Close

कहानी- ख़ुश रहना पूर्वा… (Short Story- Khush Rahna Poorva…)

विनीता राहुरीकर

“… जिनकी इकलौती बेटियां ही होती हैं, वह माता-पिता क्या उसके विवाह पश्‍चात जीवन नहीं जीते… वह भी तो बेटी के सुख को देखकर सुखी रहते हैं. हमें भी पूर्वा के सुख में ही अपना सुख मानना होगा अब. और सोचो आज प्रणय कितना ख़ुश होगा. वह सदा यही चाहता था कि पूर्वा को जीवन के सारे सुख मिले, जो उससे छिन गए थे.”

 

“अब कन्यादान के लिए माता-पिता आ जाएं.” पंडित जी के यह कहते ही पांच जोड़ी आंखें आंसुओं से छलक पड़ीं. गिरिजा तो आंखों पर पल्ला रखे सुबक ही पड़ी. सुहास के चेहरे की रेखाएं बता रही थीं कि अपने आंसू रोकने के लिए उन्हें कितना परिश्रम करना पड़ रहा है.
मदन ने सुहास का कंधा थपथपाया और ममता ने गिरिजा को ढा़ंढस बंधाया, हालांकि उसकी अपनी भी रुलाई फूट पड़ने को थी जिसे बड़ी मुश्किल से उसने रोक रखा था. बहते आंसुओं के सैलाब के बीच कन्यादान की रस्म पूरी हुई और विवाह संपन्न हुआ. दुल्हन बनी पूर्वा गिरिजा के कंधे पर सिर रखकर फफक पड़ी.
मंडप में लड़की और लड़के वालों को मिलाकर कुल 30-35 बहुत नजदीकी रिश्तेदार ही थे. रस्मों के पश्‍चात मंडप जिस हॉल में था, उसी के एक कोने में लंच की व्यवस्था थी. अपने-अपने दुख को समेटे सबने साथ में खाना खाया. शाम चार बजे विदाई का मुहूर्त था.
“पूर्वा का ध्यान रखिएगा, बहुत भावुक है मेरी बच्ची, पहले ही अपनी छोटी सी आयु में पहाड़ सा दुख देख चुकी है.” सुहास ने पूर्वा के ससुर विजयकांत से हाथ जोड़कर कहा.
“अरे यह क्या कर रहे हैं आप? पूर्वा जैसे आपकी बेटी वैसे ही हमारी भी बेटी ही बन कर रहेगी.” विजयकांत ने सुहास की दोनों हथेलियां थाम कर उन्हें आश्‍वस्त किया.
सबसे गले मिल, भारी मन से पूर्वा अपने नए परिवार और पति अभय के साथ नए घर चली गई्.
“यह तो अच्छा है कि पूर्वा इसी शहर में रहेगी. मन को तसल्ली रहेगी. जब मन करेगा, मिल या देख तो पाएंगे.” सुहास आंखें पोंछते हुए बोले.
“आप तो कितने महान व्यक्ति हैं, आप दोनों ने पूर्वा के लिए वह किया, जो दूसरा कोई सोच भी नहीं पाता.” ममता और मदन, दोनों ने भीगे स्वर में कहा.

 

यह भी पढ़ें: शादीशुदा ज़िंदगी में कैसा हो पैरेंट्स का रोल? (What Role Do Parents Play In Their Childrens Married Life?)

