
उस शाम लौटते हुए मेरे मन में एक अजीब-सा सवाल था. क्या रेणु ने कुछ खोया था?
शायद हां. हर जीवन में कुछ न कुछ छूटता है. उसने भी शायद कई शामें अकेले बिताई होंगी. कभी परिवार की कमी महसूस हुई होगी. कभी किसी अपने की ज़रूरत भी पड़ी होगी. लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उसका जीवन अधूरा था?
कभी-कभी कोई चेहरा ज़िंदगी से निकल जाने के बाद भी ज़िंदगी से पूरी तरह निकल नहीं पाता. वर्षों बाद अचानक किसी नाम के बहाने वह चेहरा लौट आता है और फिर हम सोचने लगते हैं कि इतने सालों में उस इंसान के साथ आख़िर क्या हुआ होगा.
मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था.
पुराने काग़ज़ों के बीच कॉलेज के दिनों की एक तस्वीर मिली थी. तस्वीर में हम चार लड़के खड़े थे और पीछे, थोड़ी दूरी पर एक लड़की दिखाई दे रही थी. बाकी तीनों दोस्तों को पहचानने में मुझे एक पल भी नहीं लगा.
लेकिन उस लड़की को पहचानने में कुछ सेकंड लग गए.
फिर याद आया.
रेणु.
हमारे छोटे शहर की वो लड़की जिसे हमने कभी ठीक से जानने की कोशिश ही नहीं की थी. हम उसे उसके नाम से कम और उसके क़द से ज़्यादा जानते थे. लंबी इतनी कि हमारे बीच खड़ी होती, तो बाकी सब छोटे दिखाई देते. बाल हमेशा तेल में डूबे हुए, बीच से मांग और पीछे बंधी हुई एक कड़ी चोटी. कपड़े सादे. चेहरे पर कोई बनावटी मुस्कान नहीं. किताब हाथ में और आंखें हमेशा अगले पन्ने पर.
हमने उसका एक नाम रख छोड़ा था, जिसे आज याद करके ख़ुद पर थोड़ी शर्म आती है.
वो हमारे साथ पढ़ती थी, मगर हमारे जैसी नहीं थी. हम पढ़ने इसलिए जाते थे, क्योंकि परीक्षा पास करनी थी. वो पढ़ती थी, क्योंकि उसे पढ़ना अच्छा लगता था. फ़र्क़ बहुत छोटा दिखाई देता था, लेकिन असल में बहुत बड़ा था.
महाजन सर की ट्यूशन में हम चार लड़के और वो अकेली लड़की हुआ करते थे. सर कोई सवाल पूछते, तो हमारी आंखें एक-दूसरे को ढूंढ़ने लगतीं और रेणु का हाथ लगभग उसी समय ऊपर उठ जाता.
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उसे किताबें याद नहीं थीं. उसे किताबों की दुनिया याद थी. किस अध्याय में क्या है, किस सिद्धांत का आधार क्या है, कौन सी बात पिछले अध्याय से जुड़ती है- उसके लिए पढ़ाई रटने की चीज़ नहीं थी.
हम कभी-कभी उससे चिढ़ते थे. उसकी चुप्पी को अकड़ समझते थे. उसकी गंभीरता को नीरसता. और उसकी पढ़ाई को उसकी कमज़ोरी.
शायद उम्र ही ऐसी थी. तब हमें लगता था कि जो लड़की लड़कों की तरह बहस नहीं करती, हंसती-बोलती नहीं, हर वक़्त किताब में घुसी रहती है, उसमें कोई ख़ास बात नहीं हो सकती. हमें क्या मालूम था कि असल में ख़ास बात उसी में थी.
कॉलेज ख़त्म हुआ. हम चारों अलग दिशाओं में चले गए. रेणु कहां गई, किसी ने पता नहीं किया. फिर ज़िंदगी में नौकरी आई, घर आया, बच्चे आए, ज़िम्मेदारियां आईं. पुरानी यादों की आलमारियां बंद होती गईं. रेणु भी उन्हीं आलमारियों में किसी किताब की तरह दब गई.
फिर एक दिन इंटरनेट पर एक विश्वविद्यालय का कार्यक्रम देखते हुए एक तस्वीर पर नज़र अटक गई. एक महिला वैज्ञानिक पुरस्कार लेते हुए खड़ी थी. नाम पढ़ा तो हाथ वहीं रुक गया.
रेणु!
पहले मुझे यकीन नहीं हुआ. फिर मैंने तस्वीर को बड़ा करके देखा. चेहरा उम्र के साथ बदल चुका था, लेकिन आंखों में वही एकाग्रता थी.
वो अब प्रोफेसर थी. अपने विषय में शोध कर चुकी थी. कई वर्षों से पढ़ा रही थी. उसके नाम से प्रकाशित शोधपत्र थे. जिन किताबों के पन्ने हमसे पहले पढ़ लेने पर हम उसे चिढ़ाते थे, उन्हीं किताबों की दुनिया में उसने अपना एक अलग अध्याय लिख दिया था.

मैंने उसके बारे में और पढ़ना शुरू किया. तभी पता चला कि विश्वविद्यालय की नौकरी के साथ उसने अपने गांव के पास की लड़कियों के लिए एक अध्ययन केंद्र भी शुरू किया था. ऐसी लड़कियां, जिनके माता-पिता पढ़ाना तो चाहते थे, लेकिन कॉलेज शहर में होने के कारण आगे की पढ़ाई रोक देते थे. वह उनकी फीस में मदद करती थी. किताबें दिलवाती थी. कई बार ख़ुद उनके घर जाकर माता-पिता से बात करती थी. मुझे यह जानकर सबसे ज़्यादा हैरानी हुई कि जिन लड़कियों के लिए वह लड़ रही थी, उनमें उसे अपना अतीत दिखाई देता था.
