाहत बारिश के पानी के साथ ही बरस रही थी और मुझे भिगोती जा रही थी फिर न जाने कैसा भावनाओं का सैलाब आया कि तुम मेरी तरफ़ कुछ कहने के लिए झुके थे. मैं बाहर से संयत थी , मगर अंदर से घबरा गई थी  क्या तुम्हारे इस सैलाब को संभाल पाऊंगी मैं!

अचानक किसी गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ से मैं और तुम दोनों वास्तविकता के धरातल पर आ गए. बारिश फिर से तन-मन को लुभाती फुहारों में बदल चुकी थी.

तुमने मुझे चलने का इशारा किया और मैं तुम्हारे साथ आगे बढ़ गई… इतना आगे कि अब जहां जाती हूं वहां तुम मेरे साथ होते हो मेरे हमकदम बन कर.

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आख़िर उस झम झम बरसते सावन ने ही तो हमें एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बढ़ने के लिए कहा था.

याद है न तुमको सब? जानती हूं मेरी तरह तुम भीआज इस मौसम और बरसते पानी को देखकर यही सब याद कर रहे हो तभी तो गुनगुना रहे हो फिर से वही गीत- हां तुम बिल्कुल वैसी हो, जैसा मैंने सोचा था…

– मेघा राठी

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Photo Courtesy: Fteepik

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