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काव्य- सपने (Poetry- Sapne)

सपने तो कांच के महल हैं

टूट जाते हैं तो

किरचें

लहुलुहान कर देती हैं – मन..

सपने तो रेत के टीले हैं

बिखर जाते हैं तो

दृष्टि से ओझल हो जाते हैं

उनका अस्तित्व..

पर बालु के कण

आंखों में बैठ

झर झर नीर बहाते हैं

सपनों

की उपस्थिति के एहसास को

हम

यूं ही बस

भुला नहीं पाते हैं..

कभी भुला नहीं पाते हैं…

– उषा‌ वधवा

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Photo Courtesy: Freepik

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