उसने भी कभी छोटे शहर की उसी संकरी दुनिया से बाहर निकलने के लिए जगह मांगी थी. फ़र्क़ स़िर्फ इतना था कि तब उसके लिए कोई रेणु नहीं थी. इसलिए अब वह दूसरी रेणुओं के लिए रास्ता बना रही थी.
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कुछ समय बाद उससे मुलाक़ात भी हो गई. बहुत सालों बाद. हम दोनों कुछ देर एक-दूसरे को देखते रहे. मुझे कॉलेज की वो लड़की दिखाई दे रही थी और शायद उसे हमारे चारों का वो झुंड याद आ रहा था, जिसमें हम ख़ुद को बहुत समझदार समझते थे. मैं उसके जीवन के बारे में बहुत कुछ पूछना चाहता था. शादी हुई या नहीं? कहां रही? क्यों नहीं मिली? कभी अकेलापन लगा या नहीं…
लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिन्हें पूछने से पहले ही आदमी समझ जाता है कि शायद वो सवाल पूछने लायक नहीं है. मैंने उसकी निजी ज़िंदगी कुरेदने की बजाय उसके काम के बारे में पूछा. वो काफ़ी देर तक अपने विद्यार्थियों के बारे में बताती रही. उसकी आंखों में चमक थी.
उसे अपने शोध से ज़्यादा ख़ुशी उन लड़कियों की प्रगति बताते हुए हो रही थी, जिन्हें उसने पढ़ने में मदद की थी. तभी मुझे समझ आया कि हम कितनी छोटी चीज़ को सफलता समझते रहे थे. हमारे लिए ज़िंदगी का हिसाब नौकरी, पैसा, शादी, बच्चे और मकान से बनता था.
रेणु ने शायद अपने हिसाब की किताब में कुछ और कॉलम जोड़ लिए थे.
ज्ञान.
स्वतंत्रता.
अपने फ़ैसले…
और दूसरों के लिए रास्ता बनाना.
उस शाम लौटते हुए मेरे मन में एक अजीब सा सवाल था. क्या रेणु ने कुछ खोया था?
शायद हां!
हर जीवन में कुछ न कुछ छूटता है. उसने भी शायद कई शामें अकेले बिताई होंगी. कभी परिवार की कमी महसूस हुई होगी. कभी किसी अपने की ज़रूरत भी पड़ी होगी.
लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उसका जीवन अधूरा था?
नहीं जानता.
और शायद अब यह तय करना भी ज़रूरी नहीं लगता, क्योंकि किसी और की ज़िंदगी को अधूरा कहने का अधिकार हमें स़िर्फ इसलिए नहीं मिल जाता कि उसने हमारी बनाई हुई परिभाषा के मुताबिक़ जीवन नहीं जिया.
मुझे उस पुरानी तस्वीर का ख़्याल फिर आया. चार लड़के आगे खड़े थे और रेणु पीछे. तस्वीर में भी हमने उसे पीछे ही रखा था. लेकिन ज़िंदगी ने अजीब हिसाब किया. तस्वीर में पीछे खड़ी लड़की हम सब से आगे निकल गई. और सबसे दिलचस्प बात यह थी कि उसने पीछे मुड़कर हमें पछाड़ने की कोशिश भी नहीं की. वो बस अपने रास्ते पर चलती रही. इतनी दूर तक कि हम उसे देखने के लिए आज भी पीछे मुड़कर देखते हैं.
शायद हर छोटे शहर में ऐसी कोई रेणु होती है. कोई लड़की, जो पढ़ने में तेज होती है, मगर उसकी प्रतिभा से ज़्यादा उसके कपड़े, क़द, रंग, व्यवहार और शादी की उम्र पर चर्चा होती है. वो पढ़ती है. अच्छे नंबर लाती है. फिर एक दिन उसकी डिग्री किसी संदूक में रख दी जाती है और उसके सपनों की जगह घर की ज़िम्मेदारियां ले लेती हैं.
ज़रूरी नहीं कि हर लड़की नौकरी करे.
ज़रूरी नहीं कि हर लड़की शादी न करे.
ज़रूरी यह है कि शादी या परिवार उसके सपनों का अंत न बन जाए. किसी लड़की को घर संभालना पसंद है तो वह भी उसका चुनाव हो.
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वो करियर चुने तो वह भी उसका चुनाव हो. वो दोनों साथ चाहती है तो परिवार उसके साथ खड़ा हो.
असल सवाल यही है कि चुनाव किसका है, क्योंकि प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता. सपनों की कोई ऊंचाई नहीं होती. और किसी लड़की का क़द छह फीट हो या चार फीट- उसके हिस्से का आसमान उतना ही बड़ा होना चाहिए जितना वो ख़ुद देखना चाहती है.
उस दिन पुरानी तस्वीर मैंने फिर से देखी. इस बार मेरी नज़र उन चार लड़कों पर नहीं गई. मैंने स़िर्फ पीछे खड़ी रेणु को देखा. और पहली बार लगा-
हमने उसे कभी ताड़ की पेड़नी कहा ही क्यों था? वो तो बस हमसे पहले अपने आसमान की तरफ़ देखना सीख गई थी.

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