बचे हुए मेहमानों को विदा कर होटल का बिल आदि चुकाकर गिरिजा और सुहास देर शाम अपने घर लौट आए. सन्नाटे से भरे घर में पैर रखते ही दोनों की आंखें पुनः भर आईं. मदन और ममता ने बहुत कहा था उनके साथ आने को, लेकिन इन दोनों ने ही मना कर दिया था. उनके भी अपने दुख हैं और कुछ दुख ऐसे होते हैं, जो अकेले में अपने आपके साथ ही बहाए जा सकते हैं. गिरिजा स्तब्ध सी सोफे पर बैठ गई. उसका चेहरा सपाट था, आंखें सूखी थीं, लेकिन सुहास जानते थे कि उसके भीतर अभी कैसा झंझावात चल रहा होगा. ऊपरी सन्नाटे के अंदर कितने दुख, कितनी पीड़ाएं शोर मचा रही होंगी. उनके स्वयं के भीतर भी तो वही स्थिति थी, एक हाहाकार मचा हुआ था.
वे जाकर चाय बना लाए. सोच और दुख में डूबी गिरिजा के कंधे पर सांत्वना भरा हाथ रखकर उन्होंने एक कप उसके हाथ में थमा दिया और सोफे पर बगल में उसके पास बैठ गए. सांत्वना का स्पर्श मिलते ही गिरिजा के मन का दुख पिघल कर आंखों में उतर आया. आंखें नम हो गईं और एक बूंद पलकों से नीचे बह आई. सुहास ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया, तो गिरिजा ने उनके कंधे पर सिर रख दिया और सिसक पड़ी.
“हर बार हमारे ही कलेजे को क्यों काट देता है यह दुख?” गिरिजा ने कहा.
“बेटियां तो होती ही हैं विदा हो जाने के लिए, तो यह तो एक न एक दिन होना ही था. हम अपने सुख के लिए उसे घर पर बिठाकर थोड़े ही ना रख सकते थे.” नम स्वर में सुहास ने कहा.
“वह मैं जानती हूं, लेकिन अपने दुख का मैं क्या करूं? अभी अकेलापन और सूना घर काट खाने को दौड़ेगा.” गिरिजा बोली.
“अकेलेपन को दूर करने के दूसरे रास्ते तलाश करने होंगे अब हमें और दुख को दूर करने के लिए पूर्वा के सुख में अपना सुख मानना होगा. यही कामना करो कि आगे के जीवन भर उसे सब सुख मिले. वह अपने नए घर में स्वस्थ व प्रसन्न रहे. जिनकी इकलौती बेटियां ही होती हैं, वह माता-पिता क्या उसके विवाह पश्‍चात जीवन नहीं जीते… वह भी तो बेटी के सुख को देखकर सुखी रहते हैं. हमें भी पूर्वा के सुख में ही अपना सुख मानना होगा अब. और सोचो आज प्रणय कितना ख़ुश होगा. वह सदा यही चाहता था कि पूर्वा को जीवन के सारे सुख मिले, जो उससे छिन गए थे.” सुहास आर्द्र स्वर में बोले.
प्रणय की याद आते हैं गिरिजा के सब्र का बांध टूट गया और उसकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली. स्वयं सुहास की आंखें भी छलक पड़ी थीं. आख़िर दर्द तो उनके भीतर भी जमा था. उन्होंने गिरिजा को जी भर कर रोने दिया, ताकि उसका दुख हल्का हो जाए. जानते थे वह कि इस स्थिति से उबरने में दोनों को ही थोड़ा समय लगेगा.
रात में गिरिजा को बड़ी देर बाद नींद आई, लेकिन सुहास की आंखों में दूर तक नींद का नामोनिशान नहीं था. अंधेरे में चुपचाप पड़े हुए आंखें खोल शून्य में ताक रहे थे. गुज़रा हुआ जीवन चलचित्र की भांति आंखों के सामने घूम रहा था.
कितना ख़ुश थे वे प्रणय के जन्म से. सात वर्षों तक संतानहीनता की पीड़ा सहने के बाद प्रणय का जन्म हुआ था. उनकी सूनी दुनिया में नन्हें प्रणय की किलकारियां गूंजने लगीं. जीवन में नई रौनक़ आ गई थी. संसार नन्हें प्रणय के इर्दगिर्द सिमट गया था. पिछले सात वर्षों की सारी पीड़ा मिट गई थी. प्रणय के लालन-पालन में समय कब बीत जाता, पता ही नहीं चलता था.

यह भी पढ़ें: रिश्तेदारों से कभी न पूछें ये 9 बातें (9 Personal Questions You Shouldn’t Ask To Your Relatives)

आज भी एक-एक दिन मानस पटल पर स्पष्ट अंकित है. प्रणय का पहली बार बाबा-मामा बोलना. वह दिन जब दरवाज़े की घंटी बजने पर नन्हा प्रणय अचानक से पूरा वाक्य बोला था, “बाबा तोई (कोई) आया है.”
उसका यूनिफॉर्म पहन कर, स्कूल बैग और वॉटर बॉटल टांग कर बिसूरते हुए पहली बार स्कूल जाना. प्रणय से अधिक तो उसे पहली बार स्कूल अपने से अलग करते हुए उनका ख़ुद का मन रोया था. पैर घर लौटने के लिए तैयार ही नहीं हो रहे थे. वह उसके स्कूल के बाहर ही कार में बैठे रहे थे. मन को एक तसल्ली थी कि वह उसके आसपास ही है. गिरिजा कितना परेशान हो गई थी उस दिन.
दूसरे दिन प्रणय ने बड़ी आशा से कहा था, “बाबा, आप बाहर ही बैठेंगे ना. मुझे छोड़कर कहीं जाएंगे तो नहीं ना?”
और वे बैठे रह गए थे, उस दिन ही नहीं पूरे हफ़्ते भर तक ऑफिस से हाफ डे लेकर प्रणय को घर छोड़कर वह सेकंड हाफ में ही ऑफिस जाते थे. सभी पिताओं को अपनी संतान से प्यार होता है, लेकिन उन्हें कुछ अधिक ही था. प्राण बसते थे उनके प्रणय में. समय भी कैसा पंख लगा कर उड़ जाता है. देखते-देखते पहले नर्सरी, प्राइमरी, मिडिल फिर 12वीं करके कॉलेज और फिर आईटी इंजीनियर बन गया था प्रणय.
वह न सिर्फ पढ़ने में और दूसरी गतिविधियों में सबसे तेज़ था, बल्कि व्यवहार और स्वभाव से भी उतना ही सुशील था. धन्य थे गिरिजा और वह प्रणय जैसी संतान पाकर. नौकरी लगते ही उन्होंने उसके लिए एक योग्य व सुशील जीवनसाथी की खोज आरंभ कर दी. साल भर बाद ही उनकी खोज पूर्वा पर जाकर पूर्ण हुई. पढ़ी-लिखी सुशील सरल स्वभाव की प्यारी सी पूर्वा दोनों को देखते ही पहली नज़र में पसंद आ गई थी. प्रणय को भी पूर्वा भा गई.
पहले सगाई और फिर शादी. छह माह विवाह आदि की तैयारी में कैसे बीत गए पता नहीं चला, अपने शांत स्नेहिल स्वभाव के कारण पूर्वा ने जल्दी ही उनके और गिरिजा के मन में जगह बना ली थी. और वह भी तो कितना स्नेह करने लगे थे उससे.
विवाह के कामों या फिर यूं ही उनका और मदन जी का व ममता जी का एक-दूसरे के घर आना-जाना लगा ही रहता. दोनों परिवारों में विवाह पूर्व ही इतनी घनिष्ठता हो गई थी जैसे बरसों की पहचान हो.

 


शादी के बाद पूर्वा के आ जाने से घर चहक उठा था. जीवन में एक बेटी की कमी थी, वह पूर्वा ने पूरी कर दी थी. उसकी हंसी से घर गुलज़ार हो गया था. दिनभर वह चिड़िया सी चहकती फुदकती घर भर में घूमती रहती. रसोई में गिरिजा का हाथ बंटाती, तो सुहास को मोबाइल पर नई तकनीकें सिखाती रहती. स्मार्ट टीवी पर नए-नए ऐप डाउनलोड करके दोपहर में ड्रॉइंगरूम को थिएटर बनाकर उन दोनों के साथ फिल्में देखती.
शनिवार की रात को मदन व ममता जी को भी साथ ले वे छह आउटिंग पर जाते और डिनर बाहर ही करते. शादी के बाद की पहली दीपावली पर कितने चाव से उसने घर सजाया था. पूरा बाज़ार ही उठा लाई थी. नए पर्दे, फूलों की लड़ियां, सबके लिए कपड़े, लाइटिंग और जाने क्या-क्या. हर रोज़ सुबह पांच बजे उठकर दरवाज़े पर नए-नए डिज़ाइन की रंगोली बनाती. यूट्यूब पर देख कर ढेर सारी मिठाइयां बना डाली थीं उसने. कितना उत्साह था उसे त्योहार का. उसके बाद होली पर भी उसने रंगों से सारा घर रंग डाला था. क्या धूम मचाई थी.
सुहास की आंखों से न जाने कब आंसू छलक पड़े थे. कुर्ते की बांह से उन्होंने आंसू पोंछे. जीवन इतना सुखद और ख़ुशहाल कभी न था. प्रणय और पूर्वा को देखकर वे दोनों निहाल हो जाते थे. देखते ही देखते एक साल पंख लगाकर उड़ गया. यूं भी सुख के दिन बड़ी जल्दी बीत जाते हैं. उन दोनों के विवाह की पहली वर्षगांठ बहुत धूमधाम से मनाई थी सुहास ने. क़रीबी लोगों को होटल में शानदार पार्टी दी थी.
अभी ख़ुशी का उत्साह उतरा भी नहीं था कि अचानक प्रणय के पेट में दर्द हुआ. पहले घरेलू दवाइयां दीं, लेकिन आराम न मिलने पर डॉक्टर को दिखाया. पांच दिन की दवाइयां लेकर प्रणय अपना काम करता रहा. कुछ दिनों बाद पेट का दर्द फिर उभरा. इस बार कुछ जांच करके डॉक्टर ने फिर दवाइयां दीं. दवाई खाने तक आराम रहता, मगर कुछ दिनों बाद दर्द फिर उठ जाता. आज भी याद है वह मनहूस दिन जब प्रणय के डॉक्टर ने उसे शहर के बड़े अस्पताल में दिखाने को कहा. वहां बड़ी-बड़ी टेस्ट और सीटी स्कैन हुए और डॉक्टर ने जो बताया उसे सुन कर पूरे परिवार पर जैसे वज्रपात हो गया.
प्रणय के पास केवल छह माह का जीवन शेष था. उसे लीवर और पैंक्रियाज का ऐसा कैंसर था जिसका कोई इलाज नहीं था. सब स्तब्ध रह गए थे. जो जीवन कल तक सुख की रागिनी सा था, आज एक दुःस्वप्न बन गया था. जिस प्रणय को एक-एक कदम धरती पर रखकर चलना सिखाया था, उसे तिल-तिल मौत की तरफ़ बढ़ते देखना असहनीय था. पूर्वा तो जैसे पत्थर की मूर्ति हो गई थी. हंसना-रोना सब भूल गई थी. बस रात-दिन प्रणय की देखभाल में लगी रहती. इंटरनेट से जानकारी जुटाती रहती कि कहीं से कोई इलाज मिल जाए, मगर सब व्यर्थ. डेढ़ बरस पहले मात्र अट्ठाइस वर्ष की उम्र में सबको बिलखता छोड़ प्रणय चला गया.
एक गहरी सांस ली सुहास ने. वह दिन आज भी छाती में शूल की तरह चुभता है. महीने भर तक किसी को कोई होश ही नहीं था. जैसे सब दुख में गहरे डूबे हुए थे. मदन-ममता का दुख तो और भी घना था. पुत्र समान दामाद का असमय चले जाना और बेटी का दुखमय भविष्य.
आख़िर एक दिन पूर्वा ने ही हिम्मत करके ख़ुद को संभाला और उन्हें भी सहारा दिया. प्रणय के जाने के बाद वह अपने मायके नहीं गई वरन बेटी बनकर उन दोनों के साथ ही रही. प्रणय की जगह उसने ले ली थी.
समय के साथ प्रणय का घाव भी भीतर से ना सही बाहर से सूखने लगा. एक-दूसरे को सांत्वना देने और दुख से उबरने के लिए वह सब अपने-अपने दुख को छुपा लेते और ऊपर से संयत दिखते. पूर्वा के जीवन का फीकापन सबको बहुत सालता. त्योहार पर उसका सादे कपड़ों में रहना, कमरे में छुपकर प्रणय की तस्वीर सीने से लगाकर रोते रहना. होली पर बंद कमरे में पड़े रहना.

 

यह भी पढ़ें: सास बहू के रिश्तों को मिल रही है नई परिभाषा… (Daughter-In-Law And Mother-In-Law: Then Vs Now…)

उन दोनों के प्रति वह प्रणय के सारे कर्तव्यों को पूरा कर रही थी. वह भी तो उसे बेटी मान कर ही रखते. साल भर बाद उसके भविष्य के बारे में सोचकर और प्रणय को दिए वचन का पालन करते हुए उन्होंने चुपचाप उसके लिए लड़के देखना शुरू कर दिया. प्रणय ने जाने के कुछ दिन पहले उनसे वचन लिया था, “बाबा प्रॉमिस करिए कि आप किसी भी तरह से पूर्वा की दूसरी शादी करवा देंगे. जो सुख और साथ मैं उसे नहीं दे पाया जीवन में वह सब उसे मिले. आप जल्दी ही उसके लिए अच्छा सा जीवनसाथी ढूंढ़ देना. वादा करिए मुझसे.”
और उन्होंने अपना वादा पूरा किया. तलाश किया उसके लिए अभय को, जो एक सुलझा हुआ समझदार लड़का है और उसे ख़ुश रखेगा. आसान नहीं था पूर्वा को शादी के लिए तैयार करना. जिसका मुख देखकर वह प्रणय का दुख भूलने की कोशिश कर रहे थे, उसे अपने से दूर कर देना, उसे विदा कर देना बहुत कठिन था. प्रणय की क़सम देकर बड़ी मुश्किल से पूर्वा को राज़ी किया अभय से शादी करने के लिए. और आज उसे नए घर, नए जीवन के लिए विदा कर आए हैं.
मन और घर फिर एक बार सूने हो गए. उठकर सुहास ने आलमारी खोली और प्रणय का फोटो निकाला.
“ख़ुश हो ना तुम बेटा आज? मैंने अपना वचन निभाया. आज पूर्वा अपने नए जीवन में प्रवेश कर गई.”
फोटो में प्रणय मुस्कुरा रहा था जैसे कह रहा हो, “हां बाबा, मैं बहुत ख़ुश हूं.”
प्रणय का फोटो सीने से लगा लिया सुहास ने और मन ही मन कहा, “ख़ुश रहना बेटी पूर्वा…” आंखों में बेटे के दुख के आंसू थे और मन में पूर्वा के सुखद भविष्य और जीवन की कामना.

 

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES

 

Share this article